32 C
Lucknow
Monday, September 14, 2026

थाने-चौकियों के चक्कर न लगाएं कार्यकर्ता! लेकिन जब जनता थाने में पिसे तो किसके दरवाजे जाएं?

Must read

 

– बीएल संतोष की नसीहत ने खडी की नई बहस
– संगठन का पदाधिकारी आखिर जनता की लड़ाई लड़ेगा कैसे?
शरद कटियार
राजनीति में कार्यकर्ता केवल नारे लगाने, झंडे उठाने और चुनाव के समय भीड़ जुटाने के लिए नहीं होता। वह संगठन और जनता के बीच सबसे महत्वपूर्ण कड़ी होता है। आम आदमी जब व्यवस्था के किसी पेंच में फंसता है, पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठता है या किसी कमजोर व्यक्ति की सुनवाई नहीं होती, तो सबसे पहले वह अपने आसपास के राजनीतिक कार्यकर्ता या संगठन के पदाधिकारी के पास ही पहुंचता है। ऐसे में भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री बीएल संतोष की यह नसीहत कि “कार्यकर्ता संगठन का काम करें, थाना और चौकी के चक्कर न लगाएं” निश्चित रूप से गंभीर बहस खड़ी करती है।

बात केवल भाजपा कार्यकर्ताओं की नहीं है। सवाल यह है कि राजनीतिक दलों के जमीनी कार्यकर्ताओं की भूमिका आखिर तय कौन करेगा? यदि कोई कार्यकर्ता किसी पीड़ित की मदद के लिए थाने पहुंचता है, तो क्या वह संगठन से भटक रहा है? अगर किसी गरीब, कमजोर या पीड़ित व्यक्ति की शिकायत पुलिस नहीं सुनती और वह अपनी फरियाद लेकर पार्टी के स्थानीय पदाधिकारी के पास पहुंचता है, तो उस पदाधिकारी का दायित्व क्या होना चाहिए?
जमीनी राजनीति की हकीकत यह है कि थाना और चौकी आम आदमी के लिए सत्ता और प्रशासन का सबसे नजदीकी चेहरा हैं। यहीं से उसे न्याय मिलता है और यहीं से कभी-कभी निराशा भी हाथ लगती है। जब किसी व्यक्ति की शिकायत दर्ज नहीं होती, जब पुलिस कार्रवाई में उसे भटकना पड़ता है या जब उसे लगता है कि उसकी आवाज दब रही है, तब वह किसी विधायक, सांसद या बड़े नेता तक पहुंचने से पहले स्थानीय कार्यकर्ता का दरवाजा खटखटाता है।
ऐसे में अगर कार्यकर्ता से कहा जाए कि वह थाने-चौकी के चक्कर न लगाए, तो स्वाभाविक बात उठती है,फिर जनता की शिकायत लेकर जाएगा कौन?
भाजपा जैसे विशाल राजनीतिक संगठन में पदाधिकारी बनना केवल पद हासिल करना नहीं होना चाहिए। संगठन का पद जनता के बीच जिम्मेदारी का प्रतीक है। यदि कोई कार्यकर्ता या पदाधिकारी किसी पीड़ित की आवाज उठाता है, पुलिस से कानून के दायरे में कार्रवाई की मांग करता है और किसी निर्दोष को परेशान किए जाने पर उसके पक्ष में खड़ा होता है, तो इसे संगठन से विमुख होना कैसे कहा जा सकता है?
हां, यह भी उतना ही जरूरी है कि राजनीतिक कार्यकर्ता पुलिस के काम में अनुचित हस्तक्षेप न करें। कानून को हाथ में लेने या किसी गलत व्यक्ति को बचाने की राजनीति नहीं होनी चाहिए। लेकिन न्याय की मांग करना, शिकायत की निष्पक्ष जांच की मांग करना और पीड़ित की बात संबंधित अधिकारी तक पहुंचाना लोकतांत्रिक राजनीति का स्वाभाविक हिस्सा है।
दरअसल समस्या नसीहत से ज्यादा उस दूरी की है जो संगठन और कार्यकर्ता के बीच पैदा हो सकती है। अगर कार्यकर्ता जनता के बीच रहेगा, उसकी समस्याएं सुनेगा और फिर उन समस्याओं को संगठन तक नहीं पहुंचाएगा, तो संगठन का जमीनी ढांचा कमजोर ही होगा। जनता के बीच रहने वाला कार्यकर्ता आखिर किस मुद्दे पर अपनी राजनीतिक पहचान बनाएगा?
राजनीतिक कार्यकर्ता नेता बनने की राह पर तभी आगे बढ़ता है, जब वह जनता के सुख-दुख में खड़ा दिखाई देता है। चुनाव के दौरान वोट मांगना आसान है, लेकिन किसी पीड़ित परिवार के साथ थाने जाना, अधिकारियों के सामने उसकी बात रखना और उसे यह भरोसा देना कि उसकी आवाज अकेली नहीं है,यही वह काम है जिससे जनता किसी कार्यकर्ता को अपना नेता मानती है।
इसलिए बात बीएल संतोष की नीयत पर नहीं, बल्कि उनकी नसीहत के व्यावहारिक असर पर है। संगठन को यह जरूर देखना चाहिए कि कार्यकर्ता अनावश्यक रूप से थाने-चौकियों की राजनीति में न उलझें, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जब जनता न्याय के लिए कार्यकर्ता के पास आए तो वह उसे निराश करके वापस न लौटाए।
अगर थाने में किसी पीड़ित की सुनवाई नहीं हो रही, तो संगठन का पदाधिकारी चुप बैठ जाए,क्या यही मजबूत संगठन की निशानी होगी? अगर कोई गरीब व्यक्ति पुलिस उत्पीड़न की शिकायत लेकर पार्टी के कार्यकर्ता के पास आता है और कार्यकर्ता उससे कह दे कि “मैं थाने नहीं जाऊंगा”, तो जनता उसके बारे में क्या धारणा बनाएगी?
संगठन को कार्यकर्ताओं को थाने से दूरी की नसीहत देने के साथ-साथ यह भी बताना चाहिए कि जनता की समस्याओं के समाधान के लिए वैकल्पिक और प्रभावी व्यवस्था क्या होगी। केवल यह कह देना कि थाना-चौकी मत जाओ, समस्या का समाधान नहीं है।
क्योंकि राजनीति जनता से दूरी बनाकर नहीं, जनता के बीच खड़े होकर मजबूत होती है। और जिस दिन कार्यकर्ता जनता की पीड़ा से मुंह मोड़ लेगा, उसी दिन उसका संगठनात्मक पद भले बचा रहे, लेकिन उसका जनाधार कमजोर पड़ना शुरू हो जाएगा।
कार्यकर्ता को थाने का दलाल नहीं बनना चाहिए, लेकिन जनता की आवाज का प्रहरी जरूर बनना चाहिए। यही स्वस्थ राजनीति है, यही संगठन की असली ताकत है।

Must read

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest article