शरद कटियार
छात्रों का आंदोलन जब अपनी मांगों को लेकर सड़क पर उतरता है तो उसके पीछे किसी राजनीतिक दल का एजेंडा नहीं, बल्कि अपने भविष्य की चिंता होती है। परीक्षा, भर्ती, रोजगार, परिणाम, फीस और पारदर्शिता जैसे मुद्दे युवाओं के जीवन से सीधे जुड़े होते हैं। लेकिन जैसे-जैसे किसी आंदोलन का विस्तार होता है, राजनीतिक दल भी उसमें सक्रिय होने लगते हैं। यहीं से यह सवाल उठता है कि आंदोलन अपने मूल मुद्दे पर कायम है या धीरे-धीरे राजनीति का हिस्सा बनता जा रहा है।
आज बड़ी संख्या में युवा सरकारी नौकरियों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में अपने कई साल लगा रहे हैं। परिवार अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार बच्चों की पढ़ाई और तैयारी पर पैसा खर्च करते हैं। छात्र दिन-रात मेहनत करते हैं और एक परीक्षा को अपने भविष्य की सीढ़ी मानते हैं। ऐसे में भर्ती प्रक्रिया में देरी, परीक्षा में गड़बड़ी, परिणाम लटकना या नियुक्ति को लेकर अनिश्चितता उनके लिए सामान्य प्रशासनिक समस्या नहीं होती। इसका सीधा असर उनके भविष्य पर पड़ता है।
इसीलिए छात्रों की मांगों को गंभीरता से सुना जाना चाहिए। यदि हजारों युवा किसी मुद्दे को लेकर सड़क पर हैं तो सरकार और प्रशासन को यह समझना होगा कि समस्या केवल कुछ छात्रों तक सीमित नहीं हो सकती। आंदोलन की वजह तलाशना और उसके समाधान की दिशा में समयबद्ध कदम उठाना शासन की जिम्मेदारी है।
लेकिन दूसरी तरफ यह भी सच है कि छात्रों के आंदोलन में राजनीतिक दलों की बढ़ती सक्रियता कई बार मूल मुद्दे को पीछे छोड़ देती है। शुरुआत परीक्षा और भर्ती से होती है, लेकिन कुछ समय बाद मंच पर राजनीतिक भाषण ज्यादा सुनाई देने लगते हैं। अलग-अलग दल एक-दूसरे पर आरोप लगाने लगते हैं और छात्रों की वास्तविक मांग राजनीतिक बहस में दब जाती है।
राजनीतिक दलों का किसी आंदोलन का समर्थन करना लोकतंत्र में गलत नहीं है। विपक्ष का काम सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना और जनता की समस्याओं को उठाना भी है। लेकिन किसी भी आंदोलन की सफलता इस बात से तय होनी चाहिए कि उससे प्रभावित लोगों की समस्या कितनी दूर हुई, न कि किस राजनीतिक दल ने उसमें कितनी भीड़ जुटाई।
छात्रों को भी यह समझने की जरूरत है कि उनका भविष्य किसी राजनीतिक दल के राजनीतिक हित से बड़ा है। राजनीतिक समर्थन लिया जा सकता है, लेकिन आंदोलन की दिशा और मांगों पर छात्रों की पकड़ बनी रहनी चाहिए। आंदोलन का नेतृत्व और निर्णय प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए, ताकि बाद में यह सवाल न उठे कि छात्रों की आवाज किसी और के राजनीतिक एजेंडे में बदल गई।
सबसे बड़ा सवाल सरकार की कार्यशैली पर भी है। यदि भर्ती प्रक्रिया समय पर पूरी हो, परीक्षा का कैलेंडर स्पष्ट हो, परिणाम निर्धारित समय में आएं और शिकायतों के समाधान के लिए प्रभावी व्यवस्था हो तो छात्रों को बार-बार सड़क पर उतरने की जरूरत ही क्यों पड़ेगी? सरकार को ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जिसमें छात्र अपनी पढ़ाई और तैयारी पर ध्यान दें, न कि हर कुछ महीनों में किसी नई समस्या को लेकर आंदोलन करने के लिए मजबूर हों।
युवाओं के लिए समय सबसे मूल्यवान है। प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाला छात्र यदि दो-तीन साल किसी भर्ती के इंतजार में निकाल देता है तो उसकी उम्र बढ़ती जाती है और अवसर कम होते जाते हैं। कई भर्तियों में उम्र सीमा भी महत्वपूर्ण होती है। इसलिए भर्ती में देरी का असर केवल उस साल पर नहीं पड़ता, बल्कि छात्र के पूरे करियर पर पड़ सकता है।
सरकार को चाहिए कि छात्रों के प्रतिनिधियों से नियमित संवाद की व्यवस्था बनाए। किसी आंदोलन के बाद ही बातचीत शुरू करने के बजाय परीक्षा और भर्ती से जुड़े संगठनों के साथ पहले से संवाद हो। विवाद पैदा होने पर तत्काल समाधान की प्रक्रिया शुरू हो। जिन मांगों को स्वीकार किया जा सकता है, उन पर स्पष्ट समयसीमा दी जाए और जिन मांगों को स्वीकार नहीं किया जा सकता, उनके कारण छात्रों के सामने रखे जाएं।
राजनीतिक दलों की भी जिम्मेदारी है कि वे युवाओं की समस्याओं को गंभीरता से उठाएं, लेकिन छात्रों को केवल राजनीतिक संघर्ष का माध्यम न बनाएं। किसी आंदोलन में नेताओं की मौजूदगी से आंदोलन बड़ा जरूर दिखाई दे सकता है, लेकिन यदि मूल समस्या का समाधान नहीं हुआ तो अंततः छात्र ही पीछे छूट जाते हैं।
आज जरूरत इस बात की है कि छात्र आंदोलन नारे और राजनीति से आगे बढ़कर समाधान की लड़ाई बने। आंदोलन का केंद्र सरकार या विपक्ष नहीं, बल्कि छात्र और उसका भविष्य होना चाहिए।
छात्रों की आवाज को दबाना लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है और छात्रों की आवाज को राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल करना भी उचित नहीं है। दोनों के बीच संतुलन जरूरी है।
आखिरकार सवाल किसी एक सरकार, पार्टी या नेता का नहीं है। सवाल उन लाखों युवाओं का है जो रोजगार की उम्मीद में वर्षों मेहनत कर रहे हैं। उनके भविष्य को राजनीतिक रस्साकशी का हिस्सा बनाने के बजाय व्यवस्था को ऐसा बनाना होगा जिसमें परीक्षा समय पर हो, भर्ती पारदर्शी हो, परिणाम समय पर आए और मेहनत करने वाले युवा को अपने भविष्य पर भरोसा हो।
छात्रों का आंदोलन छात्रों के मुद्दे पर ही केंद्रित रहे,यही उसकी ताकत भी है और उसकी सफलता की सबसे बड़ी शर्त भी।


