– राजस्व वृद्धि से लेकर अवैध खनन पर शिकंजे तक
– डिजिटल निगरानी और वैज्ञानिक व्यवस्था ने बदली तस्वीर
जिला सूचना विभाग लखनऊ
प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध उत्तर प्रदेश में खनन क्षेत्र लंबे समय से प्रदेश के आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण आधार रहा है। बालू, मोरम, गिट्टी और अन्य खनिज जहां निर्माण गतिविधियों के लिए जरूरी हैं, वहीं इनसे मिलने वाला राजस्व प्रदेश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देता है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रदेश सरकार ने खनन व्यवस्था को पारंपरिक तौर-तरीकों से निकालकर तकनीक आधारित, पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की दिशा में बड़े बदलाव किए हैं।
सरकार की नीति स्पष्ट है कि प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग विकास के लिए हो, लेकिन उनका दोहन वैज्ञानिक, नियंत्रित और पर्यावरण के अनुकूल तरीके से किया जाए। इसी दृष्टिकोण के तहत खनन पट्टों के आवंटन से लेकर खनिजों के परिवहन तक की व्यवस्था को डिजिटल किया गया है। ई-नीलामी, माइनमित्र पोर्टल, इंटीग्रेटेड माइन सर्विलांस सिस्टम, जियो-फेंसिंग, आरएफआईडी, जीपीएस, आईओटी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी जैसी व्यवस्थाएं खनन क्षेत्र में बदलाव की तस्वीर पेश कर रही हैं।
खनन क्षेत्र में सुधारों का सबसे बड़ा संकेत राजस्व में हुई वृद्धि के रूप में सामने आया है। वर्ष 2012 से 2017 के बीच जहां खनन से करीब 4,700 करोड़ रुपये का कुल राजस्व प्राप्त हुआ था, वहीं वर्ष 2017 से मार्च 2026 तक यह आंकड़ा बढ़कर 30,524 करोड़ रुपये से अधिक हो गया। यानी औसत राजस्व में लगभग साढ़े छह गुना वृद्धि दर्ज की गई।
यह वृद्धि केवल राजस्व बढ़ने का आंकड़ा नहीं है, बल्कि खनन व्यवस्था में पारदर्शिता, तकनीकी निगरानी और प्रशासनिक सुधारों के प्रभाव को भी दर्शाती है।
वित्तीय वर्ष 2022-23 से अब तक मुख्य खनिजों के 10 ब्लॉकों को कम्पोजिट लाइसेंस तथा तीन ब्लॉकों को खनन पट्टे पर आवंटित किया गया है। साथ ही नए खनिज क्षेत्रों की संभावनाओं की तलाश और वैज्ञानिक सर्वेक्षण पर भी जोर दिया जा रहा है।
खनन विभाग अब केवल शिकायत मिलने के बाद कार्रवाई करने की व्यवस्था पर निर्भर नहीं है। आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक विश्लेषण के माध्यम से संभावित अनियमितताओं की पहचान पहले ही की जा रही है।
अब तक 66 संभावित अवैध खनन क्षेत्रों का चिन्हांकन किया गया है। संबंधित जिलाधिकारियों के माध्यम से इन मामलों में नियमानुसार कार्रवाई की गई, जिससे करीब 2.19 करोड़ रुपये के राजस्व की प्राप्ति हुई।
यह व्यवस्था बताती है कि खनन क्षेत्र में निगरानी अब केवल मौके पर निरीक्षण तक सीमित नहीं रही, बल्कि डिजिटल आंकड़ों और वैज्ञानिक तकनीक के आधार पर संभावित गड़बड़ियों की पहचान की जा रही है।
खनन क्षेत्र से जुड़ी सेवाओं को एक ही डिजिटल मंच पर उपलब्ध कराने के लिए प्रदेश सरकार ने माइनमित्र पोर्टल विकसित किया है। इसके माध्यम से पट्टाधारकों, भंडारणकर्ताओं, किसानों और आम नागरिकों को विभिन्न सेवाएं ऑनलाइन उपलब्ध कराई गई हैं।
ई-फॉर्म, आवेदन, लीज धनराशि का ऑनलाइन भुगतान, भंडारण लाइसेंस, खनिज पट्टा संबंधी प्रक्रियाएं, फुटकर विक्रेताओं का पंजीकरण और निजी भूमि से साधारण मिट्टी के खनन से संबंधित सेवाओं को डिजिटल किया गया है।
