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Monday, July 13, 2026

मानसून की चाल और खेती की चिंता: किसान क्या करें?

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प्रभात रंजन
भारत की कृषि आज भी काफी हद तक मानसून पर निर्भर है। ऐसे में जब बारिश का पैटर्न बदलने लगे, कहीं अत्यधिक वर्षा हो और कहीं लंबे समय तक सूखा बना रहे, तो सबसे अधिक चिंता किसानों की बढ़ जाती है। इस वर्ष भी मौसम विभाग ने जुलाई में देश के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से कम बारिश और मानसून के असमान वितरण की संभावना जताई है। साथ ही अल नीनो (El Niño) के प्रभाव की आशंका भी बनी हुई है, जिससे खरीफ फसलों की बुवाई और उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मानसून की शुरुआत कमजोर रहने और बीच-बीच में लंबे शुष्क दौर आने से धान, दालें, मक्का, सोयाबीन और सब्जियों जैसी खरीफ फसलों पर सबसे अधिक असर पड़ सकता है। यदि समय पर पर्याप्त वर्षा नहीं हुई तो बुवाई में देरी होगी, बीज अंकुरित नहीं होंगे और उत्पादन घटने का खतरा बढ़ जाएगा।
देश के कई राज्यों में किसान पहले ही मानसून की अनिश्चितता का सामना कर रहे हैं। कहीं तेज बारिश खेतों में जलभराव पैदा कर रही है, तो कहीं बारिश न होने से मिट्टी में नमी की कमी बनी हुई है। यह स्थिति किसानों के लिए दोहरी चुनौती है, क्योंकि अधिक बारिश भी नुकसान पहुंचाती है और कम बारिश भी।
सबसे अधिक चिंता धान की खेती को लेकर है। धान की रोपाई समय पर पानी मिलने पर ही सफल होती है। यदि मानसून कमजोर रहता है तो रोपाई में देरी होगी और उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इसी प्रकार अरहर, उड़द और मूंग जैसी दालों की फसल भी वर्षा पर निर्भर करती है। सब्जियों की खेती में भी पानी की कमी या अत्यधिक वर्षा दोनों ही नुकसान का कारण बनती हैं, जिसका असर बाद में बाजार में बढ़ती कीमतों के रूप में दिखाई देता है।
सरकार और कृषि वैज्ञानिक लगातार किसानों को मौसम आधारित खेती अपनाने की सलाह दे रहे हैं। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग नियमित मौसम पूर्वानुमान जारी कर रहा है, ताकि किसान उसी के अनुसार बुवाई, सिंचाई और फसल प्रबंधन की योजना बना सकें। सरकार ने राज्यों को जल संरक्षण, सिंचाई व्यवस्था मजबूत करने और आवश्यक बीज उपलब्ध कराने के निर्देश भी दिए हैं।
ऐसे समय में किसानों के लिए कुछ सावधानियां बेहद महत्वपूर्ण हैं। जहां सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है, वहां पानी का संतुलित उपयोग करें। खेतों में वर्षा जल संचयन की व्यवस्था बनाएं। मौसम के अनुसार कम अवधि में तैयार होने वाली फसल किस्मों का चयन करें। कृषि विभाग और कृषि विज्ञान केंद्रों की सलाह के अनुसार ही उर्वरकों और कीटनाशकों का प्रयोग करें। यदि किसी क्षेत्र में भारी बारिश की चेतावनी हो तो खेतों से पानी निकासी की व्यवस्था पहले से कर लें।
जलवायु परिवर्तन भी मानसून के बदलते स्वरूप का बड़ा कारण माना जा रहा है। पहले जहां बारिश पूरे मौसम में संतुलित होती थी, वहीं अब कुछ दिनों में अत्यधिक वर्षा और फिर लंबे समय तक सूखा देखने को मिल रहा है। इससे खेती की पारंपरिक पद्धतियों में बदलाव की जरूरत महसूस की जा रही है। भविष्य में आधुनिक सिंचाई तकनीक, ड्रिप और स्प्रिंकलर प्रणाली, जल संरक्षण और मौसम आधारित कृषि ही किसानों के लिए अधिक सुरक्षित विकल्प बन सकते हैं।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि केवल मौसम पर निर्भर रहने के बजाय किसानों को फसल विविधीकरण पर भी ध्यान देना चाहिए। एक ही फसल पर निर्भरता जोखिम बढ़ाती है, जबकि अलग-अलग फसलों की खेती नुकसान की स्थिति में भी आय का सहारा बन सकती है। इसके साथ ही फसल बीमा योजना का लाभ लेना भी किसानों के लिए सुरक्षा कवच साबित हो सकता है।
मानसून की अनिश्चितता केवल किसानों की समस्या नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर देश की खाद्य सुरक्षा, महंगाई और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। यदि खरीफ फसल प्रभावित होती है तो खाद्यान्न उत्पादन घट सकता है, जिससे बाजार में कीमतें बढ़ेंगी और आम जनता की रसोई पर भी असर पड़ेगा। इसलिए समय की मांग है कि सरकार, वैज्ञानिक और किसान मिलकर मौसम की चुनौतियों का सामना करें और आधुनिक कृषि तकनीकों को तेजी से अपनाएं।

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