(सुधाकर आशावादी-विनायक फीचर्स)
किसी से किसी की तुलना करना मानवीय स्वभाव है। यदि ऐसा न होता, तो कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली जैसी कहावत न बनती। राई को पर्वत करै पर्वत राई माहि जैसा दोहा कबीर न रचते। तेरी कमीज मेरी कमीज से उजली क्यों जैसे विज्ञापन प्रचार न पाते। जीवन के हर क्षेत्र में एक दूसरे की आपस में तुलना किया जाना नई बात नहीं है । राजाओं के शासन काल की उपलब्धियों और नकारापन की तुलना आदिकाल से की जाती रही है, जो व्यक्ति को आत्म चिंतन हेतु विवश करती है। तुलना का कोई स्थाई मानक नहीं होता,कि तुलना का आधार क्या हो। किसी मृतक की तुलना किसी जीवित व्यक्ति से भी की जा सकती है। किसी के चाल चरित्र और चेहरे की तुलना किसी के चाल चरित्र और चेहरे से की जा सकती है, किसी की आर्थिक स्थिति की तुलना भी की जा सकती है। किसी के व्यक्तिगत शौक की तुलना भी दूसरे के व्यक्तिगत शौक से की जा सकती है । यानी तुलना के लिए कुछ बिंदु निर्धारित करके अध्ययन किया जा सकता है।अपने एक मित्र थे, जो अपनी विशिष्ट पहचान रखते थे, उनकी जीवन शैली में राजशाही आचरण झलकता था। पढ़ने गए तो कभी साइकिल से नही गए। महंगी लग्ज़री कार से नौकर स्कूल तक छोड़ने जाता था, फिर वापस लाता था । घर में भौतिक सम्पन्नता थी, किसी भी विलासिता की वस्तु को खरीदने के लिए कुछ सोचना नहीं पड़ता था। मन की बात कहने भर की देर होती, कि उसकी चाहत पूरी हो जाती। दूसरी ओर एक और बालक था, उसके परिवार की ऐसी भी स्थिति नहीं थी, कि बालक का सही से भरण पोषण भी कर सके। जैसे तैसे संघर्ष करके वह उच्च स्तर तक पहुँच गया।
अब कोई कहे कि गरीब और अमीर की एक दूसरे से तुलना की जा सकती है। अमीर के मुकाबले गरीब की उपलब्धियां कम रही या अमीर ने अपने परिवार की अमीरी के चलते समाज सेवा की, तब कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली जैसी कहावत चरितार्थ होगी ही। ऐसे अनेक लोग होते हैं , जो विलक्षण प्रतिभा के धनी होते हैं, जिनके कार्यों की तुलना किसी अन्य के कार्य से नहीं की जा सकती, फिर भी तुलना की जाती है।
किसी कवि के रचना कर्म की तुलना किसी अन्य कवि के रचना कर्म से भला कैसे की जा सकती है। किसी गली में कविता पढ़ने वाला कवि कब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाकर अतुलनीय बन जाए, कौन सा कवि ओज का हिमालय बन जाए और कौन सा कवि गीतों का राजकुमार, कौन सा कवि फूहड़ चुटकुले सुनाकर हास्य सम्राट बन जाए और कौन सा कवि साहित्य की गठरी लादे रस छन्द अलंकार और मात्राओं के विधान से कविता और प्रस्तुति में कमियाँ खोजता रहे तथा कवियों की रचनाधर्मिता की तुलना करता रहे। यह तो ठीक वैसा ही हुआ न , कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा भानुमति ने तुलना के लिए बेमेल कुनबा जोड़ा।
अतीत और वर्तमान की तुलना नित्य होती है । कभी एक रुपए के सवा सेर शुद्ध घी के भाव को याद करके आज के रेट की तुलना की जाती है। तुलना करने वाला कभी भी देश, काल और परिस्थिति का अध्ययन नहीं करता। बैलगाड़ी और इलेक्ट्रॉनिक वाहनों के युग में महंगाई की तुलना करता है। तुलना का आधार तुलना के मानक कोई नही तय करता। कोई कह रहा है कि अमुक प्रधान अमुक प्रधान का पासंग भी नही है, कोई कह रहा है कि जिसे तुम पासंग भी नही समझते, वह महा मानव है। सब अपने अपने मतानुसार तुलना कर रहे हैं। असलियत कोई नहीं समझना चाहता । अब तुलना भी अंधभक्ति और अंध आस्था का चश्मा लगाकर की जा रही है। अपने अपने तुलनात्मक निष्कर्ष में कोई यह स्पष्ट करने में समर्थ नहीं हो पा रहा है कि चारित्रिक, सामाजिक और व्यावहारिक आचरण के आधार पर किसे पर्वत की संज्ञा दी जाए और किसे राई की । वैसे भी संसार के सभी प्राणियों में इतनी विविधता है, कि प्रत्येक मानक पर उनकी तुलना ही नही हो सकती। (विनायक फीचर्स)


