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Saturday, May 30, 2026

सादगी, सेवा और स्वराज की प्रतिमूर्ति लोकमाता देवी अहिल्याबाई होल्कर

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(आरती चौगुले-विभूति फीचर्स)
भारत के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो काल की सीमाओं से परे जाकर आज भी प्रेरणा देते हैं। उनमें सबसे उज्ज्वल नाम है लोकमाता राजमाता अहिल्याबाई होल्कर का। हाथ में शिवलिंग, श्वेत वस्त्र, सौम्य मुखमुद्रा और प्रजा के कल्याण में लीन एक तेजस्वी छवि। वे कुशल प्रशासक थीं, न्यायप्रिय शासक थीं, धर्मपरायण शिवभक्त थीं और सबसे बढ़कर, लोकमाता थीं। एक किसान बालिका से लेकर महेश्वर की महारानी तक के सफर को समझना, आज के समय में भी और भी आधिक प्रासंगिक है।
अहिल्याबाई का जन्म 31 मई 1725 को महाराष्ट्र के तत्कालीन अहमदनगर जिले एक गांव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ। पिता मनकोजी शिंदे और माता सुशीला दोनों ही गहरे धार्मिक और अनुशासित स्वभाव के थे। घर में प्रतिदिन पूजा-पाठ, धर्माचरण और संयम का वातावरण था। इसका सबसे गहरा प्रभाव छोटी अहिल्या पर पड़ा।
बचपन से ही अहिल्या शिवभक्त थीं। गांव के शिवालय में नित्य पूजा करना उनका नियम था। राजसी वैभव, आडंबर और दिखावे से वे सदा दूर रहीं। यही सादगी आगे चलकर उनके संपूर्ण जीवन का आधार बनी।
एक बार इंदौर के महाराजा मल्हारराव होल्कर पूना जाते समय उसी शिवालय के पास ठहरे। उनके साथ हाथी-घोड़े, पालकियाँ और राजसी ठाठ-बाट था। उसी समय आठ वर्ष की अहिल्या पूजा कर निर्लिप्त भाव से घर लौट गई। उसने उस वैभव की ओर आंख उठाकर भी नहीं देखा। मल्हारराव यह देखकर विस्मित रह गए। तब उन्होंने कहा कि “हीरे की परख जौहरी को ही होती है” और निश्चय किया कि ऐसी कन्या ही उनके पुत्र की अर्धांगिनी बन सकती है। 1733 में आठ वर्ष की अहिल्या का विवाह मल्हारराव के पुत्र खंडेराव होल्कर से हुआ, जो तब 12 वर्ष के थे।
राजमहल में आकर भी अहिल्या का जीवन वैसा ही सादा रहा। कालांतर में उन्हें पुत्र मालेराव और पुत्री मुक्ताबाई की प्राप्ति हुई। खंडेराव की पहले से दस पत्नियाँ थीं, इसलिए अहिल्या का जीवन एकांत और संयम से भरा रहा।
मल्हारराव ने अहिल्या की मनोदशा को समझा। वे उनसे पुत्रीवत स्नेह करते थे और अपने पुत्र से अधिक पुत्रवधू पर भरोसा करते थे। इसलिए उन्होंने अहिल्या को तीरंदाजी, घुड़सवारी, राज्य संचालन, सैन्यशास्त्र और युद्धनीति का प्रशिक्षण दिलवाया। एक महिला के लिए उस युग में यह अभूतपूर्व था। मल्हारराव ने अहिल्या को केवल रानी नहीं, एक भावी शासक के रूप में तैयार किया।
1754 में कुंभल के युद्ध में खंडेराव वीरगति को प्राप्त हुए। मात्र 29 वर्ष की आयु में अहिल्या विधवा हो गईं। उस समय की प्रथा के अनुसार उन्होंने सती होने का निश्चय किया, पर मल्हारराव ने उन्हें रोक लिया। उन्होंने अहिल्या को समझाया कि उनके जीवन का उद्देश्य अभी शेष है।
1767 में मल्हारराव की मृत्यु हो गई। उनके पोते मालेराव गद्दी पर बैठे, पर वह विलासी और प्रजापीड़क निकला। नौ महीने में ही मालेराव की भी मृत्यु हो गई। अब होल्कर वंश का कोई योग्य उत्तराधिकारी नहीं बचा।
ऐसे संकट में अहिल्याबाई ने तुकोजीराव को दत्तक लिया और स्वयं शासन की बागडोर संभाली। इसी समय पेशवा रघुनाथराव ने इंदौर पर आक्रमण कर दिया।
अहिल्याबाई ने मंत्रियों और सेनापतियों की सभा बुलाई। सर्वसम्मति से उन्होंने स्वयं शासन ग्रहण कर तुकोजीराव के नेतृत्व में युद्ध की घोषणा की। अहिल्याबाई के इस अदम्य साहस को देखकर रघुनाथराव बिना युद्ध किए ही लौट गए। इस प्रकार अहिल्याबाई ने न केवल सिंहासन बचाया, बल्कि यह सिद्ध कर दिया कि नारी भी राज्य चला सकती है।
