30 C
Lucknow
Thursday, April 16, 2026

नारी शक्ति वंदन अधिनियम: याचक से नायक बनने की ओर अग्रसर महिलाएं

Must read

 

(अंजनी सक्सेना-विभूति फीचर्स)
भारत का लोकतंत्र एक ऐतिहासिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। दशकों से लंबित महिला आरक्षण का सपना अब साकार होता दिख रहा है। ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ केवल एक कानून नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति, सामाजिक संरचना और सत्ता संतुलन में एक गहरे बदलाव का संकेत है। यह वह क्षण है, जब देश की आधी आबादी जो अब तक निर्णय प्रक्रिया में सीमित भूमिका निभा रही थी वह अब सत्ता के केंद्र में अपनी निर्णायक उपस्थिति दर्ज कराने जा रही है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में यह अधिनियम भारतीय लोकतंत्र को अधिक समावेशी और प्रतिनिधिक बनाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम है। वहीं मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व में इस कानून को लेकर जो सक्रियता और राजनीतिक वातावरण तैयार किया जा रहा है, वह इसे जमीनी स्तर तक प्रभावी बनाने की मंशा को दर्शाता है। भाजपा प्रदेश कार्यालय में आयोजित पत्रकार वार्ता में भाजपा की वरिष्ठ महिला नेता अर्चना चिटनीस ने इसे “देश का भाग्य बदलने वाला कानून” बताया, जो इस अधिनियम की व्यापकता और महत्व को स्पष्ट करता है।
महिला आरक्षण का मुद्दा न तो नया है और न ही आज का है। स्वतंत्रता के बाद से ही संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की मांग समय-समय पर उठती रही। 1990 के दशक में यह मुद्दा गंभीर राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बना, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में महिला आरक्षण विधेयक लाने का प्रयास हुआ लेकिन उस समय राजनीतिक सहमति के अभाव और विरोध के कारण यह विधेयक पारित नहीं हो सका। इसके बाद भी कई सरकारों ने इस विषय को अपने एजेंडे में शामिल किया, लेकिन ठोस परिणाम सामने नहीं आए। यही कारण है कि वर्तमान सरकार इस अधिनियम को केवल विधायी सफलता नहीं, बल्कि दशकों की प्रतीक्षा के अंत के रूप में प्रस्तुत कर रही है।
सरकार के प्रतिनिधियों का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में महिला सशक्तिकरण को बहुआयामी दृष्टिकोण से आगे बढ़ाया गया है। पहले चरण में महिलाओं को आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त बनाने पर जोर दिया गया। उज्ज्वला योजना, जनधन योजना, मुद्रा योजना जैसी पहलों के माध्यम से महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया गया। अब दूसरा चरण राजनीतिक सशक्तिकरण का है, जिसमें महिलाओं को सीधे सत्ता और नीति निर्माण में भागीदारी दी जा रही है। ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के माध्यम से लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान किया गया है। यह कदम केवल प्रतिनिधित्व बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राजनीति की दिशा और प्राथमिकताओं को भी बदलने की क्षमता रखता है।
मध्यप्रदेश इस परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर उभर रहा है। मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व में राज्य में नगरीय निकायों में पहले से ही महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा है। उल्लेखनीय बात यह है कि महिलाओं का वास्तविक प्रतिनिधित्व इससे भी अधिक, लगभग 54 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। आंकड़ों से स्पष्ट है कि जब महिलाओं को अवसर मिलता है, तो वे न केवल भागीदारी करती हैं, बल्कि नेतृत्व में भी आगे आती हैं। अर्चना चिटनीस का भी कहना है कि यह अधिनियम महिलाओं को “याचक नहीं, बल्कि नायक” बनाएगा। यदि यह कथन केवल राजनीतिक बयान नहीं है तो यह एक बड़े सामाजिक परिवर्तन के संकेत दे रहा है।
महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का सबसे बड़ा प्रभाव नीति निर्माण पर पड़ेगा। यह माना जाता है कि महिलाएं अधिक संवेदनशील और समावेशी दृष्टिकोण के साथ निर्णय लेती हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, महिला सुरक्षा और सामाजिक कल्याण जैसे मुद्दों पर उनकी प्राथमिकताएं स्पष्ट रूप से सामने आएंगी। इससे शासन की गुणवत्ता में सुधार होगा और नीतियों का प्रभाव अधिक व्यापक और संतुलित होगा। यह अधिनियम सामाजिक न्याय की उस अवधारणा को भी मजबूत करता है, जिसमें हर वर्ग और हर लिंग को समान अवसर मिले।
हालांकि इस अधिनियम को लेकर राजनीतिक सहमति पूरी तरह एक जैसी नहीं है। विपक्ष का कहना है कि इसे जनगणना और परिसीमन से जोड़कर लागू करने में देरी की जा रही है। वहीं भाजपा का तर्क है कि यह प्रक्रिया आवश्यक है ताकि आरक्षण का लाभ सही और संतुलित तरीके से सभी क्षेत्रों तक पहुंच सके।
भाजपा नेताओं का यह भी कहना है कि कांग्रेस ने दशकों तक महिला आरक्षण को केवल चुनावी मुद्दा बनाए रखा, जबकि वर्तमान सरकार ने इसे वास्तविकता में बदलने का काम किया। वैसे भी शाहबानो प्रकरण जैसे उदाहरणों के माध्यम से कांग्रेस की नीतियों पर सवाल उठाए जाते रहे हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘आत्मनिर्भर भारत’ का विजन महिलाओं की भागीदारी के बिना अधूरा है। आज महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी क्षमता साबित कर रही हैं। सेना, विज्ञान, प्रशासन, राजनीति और उद्यमिता में उनका योगदान लगातार बढ़ रहा है। देश में महिला राष्ट्रपति, महिला मुख्यमंत्री और अनेक महिला जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी यह संकेत देती है कि भारत अब उस दौर में प्रवेश कर चुका है, जहां महिलाओं का नेतृत्व सामान्य बात बनता जा रहा है। ऐसे में संसद और विधानसभाओं में उनका प्रतिनिधित्व बढ़ाना समय की मांग भी है और लोकतंत्र की आवश्यकता भी।
‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ आने वाले समय में भारतीय राजनीति की दिशा बदल सकता है। जब बड़ी संख्या में महिलाएं संसद और विधानसभाओं में पहुंचेंगी, तो राजनीतिक विमर्श का स्वरूप भी बदलेगा। मुद्दों की प्राथमिकता बदलेगी, निर्णय लेने की शैली बदलेगी और शासन की संवेदनशीलता बढ़ेगी।
मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में, जहां पहले से ही महिलाओं को व्यापक अवसर दिए जा रहे हैं, वहां यह बदलाव और तेजी से दिखाई देगा। मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व में राज्य इस परिवर्तन का अग्रदूत बन सकता है।
‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ केवल एक कानून नहीं, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक विकास का नया अध्याय है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में उठाया गया यह कदम और मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री मोहन यादव द्वारा इसे आगे बढ़ाने की पहल यह दर्शाती है कि अब महिला सशक्तिकरण केवल एक विचार नहीं, बल्कि एक ठोस वास्तविकता बन चुका है। यह अधिनियम उस भारत की नींव रखेगा, जहां महिलाएं केवल मतदाता नहीं, बल्कि नीति निर्धारक होंगी, केवल सहभागी नहीं, बल्कि नेतृत्वकर्ता होंगी। जब देश की आधी आबादी पूरी शक्ति के साथ आगे बढ़ेगी, तो भारत का विकास भी दोगुनी गति से होगा।
आने वाले वर्षों में यह कानून भारतीय राजनीति और समाज दोनों को नई दिशा देगा। एक ऐसी दिशा, जहां समानता, अवसर और नेतृत्व का संतुलन वास्तविक रूप में दिखाई देगा। यही ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ का वास्तविक उद्देश्य और इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि होगी। (विभूति फीचर्स)

Must read

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest article