(पवन वर्मा-विनायक फीचर्स)
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कृषि मंत्रालय से देश भर में “खेत बचाओ अभियान” शुरू किया है। यह अभियान 1 से 30 जून तक चलाये जाने की उन्होंने घोषणा की है। कागजों पर यह एक शानदार पहल है, मिट्टी का स्वास्थ्य, संतुलित उर्वरक उपयोग, किसानों को सही समय पर सलाह और पंचायत स्तर तक योजनाओं का विकेंद्रीकरण। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या सिर्फ खाद और उर्वरकों के प्रबंधन से ‘खेत’ बच जाएगा? यह सबसे बड़ा सवाल है। आज जब देश भर में खेती की उपजाऊ जमीनें रियल एस्टेट कारोबारियों के सामने परोसी जा रही हैं,ऐसे में यह अभियान खेत बचाने की सबसे बड़ी चुनौती को नजरअंदाज करता सा नजर आ रहा है।
आज देश भर में शहरों के आसपास की खेती की जमीनों पर बिल्डर्स निगाहे जमाए बैठे हुए है। वे खेत खरीदकर, धीरे धीरे फॉर्म हाउस और प्लॉट के नाम पर जमीन बेच रहे हैं। इस पर न तो राज्य सरकारों ने कोई नीति बनाई है, न केंद्र सरकार की कोई स्पष्ट नीति है। मतलब साफ है कि खेत बचाने के इस तरीके पर सरकारें सोच भी नहीं रही।
विदिशा लोकसभा में खेतों का हाल
इस अभियान की विफलता या सफलता को मापने के लिए केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के अपने संसदीय क्षेत्र विदिशा से बेहतर कोई मापदंड नहीं हो सकता। उनके लोकसभा क्षेत्र में विदिशा,सांची और भोजपुर जैसे विश्व-विरासत वाले क्षेत्रों का अपना गौरवशाली इतिहास है, स्वयं शिवराज सिंह चौहान के भी यहां बड़े बड़े खेत हैं लेकिन आज यही क्षेत्र एक डरावनी सच्चाई का गवाह है। यहाँ पर्यटन और शहरीकरण के नाम पर कृषि भूमि का रकबा जिस तेजी से घट रहा है, वह किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को विचलित कर देने वाला है। केंद्रीय कृषि मंत्री के अपने क्षेत्र में खेतों की मिट्टी पर ईंट-पत्थरों के बंगले और कमर्शियल कॉलोनियां बन चुकी है,और कुछ कॉलोनियां बन भी रही हैं। सांची और विदिशा के आसपास जिस तरह खेती की जमीन को कंवर्ट करके व्यावसायिक लाभ कमाया जा रहा है, वहाँ यह अभियान केवल उर्वरक की खुराक बताने तक सीमित होकर रह जाएगा। जब जमीन ही नहीं बचेगी, तो उस पर संतुलित खाद का उपयोग कौन करेगा?
‘खेत’ बचा रहे हैं या ‘खेती की प्रक्रिया’?
इस अभियान में रासायनिक खाद कम करने और मृदा परीक्षण की बात तो है, लेकिन बिल्डर्स के चंगुल से खेत बचाने का कोई एजेंडा नहीं है। आखिर क्यों इस अभियान में उस कॉलोनी-कटिंग संस्कृति को रोकने का कोई सख्त प्रावधान नहीं है, जो दिन-प्रतिदिन हमारी खाद्य-सुरक्षा की जमीन को निगल रही है? क्या सिर्फ खाद से खेत बचेगा? अगर किसान को खेती से होने वाला मुनाफा बिल्डर द्वारा दिए गए चेक से कम है, तो वह अपनी जमीन को खेती के लिए क्यों बचाएगा? यह अभियान किसान की आर्थिक मजबूरी को समझने में पूरी तरह विफल है। भू-संरक्षण कहाँ है? ‘खेत बचाओ अभियान’ का नाम तो बहुत बड़ा है, लेकिन इसमें ‘भू-उपयोग’ पर नियंत्रण का एक भी शब्द नहीं है। क्या यह अभियान केवल खाद के बैग बांटने तक सिमटा रहेगा, या यह बिल्डर्स और प्रशासन की उस सांठ-गांठ को चुनौती देगा जो खेतों को रातों-रात रिहायशी प्लाटों में बदल देती है?
केंद्रीय कृषि मंत्री ने पंचायत को मजबूत करने की बात की है। अगर पंचायतें ही नहीं रोक पा रही हैं कि उनके गांव की उपजाऊ जमीन पर प्लॉटिंग न हो, तो फिर इस अभियान के अंतर्गत पंचायतों की भागीदारी का क्या अर्थ है?
कंक्रीट के जंगल में बदलते खेत
वास्तविकता यह है कि आज छोटे किसान के लिए खेत मातृभूमि नहीं मात्र एक संपत्ति बन गया है। बिल्डर्स उसे यह सपना बेचते हैं कि “खेती छोड़ो, समृद्ध बनो।” यदि खेत बचाओ अभियान को वाकई एक जन-आंदोलन बनाना है, तो इसे बिल्डर्स के खिलाफ एक मोर्चा खोलना होगा। जब तक खेत को आवासीय प्लाट बनाने पर कानूनी प्रतिबंध और खेती को रियल एस्टेट से अधिक मुनाफे वाला धंधा नहीं बनाया जाएगा, तब तक यह अभियान केवल सरकारी फाइलों की शोभा बढ़ाएगा।
नाम बड़ा, पर काम कितना?
शिवराज सिंह चौहान का यह अभियान तकनीक की दृष्टि से तो उपयोगी है, लेकिन दूरदर्शिता के मामले में अधूरा है। विदिशा जैसी धरती पर, जहाँ इतिहास और विरासत की जड़ें मिट्टी से जुड़ी हैं, वहाँ खेतों का रकबा घट रहा है। अकेले विदिशा ही नहीं सारे देश भर के खेतों की स्थिति भी यही है, दिन प्रतिदिन खेती का रकबा घट रहा है।
“खेत बचाओ अभियान” से पहले सरकार को और स्वयं केंद्रीय कृषि मंत्री को भी यह स्वीकार करना होगा कि खतरा केवल ‘असंतुलित खाद’ से ही नहीं है, बल्कि उस ‘असंतुलित शहरीकरण’ से भी है जो हमारी थाली के अन्न को छीन रहा है। अगर यह अभियान वाकई में खेत बचाना चाहता है, तो उसे कंक्रीट के जंगलों के आगे खड़ा होना होगा। अन्यथा, आने वाले वक्त में हमारे पास मिट्टी के बेहतर परीक्षण की रिपोर्ट तो होगी, लेकिन उस पर खेती करने के लिए एक इंच जमीन भी नहीं बचेगी। (विनायक फीचर्स)


