शरद कटियार
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की सत्ता से 2017 से बाहर चल रही समाजवादी पार्टी ने 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर अभी से अपनी चुनावी रणनीति को धार देना शुरू कर दिया है। लगातार दो विधानसभा चुनावों में सत्ता से दूर रहने के बाद सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव इस बार टिकट वितरण में कोई जोखिम लेने के मूड में नहीं हैं। पार्टी का फोकस अब सिफारिश और रसूख से ज्यादा सर्वे, जमीनी फीडबैक और जीतने की क्षमता पर दिखाई दे रहा है।
सपा के संभावित उम्मीदवारों की लोकप्रियता और क्षेत्र में पकड़ जानने के लिए सर्वे और स्थानीय स्तर से फीडबैक जुटाया जा रहा है। संभावित प्रत्याशी की मजबूती के साथ उसकी कमजोरियों का भी आकलन किया जा रहा है। पार्टी सूत्रों और रिपोर्टों के मुताबिक जिस दावेदार की रिपोर्ट नकारात्मक होगी, उसके लिए मजबूत राजनीतिक सिफारिश भी टिकट की गारंटी नहीं बनेगी।
अखिलेश यादव की रणनीति में विधानसभा सीट के स्थानीय सामाजिक समीकरण को भी खास महत्व दिया जा रहा है। किस क्षेत्र में किस सामाजिक समूह की कितनी प्रभावी मौजूदगी है और कौन-सा उम्मीदवार विभिन्न वर्गों को साथ लेकर भाजपा को चुनौती दे सकता है, इसका आकलन किया जा रहा है।
यानी इस बार टिकट का आधार केवल किसी नेता का पुराना चुनावी अनुभव नहीं, बल्कि सीट का गणित समेत उम्मीदवार की स्वीकार्यता और जीत की संभावना का संयुक्त आकलन होगा।
सपा 2027 में अपने पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक फॉर्मूले को और मजबूत करने की कोशिश कर रही है। पार्टी की रणनीति में दलित प्रतिनिधित्व बढ़ाने की योजना भी शामिल है। रिपोर्टों के अनुसार सपा लगभग 100 दलित और आदिवासी उम्मीदवारों को मैदान में उतारने की योजना पर काम कर रही है, जिसमें कुछ सामान्य सीटों पर भी दलित उम्मीदवार शामिल हो सकते हैं।
साथ ही हाल के दिनों में अखिलेश यादव की ओर से ब्राह्मण समाज तक पहुंच बढ़ाने के संकेत भी मिले हैं। इससे साफ है कि पार्टी अपने पारंपरिक PDA आधार के साथ नए सामाजिक समीकरण जोड़ने की कोशिश कर रही है।
2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में सपा के प्रदर्शन ने पार्टी नेतृत्व को उम्मीदवार चयन और सामाजिक समीकरण की रणनीति पर भरोसा दिया। अब उसी अनुभव को 2027 के विधानसभा चुनाव में ज्यादा व्यवस्थित तरीके से लागू करने की तैयारी है।
अखिलेश यादव के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल अधिक सीटें जीतना नहीं, बल्कि ऐसे उम्मीदवार उतारना है जो अपने बूते सीट निकाल सकें और चुनाव के बाद भी पार्टी के साथ मजबूती से खड़े रहें।
सर्वे आधारित टिकट फॉर्मूले ने सपा के टिकट दावेदारों की राजनीतिक सक्रियता बढ़ा दी है। जिन नेताओं को अब तक संगठन में प्रभाव, पुराने संबंधों या बड़े नेताओं की पैरवी के भरोसे टिकट की उम्मीद थी, उन्हें अब जनता के बीच अपनी पकड़ साबित करनी होगी।सपा का संदेश साफ दिखाई है,टिकट वही, जिसकी जमीन मजबूत और जीत की संभावना सबसे ज्यादा।
हालांकि अभी इसे सभी 403 सीटों की अंतिम टिकट सूची नहीं माना जा सकता। उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया चल रही है और अंतिम निर्णय पार्टी नेतृत्व द्वारा सर्वे, फीडबैक, सामाजिक समीकरण और चुनावी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया जाएगा।


