शरद कटियार
भारत विविधताओं का देश है। यहां धर्म, भाषा, संस्कृति और जातियों की असंख्य परतें सदियों से साथ-साथ चलती रही हैं। संविधान निर्माताओं ने एक ऐसे भारत का सपना देखा था, जहां हर नागरिक की पहचान उसकी योग्यता, मानवता और नागरिक अधिकारों से हो, न कि उसकी जाति से। लेकिन आजादी के दशकों बाद भी भारतीय समाज जातीय खांचों से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाया है। विडंबना यह है कि आधुनिक शिक्षा, तकनीक और विकास के दौर में भी जातीय संगठन लगातार मजबूत होते जा रहे हैं और समाज में नई तरह की वैचारिक दीवारें खड़ी कर रहे हैं।
जातीय संगठनों की शुरुआत भले सामाजिक सहयोग, सामूहिक उत्थान और अपने समुदाय के हितों की रक्षा के उद्देश्य से हुई हो, लेकिन समय के साथ इनका बड़ा हिस्सा सामाजिक समरसता के बजाय जातीय वर्चस्व और राजनीतिक दबाव का माध्यम बनता गया। आज अनेक संगठन खुले तौर पर अपनी जाति की जनसंख्या, राजनीतिक ताकत और आर्थिक प्रभाव को बढ़ाने की प्रतिस्पर्धा में लगे दिखाई देते हैं। इससे समाज में “हम” और “वे” की मानसिकता लगातार मजबूत हो रही है।
सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि जातीय संगठन अब केवल सामाजिक मंच नहीं रह गए, बल्कि राजनीति, प्रशासन और चुनावी समीकरणों को प्रभावित करने वाले दबाव समूह बनते जा रहे हैं। राजनीतिक दल भी वोट बैंक की राजनीति के कारण इन्हें बढ़ावा देते हैं। चुनावों में जातीय सम्मेलन, शक्ति प्रदर्शन और समुदाय विशेष को साधने की रणनीति आम हो चुकी है। इसका परिणाम यह होता है कि समाज के वास्तविक मुद्दे — शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कृषि और विकास पीछे छूट जाते हैं और जातीय पहचान सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार बन जाती है।
जातीय संगठनों का एक और खतरनाक प्रभाव सामाजिक तनाव के रूप में सामने आता है। जब किसी एक जाति का संगठन अपनी श्रेष्ठता या अधिकारों की आक्रामक राजनीति करता है, तो दूसरी जातियों में भी प्रतिक्रिया जन्म लेती है। इससे प्रतिस्पर्धी जातीय ध्रुवीकरण शुरू हो जाता है। धीरे-धीरे समाज सहयोग की जगह संघर्ष की दिशा में बढ़ने लगता है। कई बार छोटी घटनाएं भी जातीय टकराव का रूप ले लेती हैं और सामाजिक सौहार्द प्रभावित होता है।
यह भी सच है कि कुछ जातीय संगठन शिक्षा, गरीब विद्यार्थियों की मदद, सामूहिक विवाह और सामाजिक सुधार जैसे सकारात्मक कार्य भी करते हैं। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब संगठन सामाजिक सेवा से आगे बढ़कर जातीय श्रेष्ठता, संख्या बल और राजनीतिक दबदबे का मंच बन जाते हैं। उस स्थिति में वे समाज को जोड़ने के बजाय विभाजित करने लगते हैं।
आज जरूरत इस बात की है कि समाज जातीय पहचान से ऊपर उठकर नागरिकता और मानवता आधारित सोच विकसित करे। संविधान ने सभी को समान अधिकार दिए हैं, लेकिन जातीय संगठनों की आक्रामक राजनीति कई बार समानता की भावना को कमजोर कर देती है। नई पीढ़ी को यह समझना होगा कि जाति के नाम पर बनी दीवारें अंततः समाज और राष्ट्र दोनों को कमजोर करती हैं।
भारत का भविष्य सामाजिक एकता, शिक्षा और समान अवसरों में छिपा है, न कि जातीय प्रतिस्पर्धा में। यदि समाज लगातार जातीय खांचों में बंटता गया, तो विकास और लोकतंत्र दोनों प्रभावित होंगे। इसलिए जरूरी है कि सामाजिक संगठन जातीय सीमाओं से बाहर निकलकर व्यापक मानव कल्याण, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता को प्राथमिकता दें। क्योंकि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी विविधता में एकता होती है, विभाजन में नहीं।


