(पवन वर्मा-विनायक फीचर्स)
लोकतंत्र में सबसे बड़ा जनादेश चुनाव नहीं, बल्कि जनता का विश्वास होता है। चुनाव सरकारें बनाते हैं, लेकिन विश्वास उन्हें चलाता है। जब उस विश्वास पर प्रश्न उठते हैं, तब सरकारों को केवल प्रशासनिक और राजनीतिक जवाबदेही भी निभानी पड़ती है। यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है। शायद यही कारण है कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा सामान्य राजनीतिक घटनाक्रम नहीं माना जाएगा।
यह एक मंत्री का पद छोड़ना नहीं है, यह उस दबाव की स्वीकारोक्ति भी है, जो देशभर के लाखों छात्रों, अभिभावकों और समाज ने सरकार के सामने खड़ा कर दिया था। यह अलग बात है कि इस जवाबदेही तक पहुंचने में सरकार को लगभग दो सप्ताह लग गए। इसी कारण राजनीतिक विश्लेषकों का एक बड़ा वर्ग इसे समय पर लिया गया निर्णय नहीं, बल्कि डैमेज कंट्रोल का हिस्सा मान रहा है।
धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफे के साथ जारी अपने दो पृष्ठ के पत्र में लिखा, “पहले ही दिन से, इस पर मैंने जिम्मेदारी ली और इस परिस्थिति से कभी मुंह नहीं मोड़ा।” आगे वे लिखते हैं, “पिछले 10 दिनों का घटनाक्रम देखकर मेरा मन दुःखी है। यह मेरे लिए व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का विषय नहीं है।” अंत में उन्होंने लिखा कि इसी परिस्थिति को देखते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना त्यागपत्र सौंप दिया।
प्रधान के पत्र में जवाबदेही का भाव स्पष्ट दिखाई देता है। उन्होंने युवाओं की आकांक्षाओं का सम्मान करने की बात कही, परीक्षा प्रणाली में विश्वास बहाल करने की आवश्यकता स्वीकार की और यह भी लिखा कि देश की युवाशक्ति को भ्रम के चक्रव्यूह में नहीं फंसने दिया जा सकता। लेकिन राजनीति में केवल जिम्मेदारी स्वीकार करना ही पर्याप्त नहीं होता, उसका समय भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।
नीट-यूजी परीक्षा में पेपर लीक और अनियमितताओं की खबरों ने लाखों छात्रों की मेहनत पर सवाल खड़े कर दिए। कई छात्रों ने मानसिक तनाव झेला और कुछ ने आत्महत्या जैसा दुखद कदम भी उठाया। यह वह क्षण था, जब सरकार को तत्काल राजनीतिक संवाद शुरू करना चाहिए था। लेकिन शुरुआती दिनों में सरकार की प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत सीमित रही। इसके बाद दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र जुटे। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हटाया। लाठीचार्ज और धक्का-मुक्की के दृश्य दुनिया भर में वायरल हो गए। कुछ ही दिनों में आंदोलन दिल्ली से निकलकर भोपाल, इंदौर, मुंबई, पुणे, पटना, रांची,लखनऊ, प्रयागराज से लेकर और कई अन्य अनेक शहरों तक फैल गया। जगह जगह हो रहे प्रदर्शन परीक्षा के साथ युवाओं के विश्वास का आंदोलन बन चुका था।
इस पूरे घटनाक्रम में पहली बार ऐसा लगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी बड़े राजनीतिक संकट में अपेक्षाकृत अकेले पड़ गए हैं। भाजपा की राजनीति की सबसे बड़ी ताकत हमेशा उसका संगठित ढांचा रहा है। किसी भी राष्ट्रीय मुद्दे पर केंद्र और भाजपा शासित राज्यों के बीच समन्वित राजनीतिक प्रतिक्रिया देखने को मिलती रही है। लेकिन नीट आंदोलन में ऐसी तस्वीर बहुत स्पष्ट नहीं दिखी।
भोपाल,जबलपुर और इंदौर में छात्र प्रदर्शन कर रहे थे। पुणे और मुंबई में विरोध मार्च निकल रहे थे। पटना और रांची में भी युवाओं का गुस्सा दिखाई दे रहा था। इसके बावजूद अधिकांश भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री सार्वजनिक रूप से इस आंदोलन को लेकर सक्रिय नहीं दिखे। छात्रों से संवाद की कोई व्यापक पहल नजर नहीं आई। परिणाम यह हुआ कि पूरे घटनाक्रम का राजनीतिक भार सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आ गया।
