शरद कटियार
राजनीतिक दलों की असली ताकत उनके बड़े नेताओं के भाषणों या मंचों की चमक में नहीं, बल्कि उन हजारों-लाखों कार्यकर्ताओं में होती है जो बिना किसी पद और व्यक्तिगत लाभ की उम्मीद के वर्षों तक संगठन के लिए काम करते हैं। चुनाव आते हैं तो यही कार्यकर्ता घर-घर पहुंचता है, नारे लगाता है, भीड़ जुटाता है और पार्टी का संदेश जनता तक पहुंचाता है। इसलिए जब किसी राजनीतिक संगठन के भीतर कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच सार्वजनिक रूप से टकराव की तस्वीर सामने आती है तो सवाल केवल अनुशासन का नहीं, कार्यकर्ता के सम्मान और राजनीतिक संस्कृति का भी बन जाता है।
हाल ही में लखनऊ में समाजवादी पार्टी की बैठक में एटा और कासगंज के नेताओं के बीच तीखी बहस और कथित गाली-गलौज का मामला सामने आया। बैठक में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव मौजूद थे। विवाद बढ़ने के बाद अखिलेश यादव बैठक से चले गए और बाद में एटा तथा कासगंज की जिला इकाइयों को भंग करने की कार्रवाई की गई।
यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सामान्य पार्टी बैठक नहीं थी। आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच संगठन को मजबूत करने, कार्यकर्ताओं से संवाद करने और जमीनी स्थिति का फीडबैक लेने के लिए बैठक बुलाई गई थी। ऐसे मौके पर यदि संगठन के जिम्मेदार लोग ही आपस में उलझ जाएं तो स्वाभाविक रूप से पार्टी की आंतरिक कार्यसंस्कृति पर सवाल उठते हैं।
अखिलेश यादव ने कार्रवाई करके अनुशासन का संदेश देने की कोशिश की—यह तथ्य भी सामने आया है कि दोनों जिलों की इकाइयां भंग कर दी गईं। लेकिन असली चुनौती केवल संगठन भंग करने से खत्म नहीं होगी। सवाल यह है कि जिस कार्यकर्ता के भरोसे चुनावी राजनीति खड़ी की जाती है, उसे संगठन के भीतर कितना सम्मान और कितनी जगह मिलती है?
किसी भी पार्टी में मतभेद असामान्य नहीं हैं। राजनीति में अलग-अलग विचार, गुट और स्थानीय समीकरण होते हैं। समस्या तब पैदा होती है जब मतभेद संवाद की जगह व्यक्तिगत टकराव में बदल जाएं। और उससे भी बड़ी समस्या तब होती है जब सार्वजनिक मंच पर ऐसा व्यवहार हो, जिससे नीचे तक काम करने वाले सामान्य कार्यकर्ता का मनोबल प्रभावित हो।
अखिलेश यादव स्वयं लगातार बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने और कार्यकर्ताओं को चुनावी अभियान का आधार बनाने की बात कर रहे हैं। ऐसे में संगठन के शीर्ष स्तर पर होने वाली हर घटना का संदेश नीचे तक जाता है।
राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि कार्यकर्ता केवल चुनाव के समय इस्तेमाल होने वाली ताकत नहीं है। वह पार्टी का चेहरा है। वह जनता और नेतृत्व के बीच पुल है। उसके सम्मान में कमी आती है तो उसका असर केवल एक व्यक्ति पर नहीं, पूरे संगठन के मनोबल पर पड़ता है।
यह बात सिर्फ समाजवादी पार्टी पर लागू नहीं होती। हर राजनीतिक दल के लिए यह आत्ममंथन का विषय है। लोकतंत्र में जनता से सम्मान मांगने वाले दलों को अपने घर के भीतर भी सम्मान की संस्कृति विकसित करनी होगी।
नेतृत्व की असली परीक्षा तब नहीं होती जब हजारों लोग तालियां बजा रहे हों; असली परीक्षा तब होती है जब अपने ही संगठन में मतभेद सामने आएं। उस समय संवाद, अनुशासन और सम्मान के बीच संतुलन बनाना ही नेतृत्व की पहचान बनता है।
आखिर चुनाव केवल नारों और रणनीतियों से नहीं लड़े जाते। उन्हें जमीन पर वही कार्यकर्ता लड़ता है, जो धूप में खड़ा होता है, लोगों के दरवाजे पर जाता है और संगठन का झंडा उठाता है।
कार्यकर्ता ही ताकत है, फिर उसका सम्मान कहां है?