सितंबर 2021 से जुलाई 2026 तक माइनमित्र पोर्टल पर 4,71,653 आवेदन प्राप्त हुए, जिनमें से 4,66,920 आवेदनों का निस्तारण किया गया। ऑनलाइन व्यवस्था ने जहां प्रक्रियाओं को सरल बनाया है, वहीं अनावश्यक कार्यालयी चक्कर और मानवीय हस्तक्षेप को भी कम किया है।
अवैध खनन और खनिजों के अवैध परिवहन पर नियंत्रण के लिए इंटीग्रेटेड माइन सर्विलांस सिस्टम को मजबूत किया गया है। खनन क्षेत्रों की जियो-फेंसिंग, खनिज परिवहन करने वाले वाहनों पर आरएफआईडी माइंस टैग और स्वचालित चेकपोस्ट इस व्यवस्था के प्रमुख हिस्से हैं।
प्रदेश में 62 स्वचालित चेकपोस्ट संचालित हैं और 27 जनपदों को इस तकनीकी व्यवस्था के दायरे में लाया गया है। 1,53,942 से अधिक वाहनों पर माइंस टैग लगाए जा चुके हैं, जबकि 75 आरएफआईडी रीडर स्थापित किए गए हैं।
16 जुलाई 2026 तक 2,41,472 ई-नोटिस जारी किए गए, जिनमें करीब 998 करोड़ रुपये की धनराशि निहित थी। इनमें से करीब 756 करोड़ रुपये की वसूली की जा चुकी है।
चेकपोस्ट पर वाहनों की पहचान और निगरानी स्वचालित तरीके से की जा रही है। संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी कमांड सेंटर तक पहुंचती है, जहां से संबंधित जिलों को आवश्यक कार्रवाई के लिए सूचना दी जाती है।
अवैध खनन और संगठित खनन माफिया पर कार्रवाई सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल रही है। अवैध दोहन से जहां सरकारी राजस्व को नुकसान होता है, वहीं नदियों, पर्यावरण और स्थानीय पारिस्थितिकी पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
सरकार ने अवैध खनन, अवैध परिवहन, ओवरलोडिंग और अनियमित भंडारण के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई है। इसमें जुर्माने, वाहनों की जब्ती और अन्य कानूनी कार्रवाई के साथ जिला प्रशासन, पुलिस, परिवहन विभाग तथा खनन विभाग के बीच समन्वय को मजबूत किया गया है।
तकनीक ने इस कार्रवाई को और प्रभावी बनाया है। जियो-फेंसिंग से खनन क्षेत्र की सीमा पर नजर, आरएफआईडी से वाहनों की पहचान, जीपीएस से उनकी गतिविधियों की निगरानी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित कैमरों से संदिग्ध गतिविधियों की पहचान की जा रही है।
सरकार के सामने चुनौती केवल अवैध खनन रोकने की नहीं, बल्कि वैध खनन कारोबारियों को अनावश्यक परेशानी से बचाने की भी है। इसी कारण ऑनलाइन आवेदन, डिजिटल भुगतान, ई-फॉर्म और ऑनलाइन अनुमतियों जैसी व्यवस्थाओं को बढ़ावा दिया गया है।
खनन और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना प्रदेश के सामने बड़ी चुनौती है। निर्माण गतिविधियों, एक्सप्रेसवे, औद्योगिक परियोजनाओं और आवासीय विकास के विस्तार के साथ बालू, गिट्टी और अन्य उपखनिजों की मांग लगातार बढ़ रही है।
इसी को ध्यान में रखते हुए प्रदेश सरकार ने एम-सैंड नीति-2024 को 16 अक्टूबर 2024 को प्रख्यापित किया। इसका उद्देश्य प्राकृतिक नदियों से मिलने वाली बालू और मोरम के विकल्प के रूप में निर्मित बालू यानी एम-सैंड को बढ़ावा देना है।
एम-सैंड के उपयोग से नदियों से बालू और मोरम के अत्यधिक दोहन को कम करने में मदद मिल सकती है। इस प्रकार खनन नीति को विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने का प्रयास किया गया है।
उपखनिजों के परिवहन को नियंत्रित करने के लिए वाहनों का डिजिटल पंजीकरण किया गया है। 15 जुलाई 2026 तक करीब 69,425 उपखनिज परिवहन वाहनों का पंजीकरण किया जा चुका था और 51,378 वाहनों में जीपीएस एकीकरण की कार्रवाई की गई।
