– अमित शाह के नेतृत्व मे बिना शोर की रणनीति से बदली भाजपा की चुनावी दिशा
-शरद कटियार
लखनऊ/कोलकाता। भारतीय राजनीति में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जो मंच पर कम और पर्दे के पीछे ज्यादा असर छोड़ते हैं। भाजपा के वरिष्ठ संगठनकर्ता सुनील बंसल ऐसे ही “साइलेंट गेम चेंजर” बनकर उभरे हैं। उत्तर प्रदेश में संगठन की जमीनी पकड़ मजबूत करने के बाद अब पश्चिम बंगाल में भी उनकी रणनीति ने सियासी समीकरण बदलने शुरू कर दिए हैं।
करीब एक दशक तक उत्तर प्रदेश में संगठन महामंत्री के रूप में काम करते हुए बंसल ने बूथ स्तर तक कैडर को सक्रिय किया। 2014 और 2017 के चुनावों में भाजपा की ऐतिहासिक जीत के पीछे उनकी माइक्रो मैनेजमेंट रणनीति को अहम माना गया। डेटा आधारित प्लानिंग, बूथ मैनेजमेंट और कार्यकर्ताओं की सीधी मॉनिटरिंग,यही उनका फॉर्मूला रहा।
अब वही मॉडल पश्चिम बंगाल में लागू किया गया। जहां भाजपा लंबे समय तक सीमित प्रभाव वाली पार्टी मानी जाती थी, वहां संगठन विस्तार के लिए बंसल ने “घर-घर संपर्क”, छोटी बैठकों और स्थानीय मुद्दों पर फोकस की रणनीति अपनाई। रिपोर्ट्स के अनुसार लाखों घरों तक पहुंच बनाने के लिए व्यापक अभियान चलाया गया, वहीं हर विधानसभा क्षेत्र में अलग-अलग टारगेटेड प्रोग्राम किए गए।
सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि बंसल ने खुद को कभी सामने नहीं रखा। न बड़े भाषण, न मीडिया में आक्रामक बयान,फिर भी परिणामों में उनकी रणनीति साफ दिखी। यही वजह है कि उन्हें “साइलेंट गेम चेंजर” कहा जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, पश्चिम बंगाल जैसे जटिल सामाजिक समीकरण वाले राज्य में भाजपा का तेजी से उभरना केवल प्रचार का नतीजा नहीं, बल्कि संगठन की गहरी जड़ें जमाने का परिणाम है। बंसल ने वोट बैंक की बारीक समझ के साथ उन वर्गों पर फोकस किया जो पहले मतदान से दूर रहते थे।
यूथ इंडिया विश्लेषण बताता है कि आज की राजनीति में सिर्फ बड़े चेहरे नहीं, बल्कि बैकएंड रणनीतिकार भी चुनावी जीत-हार तय कर रहे हैं। सुनील बंसल का मॉडल इसी बदलाव का उदाहरण है जहां बिना शोर किए, जमीन पर काम करके चुनावी खेल बदला जा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि क्या यही “साइलेंट रणनीति” आने वाले चुनावों में भी भाजपा को बढ़त दिलाएगी, या विपक्ष इसका तोड़ निकाल पाएगा? फिलहाल इतना तय है कि उत्तर प्रदेश के बाद पश्चिम बंगाल में भी सुनील बंसल की एंट्री ने सियासत की दिशा बदलने के संकेत दे दिए हैं।


