लखनऊ। अलीगंज क्षेत्र स्थित अवैध बहुमंजिला कोचिंग भवन में हुए भीषण अग्निकांड ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि हादसे के दौरान लोगों द्वारा लगातार सूचना दिए जाने के बावजूद दमकल की पहली गाड़ी करीब 40 मिनट बाद मौके पर पहुंची। वहीं एंबुलेंस सेवा भी समय पर नहीं पहुंच सकी, जिससे राहत एवं बचाव कार्य प्रभावित हुआ।
जांच में यह भी खुलासा हुआ है कि वर्ष 2016 में भवन के ध्वस्तीकरण के आदेश जारी किए गए थे, लेकिन मात्र दो माह बाद एलडीए ने अपना आदेश वापस ले लिया। जिस भवन में हादसा हुआ, वहां 20 किलोवाट का बिजली कनेक्शन स्वीकृत था, जबकि वास्तविक खपत 34 किलोवाट तक पहुंच गई थी।
सबसे गंभीर तथ्य यह है कि भवन के पास फायर विभाग की अनापत्ति प्रमाणपत्र नहीं थी। इसके बावजूद वर्षों तक भवन का संचालन जारी रहा। अब इस मामले में एलडीए, दमकल विभाग, नगर निगम और अन्य संबंधित एजेंसियों की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं।
प्रश्न यह है कि यदि समय रहते कार्रवाई होती, भवन मानकों की जांच होती और आपातकालीन सेवाएं समय पर पहुंचतीं, तो क्या 18 लोगों की जान बचाई जा सकती थी? यह हादसा केवल आग का नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और जवाबदेही के अभाव का भी प्रतीक बन गया है।
अब प्रदेश सरकार ने मामले की जांच के निर्देश दिए हैं, लेकिन मृतकों के परिजनों के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर उनकी अपनों की जान का जिम्मेदार कौन है?