विभागीय गतिविधियों की निगरानी और विश्लेषण के लिए निदेशालय स्तर पर अत्याधुनिक कमांड सेंटर स्थापित किया गया है। यहां विभिन्न तकनीकी माध्यमों से मिलने वाली सूचनाओं का विश्लेषण कर संदिग्ध गतिविधियों को चिन्हित किया जाता है।
ओवरलोडिंग पर नियंत्रण के लिए प्रमुख मार्गों पर आईओटी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित मानव रहित चेकपोस्ट के साथ वे-इन-मोशन प्रणाली विकसित की जा रही है। इससे चलते हुए वाहनों के वजन की निगरानी संभव होगी और नियमों का उल्लंघन सामने आने पर त्वरित कार्रवाई की जा सकेगी।
खनिज परिवहन की निगरानी को राज्य की सीमा तक सीमित न रखते हुए दूसरे राज्यों से आने वाले वाहनों को भी तकनीकी व्यवस्था से जोड़ा गया है। उत्तर प्रदेश के पोर्टल को संबंधित राज्यों की तकनीकी व्यवस्थाओं से जोड़ने की प्रक्रिया के तहत मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, राजस्थान और बिहार के साथ तकनीकी एकीकरण किया गया है।
इससे प्रदेश में प्रवेश करने वाले खनिज वाहनों की जानकारी और उनकी गतिविधियों की निगरानी अधिक प्रभावी तरीके से की जा रही है।
खनन व्यवस्था को मजबूत करने के लिए सरकार ने नीतिगत स्तर पर भी बदलाव किए हैं। जिला खनिज फाउंडेशन न्यास नियमावली में संशोधन के साथ खनन और खनिज विकास एवं विनियमन अधिनियम, 1957 की धारा 21(5) तथा उत्तर प्रदेश उपखनिज नियमावली, 2021 में आवश्यक संशोधन किए गए हैं।
इन बदलावों का उद्देश्य विभागीय कार्रवाई को अधिक प्रभावी कानूनी आधार देना और खनन से जुड़े मामलों में प्रक्रियागत जटिलताओं को कम करना है।
उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में हजारों किलोमीटर में फैले परिवहन मार्गों, नदियों और खनिज क्षेत्रों की निरंतर निगरानी आसान काम नहीं है। दूरस्थ क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियां और विभिन्न विभागों के बीच समन्वय भी चुनौती बने हुए हैं।
अवैध खनन से जुड़े तत्व भी समय के साथ नए तरीके अपनाते हैं। फर्जी दस्तावेज, निर्धारित मार्ग से हटकर परिवहन और तकनीकी निगरानी से बचने के प्रयास जैसी चुनौतियां भविष्य में भी सामने आ सकती हैं। इसलिए निगरानी प्रणालियों को लगातार अद्यतन करना और तकनीकी क्षमता बढ़ाना जरूरी होगा।
उत्तर प्रदेश का खनन क्षेत्र अब केवल खनिज निकालने और राजस्व अर्जित करने तक सीमित नहीं दिखाई देता। डिजिटल सेवाओं से लेकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी और पर्यावरण संरक्षण तक, खनन व्यवस्था में व्यापक बदलाव दिखाई दे रहे हैं।
एक ओर राजस्व में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, तो दूसरी ओर माइनमित्र जैसी ऑनलाइन सेवाओं ने प्रक्रियाओं को सरल बनाया है। आरएफआईडी, जीपीएस, जियो-फेंसिंग, आईओटी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और कमांड सेंटर जैसी व्यवस्थाओं ने अवैध खनन एवं परिवहन पर निगरानी को मजबूत किया है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार के सामने अब लक्ष्य केवल अधिक राजस्व जुटाना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था तैयार करना है जिसमें वैध कारोबार को सुविधा मिले, प्राकृतिक संसाधनों का वैज्ञानिक उपयोग हो, अवैध गतिविधियों पर प्रभावी कार्रवाई हो और पर्यावरण का संरक्षण भी सुनिश्चित हो।


