– एसआईटी जांच से खुल रहीं नई परतें
अयोध्या। भगवान श्रीराम की जन्मभूमि पर बने भव्य राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए जाने वाले दान (रामधन) में कथित गबन और वित्तीय अनियमितताओं का मामला लगातार गंभीर होता जा रहा है। विशेष जांच दल (एसआईटी) की जांच में अब तक कई ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जिन्होंने मंदिर की वित्तीय व्यवस्था, नियुक्ति प्रक्रिया और निगरानी तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामले में आठ आरोपी न्यायिक हिरासत में हैं, जबकि जांच एजेंसियां पूरे नेटवर्क और प्रशासनिक जिम्मेदारियों की पड़ताल में जुटी हैं।
जांच के दौरान सबसे बड़ा खुलासा उस समय हुआ जब एसआईटी को पता चला कि चढ़ावे की गणना जैसे अत्यंत संवेदनशील कार्य का प्रभारी बनाए गए सुभाष श्रीवास्तव का अतीत विवादों से जुड़ा रहा है। जांच में सामने आया कि वह पहले सिंडिकेट बैंक में कार्यरत था और गबन के आरोपों के कारण उसे सेवा से बर्खास्त किया गया था। बाद में न्यायालय के आदेश से उसकी बहाली हुई, लेकिन उसके पूर्व रिकॉर्ड का समुचित सत्यापन किए बिना उसे राम मंदिर में नियुक्त कर दिया गया। इतना ही नहीं, उसे चढ़ावे की गणना जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी सौंप दी गई।
एसआईटी अब यह पता लगाने में जुटी है कि नियुक्ति प्रक्रिया में किन अधिकारियों और जिम्मेदार व्यक्तियों की भूमिका रही तथा क्या नियुक्ति के समय निर्धारित नियमों का पालन किया गया था। इसी क्रम में धर्म सेना प्रमुख संतोष दुबे से भी पूछताछ की जा चुकी है। जांच एजेंसी नियुक्ति से जुड़े दस्तावेज, अनुमोदन प्रक्रिया और प्रशासनिक निर्णयों का गहन परीक्षण कर रही है।
मामले में गिरफ्तार किए गए आठों आरोपियों को 26 जून से जिला जेल में न्यायिक हिरासत में रखा गया है। विशेष न्यायाधीश (एंटी करप्शन) की अदालत में उनकी नियमित पेशी हो रही है और सुरक्षा कारणों से कई बार वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से भी सुनवाई कराई गई। जांच एजेंसियां आरोपियों से पूछताछ के आधार पर धन के लेनदेन, रिकॉर्ड और अन्य संबंधित व्यक्तियों की भूमिका की जांच कर रही हैं।
सूत्रों के अनुसार, एसआईटी मंदिर में दान की प्राप्ति, गणना, रिकॉर्ड संधारण, बैंक में जमा करने की प्रक्रिया और वित्तीय नियंत्रण व्यवस्था का भी ऑडिट कर रही है। जांच का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि कथित अनियमितता व्यक्तिगत स्तर तक सीमित थी या फिर इसमें किसी संगठित नेटवर्क अथवा प्रशासनिक लापरवाही की भूमिका भी रही।
राम मंदिर में प्रतिदिन देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं और बड़ी मात्रा में दान अर्पित करते हैं। ऐसे में यह मामला केवल वित्तीय अनियमितता तक सीमित नहीं है, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास से भी जुड़ा हुआ माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि धार्मिक संस्थानों में वित्तीय प्रबंधन पूरी तरह पारदर्शी, डिजिटल और बहुस्तरीय निगरानी प्रणाली के तहत होना चाहिए, ताकि किसी भी प्रकार की गड़बड़ी की संभावना न्यूनतम रहे।
राम मंदिर देश की आस्था का केंद्र है। इसलिए इस प्रकरण को किसी धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि पारदर्शिता, जवाबदेही और सुशासन के नजरिए से देखा जाना चाहिए। यदि जांच में कोई भी व्यक्ति दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं, जिन पर आरोप हैं, उनके दोष या निर्दोष होने का अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया और जांच के निष्कर्षों के आधार पर ही होगा।


