शरद कटियार
देशभर में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस और राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया है कि विपक्ष SIR की आड़ में घुसपैठियों को बचाने की कोशिश कर रहा है। वहीं, कांग्रेस और INDIA ब्लॉक के नेता इस प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं। दोनों पक्षों के बीच बढ़ता यह टकराव केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है, बल्कि मतदाता सूची की विश्वसनीयता और चुनावी व्यवस्था में जनता के भरोसे से भी जुड़ा है।
अमित शाह ने कांग्रेस की चुनावी रणनीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि पार्टी पहले भी चुनाव हारती रही है और 2029 के लोकसभा चुनाव में भी उसे हार का सामना करना पड़ेगा। उन्होंने गुजरात के स्थानीय निकाय चुनावों के साथ त्रिपुरा के ग्राम समिति चुनावों और राजस्थान के स्थानीय निकाय चुनावों का उल्लेख करते हुए भाजपा की सफलता को जनता के समर्थन का प्रमाण बताया। उनका तर्क है कि कांग्रेस अपनी चुनावी असफलताओं के लिए SIR को जिम्मेदार ठहराने के बजाय आत्ममंथन करे और अपनी राजनीतिक कमजोरियों को पहचाने।
दूसरी ओर, विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है। राहुल गांधी के नेतृत्व में INDIA ब्लॉक के नेता कथित अनियमितताओं की जांच और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। विपक्ष की इन मांगों पर सरकार और निर्वाचन व्यवस्था से जुड़े पक्षों की प्रतिक्रिया तथा तथ्यों के आधार पर स्थिति स्पष्ट होना जरूरी है।
लोकतंत्र में चुनावी जीत महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण चुनाव प्रक्रिया पर जनता का विश्वास है। मतदाता सूची का शुद्धिकरण किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए आवश्यक है, ताकि कोई पात्र नागरिक अपने मताधिकार से वंचित न हो और किसी अपात्र व्यक्ति का नाम सूची में गलत तरीके से शामिल न रहे। इसलिए SIR जैसी प्रक्रिया को राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय उसके उद्देश्यों, नियमों और क्रियान्वयन की निष्पक्ष समीक्षा की जानी चाहिए।
यदि पुनरीक्षण प्रक्रिया में किसी प्रकार की गड़बड़ी की शिकायत सामने आती है, तो उसकी जांच तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर होनी चाहिए। वहीं, यदि किसी राजनीतिक दल के आरोप निराधार हैं, तो उन्हें भी प्रमाणों के आधार पर स्पष्ट किया जाना चाहिए। केवल आरोप लगाने या उन्हें खारिज कर देने से जनता की शंकाओं का समाधान नहीं होगा। इसके लिए निर्वाचन आयोग की पारदर्शिता, समयबद्ध जवाबदेही और शिकायतों के निष्पक्ष निस्तारण की व्यवस्था आवश्यक है।
बैलेट पेपर से हुए चुनावों और विभिन्न राज्यों के स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा की जीत का हवाला देकर कांग्रेस की रणनीति पर सवाल उठाना राजनीतिक बहस का हिस्सा हो सकता है, लेकिन अलग-अलग चुनावों के परिणाम अपने आप में SIR से जुड़े प्रत्येक सवाल का अंतिम उत्तर नहीं हैं। इसी प्रकार, चुनावी अनियमितताओं के विपक्षी आरोपों को भी जांच और प्रमाण के बिना स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन करें। सत्ता पक्ष को जनता की शंकाओं का तथ्यात्मक उत्तर देना चाहिए, जबकि विपक्ष को अपनी मांगों और आरोपों को ठोस प्रमाणों के साथ सामने रखना चाहिए। मतदाता सूची में सुधार का उद्देश्य राजनीतिक लाभ या नुकसान नहीं, बल्कि निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना होना चाहिए।
अंततः लोकतंत्र की असली ताकत केवल चुनाव जीतने में नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक के मताधिकार की रक्षा करने में निहित है। SIR को लेकर जारी विवाद का समाधान राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि पारदर्शी प्रक्रिया, निष्पक्ष जांच और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति विश्वास से ही संभव है। लोकतंत्र में जनता का वोट सर्वोपरि है और उसकी विश्वसनीयता पर किसी भी प्रकार का संदेह दूर करना सभी पक्षों की साझा जिम्मेदारी है।


