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Saturday, May 23, 2026

महिला अधिकारियों को न्याय: सुप्रीम कोर्ट ने सेना में भेदभाव पर लगाई रोक, 20 साल की सेवा के बराबर पेंशन का अधिकार

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नई दिल्ली। भारतीय सेना में शॉर्ट सर्विस कमीशन के तहत सेवा देने वाली महिला अधिकारियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि सेना में महिलाओं के साथ लंबे समय से प्रणालीगत भेदभाव होता रहा है और इसी के चलते कई योग्य महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन से वंचित रखा गया।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने विशेष संवैधानिक अधिकारों का उपयोग करते हुए विशेष संवैधानिक शक्तियों (अनुच्छेद 142) के तहत आदेश दिया कि जिन महिला अधिकारियों को सेवा से हटाया गया था और जिन्होंने इस निर्णय को अदालत में चुनौती दी थी, उन्हें 20 वर्ष की सेवा के बराबर पेंशन का लाभ दिया जाएगा। अदालत ने यह भी कहा कि यह फैसला उन महिला अधिकारियों के लिए एक “वन-टाइम उपाय” के रूप में लागू होगा, जो न्याय की लड़ाई के दौरान सेवा से बाहर हो गई थीं।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि भारतीय सेना में केवल पुरुषों का एकाधिकार नहीं हो सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुरुष अधिकारी यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि भविष्य में आने वाले सभी पद केवल उनके लिए ही सुरक्षित होंगे। कोर्ट के अनुसार, महिलाओं को अवसरों की कमी, अनुचित मूल्यांकन और गलत तरीके से अयोग्य घोषित किए जाने के कारण उनके करियर की प्रगति प्रभावित हुई है, जो कि समानता के संवैधानिक सिद्धांतों के खिलाफ है।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह आदेश जज एडवोकेट जनरल (JAG) और आर्मी एजुकेशन कोर (AEC) कैडर की महिला अधिकारियों पर लागू नहीं होगा। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और सेना को निर्देश दिया कि भविष्य में चयन प्रक्रिया, मूल्यांकन प्रणाली और कट-ऑफ मानकों की निष्पक्ष समीक्षा की जाए ताकि महिलाओं के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव न हो।
गौरतलब है कि यह मामला तब सामने आया जब कई महिला अधिकारियों, जिनमें ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का हिस्सा रहीं अधिकारी भी शामिल थीं, ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने आरोप लगाया था कि अदालत के पूर्व आदेशों के बावजूद केंद्र सरकार और सेना स्थायी कमीशन देने में पुरुषों के मुकाबले उनके साथ भेदभाव कर रही है। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अब यह महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है, जो भविष्य में सेना में लैंगिक समानता की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

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