लखनऊ। राजधानी में औषधि विभाग की टीम ने 214 अस्पतालों की दवा दुकानों में छापेमारी कर दवाओं की खरीद कीमत और अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी ) के बीच भारी अंतर का खुलासा किया है। जांच में कई दवाओं की खरीद कीमत की तुलना में एमआरपी कई गुना अधिक पाई गई।
जांच के दौरान पॉलिमिक्सिन-बी इंजेक्शन की खरीद कीमत केवल 74 रुपये, जबकि इसकी एमआरपी 4981 रुपये मिली। इसी तरह गुफिपोल की खरीद 90 रुपये में हुई, जबकि इसकी एमआरपी 4528 रुपये दर्ज मिली।
टर्लीप्रेसिन इंजेक्शन की खरीद कीमत 56 रुपये के मुकाबले एमआरपी 3050 रुपये पाई गई। वहीं कोलिस्टिमेथेट 4.5 MIU की खरीद कीमत 210 रुपये, जबकि इसकी एमआरपी 9702 रुपये दर्ज मिली।
इसी प्रकार टिगेसाइक्लिन इंजेक्शन की खरीद कीमत 154.54 रुपये बताई गई, जबकि इसकी एमआरपी 7110 रुपये मिली।
जांच में 36 दवाओं की MRP खरीद कीमत से 10 गुना से अधिक होने की बात सामने आई है। कुछ दवाओं में खरीद कीमत और एमआरपी के बीच 67 गुना तक का अंतर पाया गया।
इस कार्रवाई के बाद निजी अस्पतालों में मरीजों से दवाओं के नाम पर वसूली जाने वाली रकम पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि कुछ अस्पतालों में मरीजों को बिस्तर की सुविधा और दवाओं के नाम पर भारी आर्थिक बोझ उठाना पड़ रहा है तथा दवाओं की बिक्री में अत्यधिक मुनाफा कमाया जा रहा है।
अब देखना यह है कि औषधि विभाग की जांच के बाद संबंधित अस्पतालों और दवा दुकानों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाती है।