अहिल्याबाई ने अपनी राजधानी इंदौर से 90 किमी दूर नर्मदा तट पर स्थित महेश्वर,जिसे प्राचीन काल में महिष्मती नगरी कहा जाता था, को बनाया। यहाँ नर्मदा के किनारे उन्होंने भव्य किले का निर्माण कराया। किले के भीतर काशी-विश्वनाथ, राज-राजेश्वर और अहिल्या मंदिर आज भी उनकी धार्मिक आस्था के प्रतीक हैं। उन्होंने महिलाओं की भी एक बड़ी सेना तैयार की। यह नारी-शक्ति का अपने समय का सबसे बड़ा उदाहरण था।
अहिल्याबाई का एकमात्र ध्येय था प्रजा का सुख। वे अत्यंत न्यायप्रिय थीं। उनके दरबार में राजा-रंक, अपना-पराया का भेद नहीं था। न्याय शीघ्र और निष्पक्ष होता था। उन्होंने विधवा कानून बनाया। इस कानून के अनुसार पति की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति की उत्तराधिकारी पत्नी होगी। इससे विधवा महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में बड़ा सुधार हुआ।
लाचार, असहाय और बेसहारा लोगों की वे स्वयं सहायता करती थीं। उनके राजकोष और निजी संपत्ति का बड़ा हिस्सा परोपकार और जनकल्याण में खर्च होता था।
अहिल्याबाई गहरी शिवभक्त थीं। उन्होंने पूरे भारत में
250 से अधिक मंदिरों का निर्माण और जीर्णोद्धार कराया। काशी का विश्वनाथ मंदिर, गुजरात का सोमनाथ, उज्जैन का महाकालेश्वर, रामेश्वरम, केदारनाथ, ये सभी उनके पुनर्निर्माण के कारण ही आज खड़े हैं।
तीर्थस्थानों पर धर्मशालाएं, अतिथिगृह, चिकित्सालय और पुस्तकालय बनवाए। यात्रियों के लिए चौड़ी सड़कें, छायादार वृक्ष, कुएं, बावड़ियाँ और नदी घाट बनवाए। उनके सिक्कों पर नंदी और बेलपत्र अंकित रहते थे, जो उनकी शिवभक्ति का प्रतीक थे।
अहिल्याबाई कला की संरक्षक थीं। महेश्वर का किला मराठा शैली का अनुपम उदाहरण है। महल की दीवारों पर महेश्वरी शिल्पकला के अद्भुत नमूने आज भी देखे जा सकते हैं। उन्होंने महेश्वर के बुनकरों को प्रोत्साहित किया। यहीं से प्रसिद्ध महेश्वरी साड़ियों की परंपरा शुरू हुई, जो आज भी अपनी बारीक बुनाई और ज़री काम के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है।
उनके दरबार में विद्वान, कवि, शिल्पकार, कलाकार और व्यापारी सभी को सम्मान मिलता था। उनके शासनकाल में मालवा में बड़े-बड़े उद्योग स्थापित हुए और राज्य आर्थिक रूप से समृद्ध हुआ।
सत्ता संभालने के बाद अहिल्याबाई के जीवन में व्यक्तिगत दुखों की कमी नहीं रही। थोड़े-थोड़े अंतराल में उनकी सास, पुत्र, पुत्री और दामाद सभी का निधन हो गया। पर उन्होंने इन वज्राघातों को सहन कर स्वयं को पूरी तरह राजकाज और लोकसेवा में लगा दिया। उन्होंने कभी व्यक्तिगत दुख को कर्तव्य पर हावी नहीं होने दिया।
यूरोपीय लेखक कैप्टन स्टुअर्ट ने उनके बारे में लिखा कि एक ग्रामीण बालिका ने इंदौर की महारानी बनकर पूरे राज्य को इतनी कुशलता से चलाया कि मालवा एक संपन्न और सुदृढ़ राज्य बन गया।
अहिल्याबाई ने 1767 से 1797 तक, पूरे 30 वर्ष शासन किया। यह कालखंड मालवा के इतिहास का स्वर्णयुग माना जाता है। 13 अगस्त 1797 को 70 वर्ष की आयु में इंदौर में सादगी और सौम्यता की इस मूर्ति ने अंतिम सांस ली।
अहिल्याबाई होल्कर केवल एक रानी नहीं थीं। वे एक विचार थीं सादगी का, न्याय का, सेवा का और नारीशक्ति का। एक छोटे से गांव की वह बालिका जिसने राजसी वैभव को नहीं देखा, उसने पूरे भारत को अपनी कर्मभूमि बना लिया। उन्होंने तलवार भी चलाई, कानून भी बनाए, मंदिर भी बनवाए और दिल भी जीते।
आज जब हम नारी सशक्तिकरण और सुशासन की बात करते हैं, तो अहिल्याबाई का 18वीं सदी का शासन हमारे सामने आदर्श बनकर खड़ा हो जाता है। अपने जीवन की अंतिम सांस तक लोककल्याण में लीन इस तेजस्वी लोकमाता कोटि-कोटि नमन। (विभूति फीचर्स)

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