डॉ विजय गर्ग
आज का भारत शिक्षा के क्षेत्र में पहले से कहीं अधिक आगे बढ़ चुका है। गांव-गांव में स्कूल हैं, शहरों में कोचिंग संस्थानों की भरमार है, डिजिटल प्लेटफॉर्म पर हजारों कोर्स उपलब्ध हैं, और लाखों विद्यार्थी हर वर्ष डिग्रियां लेकर निकल रहे हैं। माता-पिता पहले से अधिक जागरूक हैं, सरकारें शिक्षा पर बजट बढ़ा रही हैं, और “पढ़ो-लिखो, आगे बढ़ो” का संदेश हर घर तक पहुंच चुका है।
लेकिन एक बड़ा सवाल आज समाज के सामने खड़ा है—
यदि पढ़ाई इतनी बढ़ गई है, तो स्किल यानी वास्तविक कौशल क्यों नहीं बढ़ा?
क्यों आज भी बड़ी संख्या में डिग्रीधारी युवा नौकरी के लिए संघर्ष कर रहे हैं?
क्यों कंपनियां कहती हैं कि “डिग्री है, लेकिन काम करने की क्षमता नहीं”?
क्यों इंटरव्यू में अच्छे अंक लाने वाले छात्र असफल हो जाते हैं?
और क्यों आज भी अनेक युवा अपने ज्ञान को व्यवहारिक जीवन में लागू नहीं कर पाते?
यह केवल शिक्षा व्यवस्था का संकट नहीं, बल्कि समाज, सोच, परिवार और व्यवस्था के बीच पैदा हुई एक गहरी खाई का परिणाम है।
शिक्षा का विस्तार, लेकिन गुणवत्ता का संकट
पिछले कुछ दशकों में भारत में साक्षरता दर तेजी से बढ़ी है। स्कूलों और कॉलेजों की संख्या बढ़ी, विश्वविद्यालय खुले, ऑनलाइन शिक्षा आई और उच्च शिक्षा तक पहुंच आसान हुई।
लेकिन शिक्षा का यह विस्तार कई बार केवल “संख्या” तक सीमित रह गया।
डिग्रियां बढ़ीं, लेकिन दक्षता नहीं।
अंक बढ़े, लेकिन समझ नहीं।
सर्टिफिकेट बढ़े, लेकिन आत्मविश्वास नहीं।
आज अनेक विद्यार्थी किताबों को रटकर परीक्षा पास कर लेते हैं, लेकिन जब उनसे किसी समस्या का समाधान पूछो, तो वे असहज हो जाते हैं।
यह स्थिति बताती है कि शिक्षा और स्किल के बीच कहीं न कहीं गंभीर disconnect पैदा हो गया है।
रटने वाली शिक्षा ने सोचने की क्षमता कम की
हमारी शिक्षा प्रणाली का बड़ा हिस्सा अभी भी रटने पर आधारित है।
बच्चों को बचपन से सिखाया जाता है—
प्रश्न याद करो
उत्तर याद करो
परीक्षा में लिख दो
अच्छे अंक ले आओ
लेकिन बहुत कम जगह यह सिखाया जाता है कि—
सवाल कैसे पूछें
समस्या कैसे समझें
नई चीज कैसे बनाएं
असफलता से कैसे सीखें
टीम में कैसे काम करें
परिणाम यह हुआ कि विद्यार्थी “जानकारी” तो इकट्ठा कर लेते हैं, लेकिन “कौशल” विकसित नहीं कर पाते।
ज्ञान केवल किताबों में सीमित रह जाता है, जीवन में उतर नहीं पाता।
डिग्री को सफलता मान लेने की भूल
हमारे समाज में लंबे समय तक यह धारणा बनी रही कि अच्छी नौकरी का मतलब है—
अच्छी डिग्री।
इस सोच ने शिक्षा को “डिग्री प्राप्त करने की दौड़” बना दिया।
कई विद्यार्थी अपनी रुचि जाने बिना केवल भीड़ के पीछे चल पड़ते हैं।
किसी को इंजीनियर बनना है क्योंकि पड़ोसी का बेटा बना
किसी को डॉक्टर इसलिए बनना है क्योंकि समाज में प्रतिष्ठा है
किसी को सरकारी नौकरी चाहिए क्योंकि उसे सुरक्षित माना जाता है
लेकिन जब रुचि और योग्यता का मेल नहीं होता, तो स्किल का विकास भी अधूरा रह जाता है।
स्कूलों में जीवन कौशल की कमी
आज भी अधिकांश स्कूलों में बच्चों को किताबें पढ़ाई जाती हैं, लेकिन जीवन जीने की कला कम सिखाई जाती है।