सरकार की सक्रियता तब तेज हुई, जब आंदोलन राष्ट्रीय स्वरूप ले चुका था। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) के 47 कर्मचारियों को बर्खास्त किया गया। भाजपा अध्यक्ष और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा तथा केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने छात्र प्रतिनिधियों से बातचीत शुरू की। छात्र संगठन सीजेपी ने अपनी मांगें सरकार के सामने रखीं। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोक परीक्षा कानून को और कठोर बनाने, पेपर लीक के मामलों में कड़ी सजा और फास्ट ट्रैक कोर्ट की व्यवस्था का आश्वासन दिया और आखिर में अंततः धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया।
इन घटनाओं का क्रम अपने आप में बहुत कुछ कहता है। यदि यही निर्णय आंदोलन के पहले सप्ताह में लिए गए होते, तो शायद राजनीतिक माहौल अलग होता। लेकिन जब पूरा देश आंदोलित हो चुका था, तब उठाए गए कदमों को स्वाभाविक रूप से देर से उठाया गया कदम माना गया। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में केंद्रीय मंत्रियों के इस्तीफों की परंपरा बहुत लंबी नहीं है, लेकिन जो गिने चुने उदाहरण हैं, वे आज भी राजनीतिक जवाबदेही के मानक माने जाते हैं।
1956 में तमिलनाडु के अरियालूर में भीषण रेल दुर्घटना हुई। देश के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू थे और रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री। दुर्घटना सीधे शास्त्रीजी की व्यक्तिगत गलती नहीं थी, फिर भी उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया। नेहरू उन्हें रोकना चाहते थे, लेकिन शास्त्री अपने निर्णय पर अडिग रहे। आज भी इसे भारतीय लोकतंत्र में मंत्री की जवाबदेही की सबसे बड़ी मिसाल माना जाता है।
1958 में नेहरू सरकार के वित्त मंत्री टी.टी. कृष्णमाचारी को एलआईसी-मुंद्रा प्रकरण के बाद पद छोड़ना पड़ा। 1962 में चीन युद्ध के बाद रक्षा मंत्री वी.के. कृष्ण मेनन ने इस्तीफा दिया। इन दोनों घटनाओं में भी यह संदेश गया कि सत्ता केवल अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व भी है। 1999 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में गैसल रेल दुर्घटना हुई। रेल मंत्री नीतीश कुमार ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दिया। वाजपेयी सरकार ने उस परंपरा का सम्मान किया।
2008 में 26/11 मुंबई आतंकी हमलों के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार में गृह मंत्री शिवराज पाटिल को इस्तीफा देना पड़ा। बाद में 2 जी स्पेक्ट्रम प्रकरण में दूरसंचार मंत्री ए. राजा और दयानिधि मारन तथा कोयला आवंटन विवाद में कानून मंत्री अश्विनी कुमार ने भी पद छोड़ा। इन सभी घटनाओं में परिस्थितियां अलग थीं, लेकिन एक सूत्र समान था। जब जब सरकार पर जनता का भरोसा डगमगाया है, तब लोकतंत्र में जवाबदेही की मांग का सम्मान करते हुए त्याग पत्र दिए गए।
वर्तमान परिस्थितियों में धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा उसी परंपरा में जुड़ता दिखाई देता है। हालांकि एक महत्वपूर्ण अंतर भी है। पहले के अधिकांश इस्तीफे दुर्घटना, युद्ध, आतंकी हमले या घोटालों के बाद हुए थे। इस बार दबाव का सबसे बड़ा स्रोत देश का छात्र वर्ग था। यह जेन-जी का आंदोलन था, जो सोशल मीडिया के माध्यम से कुछ ही दिनों में राष्ट्रीय जनमत तैयार करने में सफल रहा। इस पीढ़ी के लिए पारदर्शिता और जवाबदेही केवल राजनीतिक नारे नहीं, बल्कि अपेक्षाएं हैं।
धर्मेंद्र प्रधान के पत्र में व्यक्त संवेदनाएं और जिम्मेदारी स्वीकार करने का भाव निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। इतिहास किसी भी निर्णय का मूल्यांकन केवल उसके उद्देश्य से नहीं, बल्कि उसके समय से भी करता है। यही कारण है कि आने वाले वर्षों में नीट आंदोलन को पेपर लीक विवाद के रूप में नहीं, बल्कि उस आंदोलन के रूप में याद किया जा सकता है जिसने एक बार फिर भारतीय राजनीति को यह याद दिलाया कि सत्ता की असली ताकत बहुमत नहीं, विश्वास है और जब विश्वास डगमगाता है, तब लोकतंत्र जवाब मांगता है और तब अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करना ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है।
(विनायक फीचर्स)


