प्रो. एच. एन. शर्मा
भारत के स्वतंत्र इतिहास में 1975-77 का आपातकाल सबसे अंधकारमय अध्यायों में से एक माना जाता है। इस दौरान नागरिक स्वतंत्रताओं को निलंबित कर दिया गया, राजनीतिक विरोधियों को जेल में डाल दिया गया, प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर अभूतपूर्व दबाव डाला गया। भय और चुप्पी के उस दौर में भी कुछ आवाजें ऐसी थीं जिन्होंने झुकने से इनकार कर दिया। उन आवाजों में एक प्रमुख नाम था चंद्रशेखर का, जिनकी लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता राजनीतिक सुविधा और व्यक्तिगत सुरक्षा से कहीं ऊपर थी।
25 जून 1975 को आपातकाल की औपचारिक घोषणा से बहुत पहले ही चंद्रशेखर ने कार्यपालिका के हाथों में अत्यधिक शक्ति केंद्रित होने के खतरों को महसूस कर लिया था। उस समय वे कांग्रेस पार्टी में थे, लेकिन अपनी स्पष्टवादिता और स्वतंत्र विचारों के लिए जाने जाते थे। जब भी उन्हें लगा कि लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर आंच आ रही है, उन्होंने सत्ता के सामने सच बोलने का साहस दिखाया। कहा जाता है कि उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को किसी भी ऐसे अलोकतांत्रिक कदम से बचने की सलाह दी थी, जो कांग्रेस पार्टी को नुकसान पहुंचाए और भारत की लोकतांत्रिक विरासत पर स्थायी दाग छोड़ दे। उनका यह चेतावनी भरा संदेश भविष्यवाणी साबित हुआ। आपातकाल आधुनिक भारतीय राजनीतिक इतिहास के सबसे विवादास्पद निर्णयों में से एक बन गया।
लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) की गिरफ्तारी ने चंद्रशेखर को गहराई से विचलित कर दिया था। जेपी देशव्यापी आंदोलन के नैतिक नेतृत्वकर्ता बन चुके थे, जो जवाबदेही, पारदर्शिता और लोकतांत्रिक सुधारों की मांग कर रहा था। चंद्रशेखर के लिए जेपी की गिरफ्तारी केवल एक व्यक्ति की गिरफ्तारी नहीं थी, बल्कि लोकतांत्रिक असहमति पर सीधा हमला थी।
जब दमन का दौर शुरू हुआ, तो चंद्रशेखर ने खुलकर विरोध किया। सरकार ने उन्हें विशेष सुविधाएं देकर उनकी गिरफ्तारी को सहज बनाने का प्रयास किया। हरियाणा के प्रभावशाली नेता बंसीलाल ने कथित रूप से सुझाव दिया कि उनके लिए किसी सरकारी अतिथि गृह को नजरबंदी स्थल में बदल दिया जाए। लेकिन चंद्रशेखर ने इस प्रस्ताव को तुरंत अस्वीकार कर दिया। उनका मानना था कि जब हजारों राजनीतिक कार्यकर्ता और विपक्षी नेता सामान्य जेलों में बंद हों, तब विशेष सुविधाएं स्वीकार करना उनके सिद्धांतों के साथ समझौता होगा।
उन्होंने पंजाब की एक सामान्य जेल में रहना स्वीकार किया। उनका यह निर्णय प्रतीकात्मक होने के साथ-साथ अत्यंत साहसिक भी था। इससे यह संदेश गया कि तानाशाही के विरुद्ध संघर्ष चुनिंदा लोगों का नहीं, बल्कि नेताओं और आम नागरिकों का साझा दायित्व है।
जेल जाने से पहले चंद्रशेखर ने अपने परिवार को स्पष्ट रूप से बता दिया था कि उन्होंने आपातकाल का विरोध करने का निर्णय पूरी चेतना और समझदारी के साथ लिया है। वे जानते थे कि इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं। भविष्य अनिश्चित था और किसी को नहीं पता था कि आपातकाल कितने समय तक चलेगा। एक भावुक क्षण में उन्होंने अपनी पत्नी से कहा था कि संभव है कि वे जल्द वापस न लौटें। यह भय नहीं था, बल्कि उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों का यथार्थवादी आकलन था।
