– जनगणना के बहाने सियासी बिसात बिछनी शुरू
– सत्ता और विपक्ष दोनों अलर्ट
शरद कटियार
उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक सवाल तेजी से तैर रहा है—क्या 2027 का विधानसभा चुनाव तय समय से पहले कराया जा सकता है? अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन सत्ता के गलियारों से लेकर विपक्षी खेमों तक गतिविधियां जिस तेजी से बढ़ी हैं, उसने राजनीतिक पर्यवेक्षकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
कारण है आगामी जनगणना। यदि फरवरी-मार्च 2027 में जनगणना का बड़ा अभियान चलना है, तो उसी समय प्रदेश के सबसे बड़े लोकतांत्रिक महायज्ञ विधानसभा चुनाव को कराना प्रशासनिक दृष्टि से आसान नहीं माना जा रहा। यही वजह है कि राजनीतिक हलकों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि चुनाव 2026 के अंतिम महीनों में भी कराए जा सकते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि चुनाव की कोई घोषणा नहीं हुई, लेकिन राजनीतिक दलों की गतिविधियां देखकर लगता है कि उन्हें किसी संकेत का इंतजार नहीं है। भाजपा बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय कर रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लगातार जिलों के दौरे, समीक्षा बैठकों और विकास परियोजनाओं के उद्घाटन में व्यस्त हैं। मंत्रियों को जिलों में भेजा जा रहा है और अधिकारियों की जवाबदेही तय की जा रही है।
दूसरी ओर समाजवादी पार्टी भी असामान्य रूप से सक्रिय दिखाई दे रही है। पीडीए का नारा हो, संगठन विस्तार हो या सरकार के खिलाफ मुद्दों की तलाश—अखिलेश यादव की टीम चुनावी मोड में नजर आ रही है। सवाल यह है कि आखिर दोनों बड़े दलों को ऐसी कौन सी आहट सुनाई दे रही है जो आम जनता को अभी सुनाई नहीं दे रही?
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि दिल्ली और लखनऊ दोनों जगहों पर जनगणना, परिसीमन और भविष्य की चुनावी रणनीतियों को लेकर मंथन चल रहा है। भाजपा जानती है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में मिले संदेश को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वहीं सपा मानती है कि यदि उसे सत्ता में वापसी करनी है तो 2027 का इंतजार करने के बजाय अभी से मैदान में उतरना होगा।
यूपी की राजनीति में एक पुरानी कहावत है”जब नेता अचानक जनता के बीच ज्यादा दिखने लगें, तो समझिए चुनाव दूर नहीं हैं।” आज वही तस्वीर दिखाई दे रही है। मंत्री जिलों में हैं, सांसद गांवों में हैं, विधायक जनता दरबार लगा रहे हैं और विपक्ष सरकार की हर सांस पर नजर रखे हुए है।
हालांकि संवैधानिक रूप से विधानसभा का कार्यकाल पूरा होने से पहले चुनाव कराने का फैसला चुनाव आयोग और परिस्थितियों पर निर्भर करेगा, लेकिन राजनीति में कई बार घटनाएं घोषणा से पहले संकेतों में दिखाई देने लगती हैं। आज उत्तर प्रदेश की राजनीति में ऐसे ही संकेत दिखाई दे रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि चुनाव कब होंगे। बड़ा सवाल यह है कि क्या भाजपा तीसरी बार सत्ता का रिकॉर्ड बनाएगी या सपा सत्ता में वापसी का रास्ता खोज लेगी? जनगणना तो एक प्रशासनिक प्रक्रिया है, लेकिन उसके बहाने शुरू हुई राजनीतिक हलचल ने साफ कर दिया है कि उत्तर प्रदेश का चुनावी रण अब दूर नहीं है।
यूपी में चुनाव की तारीख भले तय न हुई हो, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी घड़ियां चुनावी समय पर सेट कर दी हैं।


