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Monday, July 13, 2026

पहली ही बारिश में गंगा एक्सप्रेसवे भगवान भरोसे

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– बदायूं के 92 किमी हिस्से में 10 से अधिक स्थानों पर मिट्टी का कटाव

बदायूं। उत्तर प्रदेश की सबसे महत्वाकांक्षी सड़क परियोजनाओं में शामिल 594 किलोमीटर लंबे गंगा एक्सप्रेसवे की गुणवत्ता पर पहली ही मानसूनी बारिश के बाद सवाल उठने लगे हैं। बदायूं जिले से गुजरने वाले 92 किलोमीटर लंबे हिस्से में 10 से अधिक स्थानों पर मिट्टी बहने और कटाव की स्थिति सामने आई है। इससे एक्सप्रेसवे के निर्माण कार्य, ढलानों की मजबूती और जल निकासी व्यवस्था को लेकर गंभीर चर्चा शुरू हो गई है।

जानकारी के अनुसार, लगातार हुई बारिश के बाद एक्सप्रेसवे के किनारों पर कई स्थानों से मिट्टी बह गई, जिससे ढलानों पर कटाव स्पष्ट दिखाई देने लगा। हालांकि, मुख्य कैरिजवे सुरक्षित बताया जा रहा है, लेकिन किनारों पर हुए कटाव ने निर्माण एजेंसियों की कार्यप्रणाली और गुणवत्ता नियंत्रण पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

गंगा एक्सप्रेसवे को उत्तर प्रदेश के विकास की रीढ़ माना जा रहा है। मेरठ से प्रयागराज तक लगभग 594 किलोमीटर लंबे इस एक्सप्रेसवे का बदायूं में करीब 92 किलोमीटर हिस्सा पड़ता है। इस परियोजना से पश्चिमी और पूर्वी उत्तर प्रदेश के बीच यात्रा समय में कमी, औद्योगिक निवेश, कृषि परिवहन और आर्थिक गतिविधियों को नई गति मिलने की उम्मीद है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि पहली ही बारिश में कई स्थानों पर मिट्टी का बह जाना चिंता का विषय है। यदि समय रहते कटाव रोकने के लिए प्रभावी उपाय नहीं किए गए, तो भविष्य में मानसून के दौरान स्थिति और गंभीर हो सकती है। दूसरी ओर, निर्माण एजेंसियों ने प्रभावित स्थानों पर मरम्मत और सुरक्षात्मक कार्य शुरू कर दिए हैं।

जानकारों का मानना है कि किसी भी एक्सप्रेसवे की ढलानों को सुरक्षित रखने के लिए मजबूत ड्रेनेज सिस्टम, मिट्टी को बांधने की वैज्ञानिक तकनीक और नियमित निगरानी अत्यंत आवश्यक होती है। यदि इनमें किसी स्तर पर कमी रह जाती है, तो भारी बारिश के दौरान कटाव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

गंगा एक्सप्रेसवे प्रदेश की एक ऐतिहासिक परियोजना है, इसलिए इससे जुड़ी हर तकनीकी समस्या का पारदर्शी और वैज्ञानिक समाधान होना चाहिए। पहली बारिश में सामने आए कटाव की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई जानी चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि यह सामान्य प्राकृतिक प्रभाव है या निर्माण गुणवत्ता में कहीं कोई कमी रही है। करोड़ों रुपये की लागत से तैयार इस परियोजना में गुणवत्ता और सुरक्षा से किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता।

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