बहुत कम स्कूलों में ध्यान दिया जाता है—
संचार कौशल पर
आलोचनात्मक सोच पर
नेतृत्व पर
वित्तीय साक्षरता पर
समस्या समाधान पर
भावनात्मक बुद्धिमत्ता पर
परिणामस्वरूप छात्र परीक्षा तो पास कर लेते हैं, लेकिन वास्तविक जीवन की चुनौतियों में संघर्ष करने लगते हैं।
प्रयोगशालाएं और प्रैक्टिकल केवल औपचारिकता बन गए
विज्ञान पढ़ाया जाता है, लेकिन प्रयोग कम होते हैं।
कंप्यूटर पढ़ाया जाता है, लेकिन कोडिंग का अभ्यास सीमित रहता है।
व्यवसाय पढ़ाया जाता है, लेकिन उद्यमिता का अनुभव नहीं दिया जाता।
अनेक विद्यालयों और कॉलेजों में प्रयोगशालाएं केवल निरीक्षण के समय खुलती हैं।
प्रैक्टिकल फाइलें इंटरनेट से कॉपी हो जाती हैं।
ऐसे में विद्यार्थी “सीखने” के बजाय केवल “औपचारिकता पूरी” करना सीख जाते हैं।
भाषा का संकट भी स्किल विकास में बाधा
भारत में लाखों विद्यार्थी ऐसे हैं जिनके पास ज्ञान तो होता है, लेकिन वे उसे सही ढंग से व्यक्त नहीं कर पाते।
विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में कई प्रतिभाशाली छात्र केवल इसलिए पीछे रह जाते हैं क्योंकि
उन्हें अंग्रेजी बोलने का आत्मविश्वास नहीं होता
प्रस्तुति कौशल कमजोर होता है
इंटरव्यू देने का अभ्यास नहीं होता
यह समस्या केवल भाषा की नहीं, खुलासा की भी है।
मोबाइल और इंटरनेट: ज्ञान का साधन या ध्यान भटकाने का माध्यम?
डिजिटल युग में जानकारी पाना पहले से आसान हुआ है।
आज एक मोबाइल फोन पर दुनिया का ज्ञान उपलब्ध है।
लेकिन दुखद बात यह है कि तकनीक का उपयोग सीखने से ज्यादा मनोरंजन में हो रहा है।
घंटों तक लघु वीडियो देखने वाले अनेक युवा किसी विषय पर 20 मिनट ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते।
धीरे-धीरे—
धैर्य कम हो रहा है
गहराई से पढ़ने की आदत खत्म हो रही है
एकाग्रता कमजोर हो रही है
यह भी स्किल विकास में बड़ी बाधा बन रहा है।
रोजगार बाजार तेजी से बदल गया, शिक्षा पीछे रह गई
आज कंपनियों को केवल डिग्रीधारी कर्मचारी नहीं चाहिए।
उन्हें चाहिए—
समस्या हल करने वाले लोग
नई तकनीक सीखने वाले लोग
टीम में काम करने वाले लोग
रचनात्मक सोच रखने वाले लोग
लेकिन अनेक कॉलेज अभी भी पुराने पाठ्यक्रम पढ़ा रहे हैं।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा विज्ञान, साइबर सुरक्षा, रोबोटिक्स, डिजिटल मार्केटिंग
जैसे क्षेत्रों की मांग बढ़ रही है, लेकिन अनेक छात्र अब भी केवल पारंपरिक नोट्स तक सीमित हैं।
बेरोजगारी का एक कारण “स्किल गैप”
आज भारत में बड़ी संख्या में युवा बेरोजगार हैं, जबकि कंपनियां कहती हैं कि उन्हें योग्य लोग नहीं मिल रहे।
यह विरोधाभास “स्किल गैप” को दर्शाता है।
अर्थात—
नौकरी है
युवा भी हैं
लेकिन आवश्यक कौशल का मेल नहीं हो पा रहा
यह स्थिति केवल युवाओं के लिए नहीं, देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी चिंता का विषय है।
माता-पिता और समाज की भूमिका
कई बार परिवार भी अनजाने में बच्चों पर केवल अंक लाने का दबाव डालते हैं।
95% अंक चाहिए
रैंक चाहिए
प्रतियोगिता जीतनी है
लेकिन बहुत कम पूछा जाता है—
बच्चा क्या सीख रहा है?
