रानी लक्ष्मीबाई के अदम्य साहस का गवाह है दुर्ग, बुंदेलखंड के इतिहास और वास्तुकला में रखता है खास स्थान
(डॉ पंकज चतुर्वेदी)झांसी। बुंदेलखंड की धरती पर खड़ा झांसी का ऐतिहासिक किला केवल पत्थरों से बनी एक इमारत नहीं, बल्कि वीरता, स्वाभिमान और संघर्ष की अमर गाथा है। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में रानी लक्ष्मीबाई के अदम्य साहस ने इस दुर्ग को देश के इतिहास में ऐसी पहचान दी, जिसे सदियां भी धुंधला नहीं कर सकीं। आज भी किले की ऊंची प्राचीरें और मजबूत बुर्ज उस दौर के शौर्य की कहानी सुनाते नजर आते हैं।
झांसी के मध्य बंगरा नामक ऊंची चट्टानी पहाड़ी पर बने इस किले का निर्माण ओरछा के बुंदेला शासक राजा वीर सिंह जू देव ने 17वीं शताब्दी के आरंभ में कराया था। वर्ष 1613 के आसपास निर्मित यह दुर्ग उस समय बलवंतनगर के नाम से पहचाने जाने वाले क्षेत्र की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण केंद्र था। ऊंची पहाड़ी पर स्थित होने के कारण यहां से आसपास के विस्तृत भूभाग पर नजर रखना आसान था।
‘झांसी’ नाम पड़ने की भी है रोचक कथा
झांसी नाम को लेकर एक प्रसिद्ध लोककथा भी प्रचलित है। कहा जाता है कि राजा वीर सिंह जू देव ओरछा किले की ऊंचाई से दूर स्थित अपने नए निर्माणाधीन किले की ओर देख रहे थे। उनके साथी ने पूछा कि नया किला कहां बन रहा है। राजा ने दूर दिखाई दे रही पहाड़ी की ओर इशारा करते हुए कहा—वहां जो झाईं सी दिखाई दे रही है, वहीं किला बन रहा है। लोकमान्यता है कि कालांतर में ‘झाईं सी’ से ही ‘झांसी’ नाम प्रचलित हो गया।
बुंदेलों से मराठों तक पहुंचा किला
किले पर लंबे समय तक बुंदेला शासकों का अधिकार रहा। इसके बाद मुगलों और फिर मराठों का प्रभाव यहां स्थापित हुआ। 18वीं शताब्दी में मराठा शासक नारो शंकर ने किले का विस्तार कराया। विस्तार के बाद इसका एक हिस्सा शंकरगढ़ के नाम से जाना गया। आगे चलकर किला पेशवाओं और फिर राजा गंगाधर राव के शासन का महत्वपूर्ण केंद्र बना।
1857 में रानी लक्ष्मीबाई ने लिखी वीरता की इबारत
झांसी किले की सबसे गौरवशाली कहानी रानी लक्ष्मीबाई से जुड़ी है। राजा गंगाधर राव के निधन के बाद अंग्रेजों की हड़प नीति के तहत झांसी को अपने अधीन करने की कोशिश की गई। रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजी सत्ता के सामने झुकने से इनकार कर दिया। वर्ष 1858 में अंग्रेजी सेना ने जनरल ह्यूरोज के नेतृत्व में झांसी किले को घेर लिया। रानी ने किले से ही अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष का नेतृत्व किया और अपने अदम्य साहस से इतिहास में अमिट स्थान बनाया।
मजबूत प्राचीर और शानदार वास्तुकला
किले की विशाल प्राचीरें, बुर्ज, प्रवेश द्वार और सुरक्षा व्यवस्था तत्कालीन स्थापत्य एवं सैन्य कौशल का उदाहरण हैं। किले में अनेक विशाल द्वार और मजबूत बुर्ज बनाए गए थे। कड़क बिजली तोप समेत यहां मौजूद ऐतिहासिक धरोहरें आज भी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र हैं। किले परिसर में रानी महल, शिव मंदिर और गणेश मंदिर भी ऐतिहासिक महत्व रखते हैं।
आज झांसी का किला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में है। यह दुर्ग देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों को अपने गौरवशाली अतीत से रूबरू कराता है। इसकी दीवारों में बुंदेलखंड की वीरता, रानी लक्ष्मीबाई का साहस और स्वतंत्रता के लिए किए गए संघर्ष की वह कहानी दर्ज है, जो आने वाली पीढ़ियों को भी देशभक्ति और स्वाभिमान की प्रेरणा देती रहेगी।
वीरता और शौर्य की अमर गाथा है झांसी का ऐतिहासिक किला


