(व्यंग्य)
डॉ. विजय गर्ग
शहर के पुराने पुस्तकालय की अलमारी में एक किताब वर्षों से चुपचाप पड़ी थी। उसके पन्ने पीले पड़ चुके थे, जिल्द पर धूल की मोटी परत जम चुकी थी और उसे देखकर लगता था जैसे वह पढ़े जाने के बजाय इतिहास का हिस्सा बनने की तैयारी कर रही हो।
एक दिन उसने पास रखी नई किताब से पूछा, “बहन, तुम्हें कोई पढ़ता भी है?”
नई किताब मुस्कुराई, “मुझे तो लोग अक्सर उठाते हैं। कभी फोटो खींचते हैं, कभी सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हैं। पढ़ना बाद में होगा—अगर समय मिला तो!”
पुरानी किताब ने गहरी साँस ली।
“हमारे समय में लोग किताब खोलते थे तो पढ़ते थे।”
पास रखे मोबाइल ने तुरंत टोका, “आप पुराने जमाने की बातें करती हैं। अब लोग किताबों को खोलने के बजाय मोबाइल खोलते हैं।”
किताब बोली, “लेकिन मोबाइल में ज्ञान भी तो है।”
मोबाइल हँसा, “ज्ञान है, पर उसके साथ नोटिफिकेशन भी हैं। आदमी ज्ञान पढ़ने बैठता है और पाँच मिनट बाद किसी वीडियो में पहुँच जाता है।”
इतने में पुस्तकालय में एक युवक आया। उसने चारों ओर देखा, किताबों की तस्वीरें लीं और बाहर निकल गया।
पुरानी किताब ने पूछा, “क्या वह पढ़ने आया था?”
लाइब्रेरियन ने कहा, “नहीं, वह प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा है।”
“तो किताब क्यों नहीं ली?”
“उसके पास पीडीएफ है।”
किताब ने दुखी होकर कहा, “अच्छा! अब ज्ञान भी डिजिटल हो गया?”
लाइब्रेरियन बोला, “ज्ञान डिजिटल होना समस्या नहीं है। समस्या यह है कि लोग उसे पढ़ने के बजाय डाउनलोड करके भूल जाते हैं।”
अलमारी में सन्नाटा छा गया।
एक मोटी विश्वकोश की किताब बोली, “हमने कभी सोचा था कि एक दिन हमारी जगह मोबाइल की छोटी-सी स्क्रीन ले लेगी।”
पुरानी किताब मुस्कुराई, “स्क्रीन छोटी हो या बड़ी, असली सवाल तो पाठक का है। अगर जिज्ञासा जीवित है, तो ज्ञान कहीं से भी मिल सकता है। लेकिन अगर पढ़ने की आदत ही मर जाए, तो दुनिया की सबसे बड़ी लाइब्रेरी भी खाली लगती है।”
तभी एक छोटा बच्चा पुस्तकालय में आया। उसने धूल साफ की, पुरानी किताब उठाई और एक कोने में बैठकर पढ़ने लगा।
किताब के पन्ने जैसे अचानक चमक उठे।
लाइब्रेरियन ने पूछा, “तुम्हें यह पुरानी किताब क्यों पसंद आई?”
बच्चे ने कहा, “क्योंकि इसमें कोई नोटिफिकेशन नहीं आता।”
पूरे पुस्तकालय में जैसे हँसी गूँज उठी।
पुरानी किताब ने धीरे से कहा, “शायद मेरी कहानी अभी पूरी तरह अनपढ़ी नहीं हुई।”
पुस्तकालय केवल किताबों की अलमारियों का नाम नहीं है। वह समाज की स्मृति, विचार और कल्पना का घर है। किताबें पुरानी हो सकती हैं, लेकिन उनमें छिपे विचार हमेशा पुराने नहीं होते।
आज जरूरत किताबों और डिजिटल माध्यमों में चुनाव करने की नहीं, बल्कि पढ़ने की संस्कृति को बचाने की है। क्योंकि डाउनलोड की गई किताब ज्ञान का संग्रह हो सकती है, लेकिन पढ़ी गई किताब ही विचारों को जन्म देती है।
और शायद पुस्तकालय की सबसे बड़ी विडंबना यही है—उसकी अलमारियाँ किताबों से भरी हैं, लेकिन उसे पाठकों की तलाश है।
डॉ. विजय गर्ग
रिटायर्ड प्रिंसिपल | एजुकेशनल कॉलम्निस्ट | एमिनेंट साइंटिस्ट
स्ट्रीट कौर चंद, मलोट, पंजाब – 152107


