– डीएम डॉ. अंकुर लाठर के फोकस में अब ‘स्कूल से सीखने’ तक का सफर
फर्रुखाबाद। जिले के विद्यालयों की व्यवस्था को लेकर जिलाधिकारी डॉ. अंकुर लाठर ने निगरानी का फोकस और व्यापक कर दिया है। अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि स्कूल खुल रहा है या शिक्षक-विद्यार्थी उपस्थित हैं, बल्कि यह भी अहम है कि स्कूल पहुंचने वाला बच्चा वास्तव में कितना सीख रहा है। डीएम के विद्यालय निरीक्षण और छात्र-छात्राओं से सीधे संवाद ने शिक्षा विभाग के सामने गुणवत्ता, उपस्थिति और जवाबदेही को प्राथमिकता देने का स्पष्ट संदेश दिया है।
जनपद में प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक स्तर के 1576 विद्यालयों का बड़ा नेटवर्क है। इतने बड़े नेटवर्क में संसाधनों, शिक्षकों और विद्यार्थियों का समान वितरण अपने आप में चुनौती है। ऐसे में विद्यालयवार आंकड़ों के आधार पर निगरानी और जरूरत के अनुसार हस्तक्षेप शिक्षा व्यवस्था को अधिक प्रभावी बना रहा है।
डीएम डॉ. अंकुर लाठर के हालिया निरीक्षणों में खास बात यह रही कि उन्होंने केवल विद्यालय की भौतिक व्यवस्थाओं और अभिलेखों पर निर्भर रहने के बजाय बच्चों से सीधे सवाल पूछकर उनके ज्ञान का स्तर जानने की कोशिश की।
इससे शिक्षा व्यवस्था की निगरानी का फोकस स्पष्ट होता है,विद्यालय में शिक्षक और संसाधन होना जरूरी है, लेकिन अंतिम परिणाम बच्चे की सीखने की क्षमता में दिखाई देना चाहिए।
जिले में छात्र-शिक्षक अनुपात के आकलन में 347 शिक्षक सरप्लस पाए जाने का आंकड़ा सामने आया है। यह आंकड़ा शिक्षा व्यवस्था में मानव संसाधन के संतुलित इस्तेमाल की जरूरत को रेखांकित करता है।
कहीं छात्र संख्या कम होने के बावजूद शिक्षक अधिक हैं तो कहीं विद्यार्थियों की संख्या के अनुपात में शिक्षकों की आवश्यकता है। ऐसे में विद्यालयवार छात्र संख्या और शिक्षक उपलब्धता के आंकड़ों का मिलान कर जरूरत वाले विद्यालयों तक शिक्षकों का बेहतर वितरण किया जा सकता है।
स्कूल चलो अभियान के जरिए बच्चों को विद्यालय से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है। डीएम डॉ. अंकुर लाठर ने अभियान के दौरान जागरूकता रैली को हरी झंडी दिखाकर अधिक से अधिक बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने का संदेश दिया।
लेकिन नामांकन के बाद अगला सवाल नियमित उपस्थिति का है। रजिस्टर में नाम दर्ज होना शिक्षा की सफलता नहीं है; बच्चे का नियमित स्कूल आना और सीखना असली सफलता है।
इसीलिए विद्यालयों के रिपोर्ट कार्ड में नामांकन के साथ दैनिक उपस्थिति और बच्चों की शैक्षिक उपलब्धि को भी प्रमुखता देना महत्वपूर्ण होगा।
परिषदीय विद्यालयों में सरकार की ओर से भवन, शौचालय, पेयजल, बिजली, पाठ्यपुस्तक, यूनिफॉर्म, मध्यान्ह भोजन और डिजिटल सुविधाओं पर काम किया जा रहा है। अब प्रशासन के सामने चुनौती इन सुविधाओं की उपलब्धता के साथ उनकी गुणवत्ता और उपयोगिता सुनिश्चित करने की है।
डीएम की निगरानी में विद्यालयवार यह देखा जा रहा कि किस स्कूल में कौन सी सुविधा उपलब्ध है, कहां कमी है और किस सुविधा का उपयोग नहीं हो रहा, तो सरकारी योजनाओं का लाभ अधिक प्रभावी ढंग से विद्यार्थियों तक पहुंचाया जा सकता है।
शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर के लिए विद्यालयवार रिपोर्ट कार्ड तैयार करना सबसे प्रभावी कदम साबित हो सकता है। इसमें,नामांकन, दैनिक उपस्थिति, शिक्षक उपलब्धता, छात्र-शिक्षक अनुपात, बच्चों का सीखने का स्तर, मध्यान्ह भोजन, पेयजल, शौचालय, बिजली, भवन और डिजिटल संसाधन
इससे अच्छे प्रदर्शन वाले विद्यालयों की पहचान होगी तो कमजोर स्कूल भी चिन्हित होंगे। फिर प्रशासन यह तय कर सकेगा कि कहां शिक्षक चाहिए, कहां संसाधन, कहां निगरानी और कहां शैक्षिक सुधार की विशेष जरूरत है।
जिलाधिकारी डॉ. अंकुर लाठर की सक्रियता का सबसे सकारात्मक पहलू यह है कि निरीक्षण का केंद्र विद्यालय की चारदीवारी से निकलकर बच्चे की पढ़ाई तक पहुंच रहा है।


