– भाजपा के सामने आठ सीटें बचाने की चुनौती
– बसपा का उच्च सदन से सफाया तय माना जा रहा
– सपा के खाते में दो सीटों की संभावना
– उम्मीदवारों को लेकर भाजपा-सपा में मंथन तेज
शरद कटियार
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले नवंबर 2026 का राज्यसभा चुनाव बेहद महत्वपूर्ण होने जा रहा है। प्रदेश से 25 नवंबर 2026 को 10 राज्यसभा सदस्यों का कार्यकाल समाप्त होगा। इनमें भाजपा के आठ, समाजवादी पार्टी के एक और बहुजन समाज पार्टी के एक सदस्य शामिल हैं। इन दस सीटों पर होने वाला चुनाव सिर्फ राज्यसभा के आंकड़े बदलने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा और सपा के राजनीतिक समीकरण, सामाजिक संतुलन और संगठनात्मक ताकत की भी परीक्षा मानी जा रही है।
वर्तमान स्थिति में सेवानिवृत्त होने वाले भाजपा के सदस्यों में हरदीप सिंह पुरी, अरुण सिंह, नीरज शेखर, सीमा द्विवेदी, चंद्रप्रभा उर्फ गीता शाक्य, बृजलाल, डॉ. दिनेश शर्मा और बीएल वर्मा शामिल हैं। समाजवादी पार्टी से प्रो. रामगोपाल यादव और बसपा से रामजी गौतम का कार्यकाल समाप्त होगा।
राज्यसभा की आठ सीटों पर भाजपा की दावेदारी मजबूत है, लेकिन उम्मीदवार चयन आसान नहीं होगा। पार्टी के सामने 2027 विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए जातीय और क्षेत्रीय संतुलन साधने की चुनौती होगी।
पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के पुत्र और पूर्व सांसद राजवीर सिंह राजू को लेकर भी भाजपा के भीतर चर्चा की अटकलें हैं। उनके नाम को लेकर पार्टी के अंदर दबाव बनाए जाने की राजनीतिक चर्चाएं हैं। वहीं केंद्रीय मंत्री बीएल वर्मा की सीट पर भी निगाहें टिकी हैं। हालांकि उम्मीदवारों को लेकर भाजपा की ओर से अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।
भाजपा के लिए राज्यसभा चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले संगठन में विभिन्न सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व देने की रणनीति अपना सकती है। ऐसे में मौजूदा सांसदों की वापसी, नए चेहरों को मौका और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व,तीनों के बीच संतुलन बड़ा मुद्दा होगा।
समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रो. रामगोपाल यादव का कार्यकाल समाप्त होने के बाद पार्टी को अपने हिस्से की सीटों के लिए नए समीकरण बनाने होंगे। वर्तमान विधानसभा संख्या बल के आधार पर सपा के दो सीटें जीतने की स्थिति में रहने का अनुमान लगाया जा रहा है।
ऐसे में सपा एक सीट पर अपने किसी प्रमुख मुस्लिम चेहरे को उतार सकती है, जबकि दूसरी सीट के लिए ओबीसी से उम्मीदवार देने की रणनीति पर विचार की चर्चाएं हैं। हालांकि यह अभी राजनीतिक अटकलों का हिस्सा है और अंतिम फैसला सपा नेतृत्व के स्तर पर ही होगा।
प्रो. रामगोपाल यादव की जगह किसे भेजा जाएगा, यह भी सपा के लिए बड़ा सवाल है। पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए राज्यसभा के दोनों संभावित उम्मीदवारों के जरिए सामाजिक समीकरण साधने की कोशिश कर सकती है।
इस चुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक असर बहुजन समाज पार्टी पर पड़ना तय माना जा रहा है। रामजी गौतम बसपा के संसद के दोनों सदनों में इकलौते प्रतिनिधि हैं। उनका कार्यकाल समाप्त होने के बाद मौजूदा विधानसभा संख्या बल के आधार पर बसपा के लिए राज्यसभा की एक सीट जीतना लगभग असंभव माना जा रहा है।
2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा एक भी सीट नहीं जीत सकी थी। ऐसे में रामजी गौतम के कार्यकाल की समाप्ति के बाद पार्टी लोकसभा और राज्यसभा दोनों में शून्य प्रतिनिधित्व की स्थिति में पहुंच सकती है। इसे बसपा के संसदीय इतिहास में बेहद बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है।
उत्तर प्रदेश विधानसभा की मौजूदा तस्वीर में भाजपा के पास 258 विधायक, सपा के 103, अपना दल के 13, रालोद के 9, निषाद पार्टी के 5, सुभासपा के 6, कांग्रेस के 2, जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के 2 और बसपा का एक विधायक है। इसके अलावा सपा के तीन बागी विधायक भी अलग राजनीतिक स्थिति में हैं। कुल 403 विधानसभा सीटों में फिलहाल 402 सीटें भरी हुई हैं।
राज्यसभा चुनाव में एक सीट के लिए करीब 37-38 प्रथम वरीयता मतों की जरूरत पड़ सकती है। इस लिहाज से भाजपा अपने सहयोगी दलों के साथ मजबूत स्थिति में है, जबकि सपा को अपने मौजूदा संख्या बल के आधार पर दो सीटों तक पहुंचने के लिए अपने विधायकों को पूरी तरह एकजुट रखना होगा।
यही कारण है कि 2024 के राज्यसभा चुनाव की तरह क्रॉस वोटिंग, बगावत और प्रथम वरीयता मतों का प्रबंधन इस बार भी निर्णायक हो सकता है। 2024 में भी यूपी की राज्यसभा की 10 सीट…


