– सियासी गणित में कमल मजबूत
– महिला वोटरों पर नजर
– सरकार की अगली बड़ी सौगात का इंतजार
शरद कटियार
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की सियासत में चुनावी गणित जैसे-जैसे करवट ले रहा है, वैसे-वैसे राजनीतिक दलों की नजर उस वोट बैंक पर टिक रही है, जो चुनाव का रुख बदलने की ताकत रखता है,महिला मतदाता। भाजपा की लगातार चुनावी सफलता को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हैं और व्यंग्य में कहा जाने लगा है कि “वोट मशीन तो भाजपा के पास है, अब देखना यह है कि योगी सरकार महिलाओं के लिए खजाने की चाबी कब घुमाती है।”
यह बात महज राजनीतिक मजाक नहीं है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में महिला मतदाताओं की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण हुई है। भाजपा लंबे समय से कानून-व्यवस्था, कल्याणकारी योजनाओं और महिला सुरक्षा को अपने राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा बनाती रही है। ऐसे में यदि सरकार महिलाओं के लिए किसी बड़े आर्थिक या सामाजिक पैकेज का ऐलान करती है तो उसका राजनीतिक संदेश भी उतना ही बड़ा होगा।
महिला वोटर बनीं सियासत की ‘मास्टर चाबी’
उत्तर प्रदेश में विधानसभा की 403 सीटें हैं और करोड़ों मतदाता चुनावी नतीजों का फैसला करते हैं। इनमें महिला मतदाताओं की भागीदारी लगातार बढ़ी है। यही कारण है कि अब चुनावी रणनीति में महिला वोटर सिर्फ एक वर्ग नहीं, बल्कि सत्ता की चाबी मानी जाती हैं।
भाजपा के रणनीतिकारों के लिए यह समीकरण इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि केंद्र और राज्य की कई योजनाओं का सीधा लाभ महिलाओं तक पहुंचाने पर जोर दिया गया है। उज्ज्वला, प्रधानमंत्री आवास, शौचालय, स्वयं सहायता समूह और विभिन्न सामाजिक सुरक्षा योजनाओं ने महिला मतदाताओं को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया है।
राजनीतिक चर्चाओं में अब सबसे ज्यादा उत्सुकता इस बात को लेकर है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ महिलाओं के लिए अगली बड़ी सौगात के रूप में क्या लेकर आते हैं। यदि सरकार सीधे आर्थिक सहायता, रोजगार, स्वरोजगार, सुरक्षा या महिला उद्यमिता से जुड़ी कोई बड़ी योजना सामने रखती है तो इसका असर सिर्फ सरकारी खजाने पर नहीं, बल्कि चुनावी खजाने पर भी पड़ सकता है।
सियासी गलियारों में इसे लेकर व्यंग्य भी खूब चल रहा है“भाजपा के पास वोट की मशीन है, लेकिन मशीन चलाने के लिए ईंधन चाहिए और महिला वोटर उस ईंधन का सबसे मजबूत हिस्सा बन चुकी हैं।”
सरकार के सामने चुनौती भी कम नहीं है। किसी भी बड़े पैकेज के लिए बजट, पात्रता, क्रियान्वयन और लाभार्थियों तक वास्तविक पहुंच सबसे महत्वपूर्ण होगी। सिर्फ घोषणा से राजनीति नहीं बदलती, बल्कि योजना का लाभ जमीन तक पहुंचना ही असली परीक्षा होती है।
यही वजह है कि यदि योगी सरकार महिलाओं के लिए कोई बड़ा फैसला लेती है तो उसकी सबसे बड़ी कसौटी होगी—कितनी महिलाओं को लाभ मिला, कितना पैसा पहुंचा और कितनी महिलाओं की जिंदगी में वास्तविक बदलाव आया।
फिलहाल सियासत का तापमान बढ़ रहा है। भाजपा समर्थक इसे मजबूत संगठन और योजनाओं का परिणाम बता रहे हैं, विपक्ष अपने सवालों के साथ मैदान में है। लेकिन एक बात पर दोनों पक्षों की नजर लगभग एक जैसी है,महिला मतदाता।
और राजनीति का व्यंग्य यही कह रहा है,“कमल के पास चुनावी मशीनरी तैयार है, अब इंतजार उस चाबी का है जिससे महिलाओं के लिए योगी सरकार का खजाना खुलने वाला है।”