उसकी रुचि क्या है?
उसमें कौन-सी प्राकृतिक प्रतिभा है?
यदि बच्चा संगीत, खेल, कला, डिजाइन, लेखन, कृषि, तकनीक या किसी अन्य क्षेत्र में कुशल है, तो उसे प्रोत्साहन मिलना चाहिए।
हर सफलता केवल डॉक्टर या इंजीनियर बनने में नहीं छिपी होती।
स्किल क्या है?
स्किल केवल मशीन चलाना या तकनीकी ज्ञान नहीं है।
स्किल का अर्थ है—
किसी काम को दक्षता से करने की क्षमता
परिस्थिति के अनुसार निर्णय लेना
संवाद करना
सहयोग करना
समय प्रबंधन करना
नई चीजें सीखना
समस्याओं का समाधान निकालना
स्किल व्यक्ति को केवल नौकरी नहीं, जीवन जीने योग्य बनाती है।
नई शिक्षा नीति और स्किल आधारित शिक्षा
भारत की नई शिक्षा नीति ने स्किल आधारित शिक्षा पर जोर दिया है।
इसमें—
व्यावसायिक शिक्षा
कोडन
प्रशिक्षण
अनुभवात्मक शिक्षा
बहुविषयक शिक्षा
जैसे पहलुओं को महत्व दिया गया है।
यदि इन नीतियों को सही तरीके से लागू किया जाए, तो शिक्षा और कौशल के बीच की दूरी कम हो सकती है।
क्या किया जाना चाहिए?
1. रटने के बजाय समझ आधारित शिक्षा
बच्चों को प्रश्न पूछने और सोचने के लिए प्रेरित करना होगा।
2. स्कूल स्तर से स्किल ट्रेनिंग
संचार, डिजिटल कौशल, वित्तीय जागरूकता
जैसी चीजें प्रारंभिक स्तर से पढ़ानी होंगी।
3. अधिक प्रैक्टिकल शिक्षा
किताबों के साथ वास्तविक अनुभव जरूरी है।
4. इंटर्नशिप और उद्योग से जुड़ाव
कॉलेजों को कंपनियों और स्थानीय उद्योगों से जोड़ना होगा।
5. बच्चों की रुचि पहचानना
हर बच्चा अलग है। शिक्षा को उसकी प्रतिभा के अनुसार दिशा मिलनी चाहिए।
6. तकनीक का सकारात्मक उपयोग
मोबाइल केवल मनोरंजन का साधन नहीं, सीखने का माध्यम भी बन सकता है।
युवा क्या करें?
केवल डिग्री पर निर्भर न रहें
नई स्किल सीखते रहें
इंटरनेट का उपयोग सीखने में करें
संचार कौशल सुधारें
इंटर्नशिप और अनुभव प्राप्त करें
किताबों से बाहर भी सीखें
असफलता से डरें नहीं
आज का समय “ निरंतर सीखना” का है।
जो लगातार सीखता रहेगा, वही आगे बढ़ेगा।
निष्कर्ष
भारत में पढ़ाई जरूर बढ़ी है, लेकिन स्किल विकास की गति उतनी तेज नहीं बढ़ पाई।
इसका कारण केवल शिक्षा व्यवस्था नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक सोच, परीक्षा आधारित संस्कृति और व्य
वहारिक सीखने की कमी भी है।
अब समय आ गया है कि हम शिक्षा को केवल डिग्री या अंकों तक सीमित न रखें।
हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जो बच्चों को केवल “पढ़ा-लिखा” नहीं, बल्कि “कुशल, आत्मविश्वासी और सक्षम” बनाए।
क्योंकि भविष्य केवल उन लोगों का नहीं होगा जिनके पास डिग्री होगी,
बल्कि उन लोगों का होगा जिनके पास सीखने, बदलने और काम करने की वास्तविक क्षमता होगी।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब


