करोड़ों खर्च के बाद भी यात्रियों को नहीं मिल रही त्वरित मदद, कई बसों में सिस्टम बंद या निष्क्रिय
लखनऊ।उत्तर प्रदेश स्टेट रोडवेज ट्रांसपोर्ट कारपोरेशन की बसों में यात्रियों, खासकर महिलाओं की सुरक्षा के लिए लगाए गए पैनिक बटन अब केवल “दिखावटी व्यवस्था” बनकर रह गए हैं। सुरक्षा के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद अधिकांश यात्रियों को यह तक जानकारी नहीं कि बसों में लगे पैनिक बटन काम भी करते हैं या नहीं। कई मामलों में शिकायतें सामने आई हैं कि बटन दबाने के बाद न तो कोई अलर्ट पहुंचता है और न ही तत्काल सहायता मिलती है।
उत्तर प्रदेश में रोडवेज की लगभग 12 हजार से अधिक बसें विभिन्न रूटों पर संचालित हो रही हैं। महिलाओं की सुरक्षा और आपातकालीन स्थितियों से निपटने के लिए चरणबद्ध तरीके से हजारों बसों में पैनिक बटन और जीपीएस आधारित ट्रैकिंग सिस्टम लगाए गए थे। दावा किया गया था कि बटन दबाते ही कंट्रोल रूम, पुलिस और परिवहन विभाग को अलर्ट पहुंच जाएगा, जिससे तत्काल मदद मिल सकेगी।
लेकिन जमीनी स्थिति कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। यात्रियों और परिवहन कर्मचारियों के अनुसार बड़ी संख्या में बसों में पैनिक बटन या तो तकनीकी खराबी के चलते बंद पड़े हैं या केवल औपचारिकता बनकर रह गए हैं। कई बस चालकों और परिचालकों को भी सिस्टम के संचालन की पूरी जानकारी नहीं है।
परिवहन विभाग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि प्रदेशभर में हजारों बसों में लगाए गए सुरक्षा उपकरणों के रखरखाव और मॉनिटरिंग की व्यवस्था बेहद कमजोर है। कई डिपो में महीनों से खराब सिस्टम की मरम्मत तक नहीं हुई। कुछ बसों में जीपीएस काम नहीं कर रहा, तो कहीं पैनिक बटन कंट्रोल रूम से लिंक ही नहीं हैं।
महिला सुरक्षा को लेकर सरकार ने निर्भया फंड और अन्य योजनाओं के तहत बड़े स्तर पर बजट जारी किया था। परिवहन विभाग के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में हजारों बसों में सुरक्षा उपकरण लगाने पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए। लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि जब जरूरत पड़ने पर सिस्टम काम ही नहीं करेगा तो यात्रियों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी?
विशेषज्ञों का कहना है कि पैनिक बटन केवल लगाने से सुरक्षा नहीं मिलती, बल्कि उसका लाइव मॉनिटरिंग नेटवर्क, त्वरित रिस्पॉन्स सिस्टम और नियमित तकनीकी जांच जरूरी होती है। यदि कंट्रोल रूम में 24 घंटे निगरानी न हो तो पूरा सिस्टम केवल कागजी उपलब्धि बनकर रह जाता है।
रोडवेज कर्मचारियों के मुताबिक कई बार यात्रियों द्वारा शिकायत किए जाने के बावजूद तकनीकी कंपनियों और विभागीय स्तर पर गंभीरता नहीं दिखाई जाती। कुछ बसों में तो बटन केवल शोपीस की तरह लगे हुए हैं, जिनका किसी नेटवर्क से कोई सक्रिय संपर्क नहीं है।
यात्रियों का कहना है कि रात के सफर और सुनसान रूटों पर महिलाओं और बुजुर्ग यात्रियों को सबसे अधिक सुरक्षा की जरूरत होती है। लेकिन यदि आपात स्थिति में पैनिक बटन दबाने के बाद भी मदद न मिले तो यह व्यवस्था यात्रियों के साथ मजाक से कम नहीं।
परिवहन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रोडवेज बसों में लगे सुरक्षा सिस्टम का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए तो कई चौंकाने वाले खुलासे हो सकते हैं। क्योंकि सुरक्षा के नाम पर भारी बजट खर्च होने के बावजूद जमीनी स्तर पर व्यवस्था बेहद कमजोर दिखाई दे रही है।


