नई दिल्ली
हैदराबाद स्थित एनएएलएसएआर विधि विश्वविद्यालय के छात्रों के विरोध प्रदर्शन को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार को भारतीय बार परिषद के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि छात्रों का फैसला गलत हो सकता है या उन्हें किसी ने गलत सलाह दी हो, लेकिन अपनी बात रखने और विरोध करने का अधिकार उनसे नहीं छीना जा सकता। न्यायालय ने उस आदेश पर भी सवाल उठाया, जिसमें 2026 बैच के विधि स्नातकों के वकील के रूप में पंजीकरण पर रोक लगाने की बात कही गई थी।
मामला विश्वविद्यालय के करीब 450 छात्रों के विरोध से जुड़ा है। छात्रों ने दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को बुलाए जाने पर आपत्ति जताते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन से निमंत्रण वापस लेने की मांग की थी। छात्रों की नाराजगी मुख्य न्यायाधीश की पिछले महीने की एक टिप्पणी को लेकर थी। इसके बाद 13 अगस्त को भारतीय बार परिषद ने सभी राज्य बार परिषदों को एनएएलएसएआर के 2026 बैच के छात्रों का वकील के रूप में पंजीकरण अगले आदेश तक रोकने का निर्देश दिया था।
भारतीय बार परिषद ने विश्वविद्यालय से उन लोगों की जानकारी भी मांगी थी, जिन्होंने कथित तौर पर विरोध अभियान शुरू करने, छात्रों को जुटाने और प्रचार करने में भूमिका निभाई थी। हालांकि कुछ घंटे बाद ही परिषद ने अपना रुख बदलते हुए कहा कि अधिकांश छात्र निर्दोष हैं। इसके बाद सभी छात्रों को अपनी पसंद की राज्य बार परिषद में पंजीकरण कराने की अनुमति दे दी गई। सर्वोच्च न्यायालय बार संघ ने भी भारतीय बार परिषद की शुरुआती कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए इसे मनमाना और जरूरत से ज्यादा बताया था।
सर्वोच्च न्यायालय ने अब भारतीय बार परिषद को नोटिस जारी कर विश्वविद्यालय के किसी छात्र या शिक्षक के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का आदेश दिया है। यह विवाद केवल एक विश्वविद्यालय के छात्रों के विरोध तक सीमित नहीं है, बल्कि असहमति जताने के अधिकार और संस्थागत अनुशासन के बीच संतुलन का भी सवाल उठाता है। न्यायालय की टिप्पणी से यह संदेश साफ है कि छात्रों की असहमति को उनके पेशेवर भविष्य के लिए दंड का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।