उनकी पत्नी दूजा देवी ने अद्भुत साहस और देशभक्ति का परिचय दिया। उन्होंने उन्हें सावधान रहने की सलाह देने के बजाय परिवार की जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया। उनका संदेश स्पष्ट था कि राष्ट्रहित सर्वोपरि है और लोकतंत्र की रक्षा के लिए उन्हें निश्चिंत होकर संघर्ष करना चाहिए। यह त्याग और समर्पण उन हजारों परिवारों की भावना का प्रतीक था, जिनके प्रियजन उस दौर में जेलों में बंद थे।
मुझे आज भी वह भावुक टेलीफोन वार्ता याद है, जब चंद्रशेखर जी प्रशासनिक दबावों का सामना कर रहे थे और मैं उस समय चंडीगढ़ के पिंजौर गार्डन में उनके परिवार के साथ मौजूद था। जेल जाने की तैयारी के दौरान उन्होंने भविष्य की अनिश्चितताओं और अपने परिवार की देखभाल की चिंता व्यक्त की। वह क्षण अत्यंत भावुक था। मेरी आंखों में आंसू थे और मैंने उन्हें आश्वासन दिया कि अपनी पूरी क्षमता के अनुसार मैं उनके परिवार के साथ खड़ा रहूंगा और हर संभव सहायता करूंगा। यह केवल व्यक्तिगत वचन नहीं था, बल्कि उन सिद्धांतों के प्रति सम्मान था जिनके लिए उन्होंने संघर्ष का मार्ग चुना था।
पूरे आपातकाल के दौरान चंद्रशेखर अपने विरोध पर अडिग रहे। जेल की यातनाओं और कठिनाइयों ने उनके संकल्प को और मजबूत किया। जब अनेक राजनेता सत्ता के दबाव के आगे झुक गए, तब उन्होंने संविधान, लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं, बहुलवाद और असहमति के अधिकार की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रखा।
इतिहास ने अंततः उन लोगों को सही साबित किया जिन्होंने आपातकाल का विरोध किया। लोकतांत्रिक अधिकारों के दमन के खिलाफ जनता का आक्रोश बढ़ता गया। जब 1977 में चुनाव हुए तो देश की जनता ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया। आपातकाल समाप्त हुआ और कांग्रेस सरकार को अभूतपूर्व पराजय का सामना करना पड़ा। लोकतंत्र, यद्यपि घायल था, लेकिन पहले से अधिक मजबूत होकर उभरा।
चंद्रशेखर के लिए यह संघर्ष कभी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का विषय नहीं था। यह गणराज्य की आत्मा की रक्षा का संघर्ष था। आपातकाल के दौरान उनके आचरण ने उन्हें भारतीय लोकतंत्र की सबसे सम्मानित आवाजों में शामिल कर दिया। इस दौर ने यह भी सिद्ध किया कि वास्तविक नेतृत्व पदों से नहीं, बल्कि उन सिद्धांतों से मापा जाता है जिन्हें व्यक्ति किसी भी कीमत पर छोड़ने से इनकार कर दे।
आपातकाल आज भी हर पीढ़ी के लिए एक चेतावनी है। यह हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र केवल संस्थाओं से नहीं, बल्कि उन व्यक्तियों के साहस से जीवित रहता है जो उसकी रक्षा के लिए खड़े होने का साहस रखते हैं। चंद्रशेखर का प्रतिरोध, त्याग और लोकतांत्रिक मूल्यों में अटूट विश्वास इस बात का प्रमाण है कि जब स्वतंत्रता की परीक्षा हुई, तब वे इतिहास के सही पक्ष में खड़े थे।लेखक :
पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री चंद्रशेखर के राजनीतिक सलाहकार रहे हैं


