छह साल बाद फर्रुखाबाद में अमानक स्लीपर बसों का माफिया बेखौफ
अब बड़े हादसे की आशंका
फर्रुखाबाद। कन्नौज के घिलोई में छह साल पहले स्लीपर बस अग्निकांड में 10 यात्रियों की जिंदा जलकर मौत हुई थी, लेकिन फर्रुखाबाद में स्लीपर बसों की मनमानी पर पूरी तरह लगाम नहीं लग सकी है। जिले में दिल्ली, जयपुर समेत कई शहरों के लिए संचालित होने वाली बसों में सुरक्षा मानकों की अनदेखी के आरोप सामने आ रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि यात्री सुविधा के नाम पर चल रही कुछ बसें खुद यात्रियों की जान के लिए खतरा बनती दिखाई दे रही हैं। 23 सितंबर की रात यमुना एक्सप्रेसवे पर स्लीपर बस में आग लगने से नौ यात्रियों की मौत ने एक बार फिर इस पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
छह साल पहले घिलोई में जिंदा जल गए थे 10 यात्री
10 जनवरी 2020 को कन्नौज के छिबरामऊ कोतवाली क्षेत्र के घिलोई गांव के पास ट्रक की टक्कर के बाद स्लीपर बस में भीषण आग लग गई थी। इस हादसे में 10 यात्रियों की मौत हुई थी। मृतकों में कमालगंज थाना क्षेत्र के उगरापुर गांव के एक ही परिवार के पांच लोग शामिल थे। छह वर्ष बाद भी यदि स्लीपर बसों में सुरक्षा मानकों को लेकर सवाल उठ रहे हैं तो यह हादसे से सबक लेने के दावों पर बड़ा प्रश्नचिह्न है।
23 सितंबर का हादसा फिर दे गया चेतावनी
यमुना एक्सप्रेसवे पर 23 सितंबर की रात करीब 11:30 बजे कश्मीरी गेट से महोबा जा रही स्लीपर बस में आग लग गई। रिपोर्टों के अनुसार बस में करीब 30 से 35 यात्री सवार थे और हादसे में नौ यात्रियों की मौत हुई। चालक और परिचालक को गिरफ्तार किया गया है। इस घटना के बाद स्लीपर बसों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर देशभर में फिर गंभीर सवाल उठे हैं।
फर्रुखाबाद में 100 से अधिक अमानक बसों का दावा
स्थानीय पड़ताल में जिले में 100 से अधिक अमानक स्लीपर बसें संचालित होने का दावा किया गया है। ये बसें दिल्ली, जयपुर समेत दूसरे शहरों के लिए अलग-अलग स्थानों से यात्रियों को बैठाती हैं। चांदपुर के पास पेट्रोल पंप पर खड़ी बसों में पीछे शीशे की जगह टिन लगी मिली। आईटीआई चौराहे के पास भी ऐसी कमियां सामने आने की बात कही गई है।
पीछे शीशे की जगह टिन, आपातकालीन खिड़की भी सवालों में
जिन बसों की पड़ताल की गई, उनमें पीछे की ओर जहां शीशा होना चाहिए वहां टिन लगी मिली। एक बस में पीछे करीब डेढ़ गुणा डेढ़ फीट का ही शीशा दिखाई दिया। साइड में निर्धारित आपातकालीन खिड़की की जगह पीछे खिड़की होने की बात सामने आई। आग या दुर्घटना की स्थिति में यात्रियों के बाहर निकलने के रास्ते ही सवालों के घेरे में हों तो खतरा कितना बड़ा हो सकता है, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
इतनी संकरी गैलरी कि आपात स्थिति में फंस सकते हैं यात्री
बसों के भीतर यात्रियों के निकलने वाली गैलरी बेहद संकरी होने की बात सामने आई है। दो यात्रियों का एक साथ निकलना मुश्किल बताया गया। सीटों के बीच दूरी कम करके अतिरिक्त सीटें लगाने से यात्रियों को परेशानी होती है। आग लगने जैसी स्थिति में कुछ सेकंड ही जिंदगी और मौत के बीच का अंतर तय करते हैं, ऐसे में संकरी निकासी व्यवस्था गंभीर चिंता का विषय है।
छत और डिक्की में माल, आग बुझाने के इंतजाम पर भी सवाल
एक स्थानीय रिपोर्ट में स्लीपर बसों की अमानक डिक्की और छत पर भारी मात्रा में बिना बिल-वाउचर माल ले जाने के आरोप भी सामने आए हैं। आग बुझाने के पर्याप्त इंतजाम नहीं होने का भी दावा किया गया है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है, लेकिन यदि बसों में यात्रियों के साथ इस तरह माल ढोया जा रहा है तो परिवहन और अग्नि सुरक्षा दोनों स्तरों पर जांच जरूरी है।
बुकिंग काउंटरों का भी फैला जाल
आईटीआई चौराहा, कादरीगेट और ग्रामीण क्षेत्रों में स्लीपर बसों के बुकिंग काउंटर संचालित होने की बात सामने आई है। रोडवेज बस अड्डे के आसपास भी ऐसे काउंटरों को लेकर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि परमिट में निर्धारित स्थानों के अलावा रास्ते में अलग-अलग जगह से यात्रियों को बैठाया जाता है। ऐसे में परमिट, फिटनेस और वास्तविक संचालन की जांच जरूरी हो जाती है।
कार्रवाई भी हुई, फिर सड़क पर सवाल क्यों?
एआरटीओ प्रवर्तन सुभाष राजपूत के अनुसार स्लीपर बसों की लगातार जांच की जा रही है। कागजात के साथ इमरजेंसी विंडो, पीछे शीशा और अन्य सुरक्षा मानकों की जांच की जाती है। सितंबर में छह स्लीपर बसों को सीज किए जाने की जानकारी दी गई है। इससे पहले 9 सितंबर की कार्रवाई में आठ बसों के चालान और छह बसों के सीज किए जाने की भी रिपोर्ट सामने आई थी।
असली सवाल—जांच के बाद भी कमियां कैसे बच रही हैं?
बसों की चेकिंग और सीज करने की कार्रवाई अपनी जगह है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि यदि सुरक्षा मानकों में गंभीर कमी है तो ऐसी बसें फिटनेस जांच पार करके सड़क तक पहुंचती कैसे हैं? यात्रियों की सुरक्षा केवल कागजों में फिटनेस प्रमाणपत्र तक सीमित नहीं रह सकती। बस की वास्तविक स्थिति, आपातकालीन निकास, अग्निशमन उपकरण, बर्थ की संरचना, क्षमता और परमिट के अनुसार संचालन की मौके पर जांच जरूरी है।
हादसे का इंतजार या पहले होगी कार्रवाई?
2020 में घिलोई की घटना में 10 लोगों की मौत हुई। अब 23 सितंबर को यमुना एक्सप्रेसवे पर नौ यात्रियों की जान चली गई। इन दो घटनाओं के बीच छह साल का अंतर है, लेकिन स्लीपर बसों की सुरक्षा को लेकर सवाल आज भी मौजूद हैं। फर्रुखाबाद में सामने आई कमियों को देखते हुए सवाल सीधा है—क्या परिवहन विभाग किसी बड़े हादसे का इंतजार करेगा या उससे पहले सभी स्लीपर बसों की वास्तविक सुरक्षा जांच कराएगा? यात्रियों की जिंदगी को केवल परमिट और कागजों के भरोसे छोड़ना किसी भी स्थिति में पर्याप्त नहीं हो सकता।


