शरद कटियार
देश में जब भी कोई प्रतियोगी परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होता है तो लाखों युवाओं के सपने टूटते हैं। सड़कें भर जाती हैं, प्रदर्शन होते हैं, सरकारें जांच बैठाती हैं और कुछ गिरफ्तारियां होती हैं। लेकिन क्या केवल पेपर लीक रोक देने से देश बदल जाएगा? शायद नहीं। असली सवाल इससे कहीं बड़ा है,क्या देश की राजनीति, प्रशासन, न्याय व्यवस्था और लोकतंत्र के चारों स्तंभों में योग्य, शिक्षित और ईमानदार लोगों की भागीदारी बढ़ रही है?
भारत दुनिया का सबसे युवा देश है। देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है और करीब 50 प्रतिशत आबादी 25 वर्ष से कम उम्र की है। यह वही शक्ति है जो भारत को विश्वगुरु बना सकती है, लेकिन यदि यही युवा केवल नौकरियों के पीछे भागता रहेगा और व्यवस्था निर्माण से दूर रहेगा, तो बदलाव अधूरा रहेगा।
आज देश में हर वर्ष करोड़ों युवा प्रतियोगी परीक्षाएं देते हैं। केवल सरकारी नौकरियों के लिए ही लाखों अभ्यर्थी सीमित पदों पर आवेदन करते हैं। ऐसे में एक पेपर लीक लाखों परिवारों का विश्वास तोड़ देता है। लेकिन इससे भी बड़ा संकट यह है कि व्यवस्था बनाने वाले संस्थानों में योग्य और चरित्रवान लोगों की संख्या बढ़ाने पर राष्ट्रीय बहस बहुत कम होती है।
लोकतंत्र चार स्तंभों,विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया पर टिका है। यदि विधायिका में शिक्षित, दूरदर्शी और ईमानदार जनप्रतिनिधि पहुंचेंगे तो बेहतर कानून बनेंगे। यदि प्रशासन में निष्पक्ष अधिकारी होंगे तो योजनाएं सही तरीके से लागू होंगी। यदि न्यायपालिका अधिक सक्षम और सुलभ होगी तो न्याय समय पर मिलेगा। यदि मीडिया निर्भीक, तथ्यपरक और निष्पक्ष होगा तो जनता तक सत्य पहुंचेगा।
देश में लगभग 97 करोड़ से अधिक मतदाता लोकतंत्र की ताकत हैं। हर चुनाव में करोड़ों युवा पहली बार मतदान करते हैं। यदि यही युवा जाति, धर्म और तात्कालिक नारों से ऊपर उठकर सुशासन (गुड गवर्नेंस ), पारदर्शिता और ईमानदारी को मुद्दा बनाए, तो राजनीति की दिशा बदल सकती है।
आज आवश्यकता केवल पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन की नहीं, बल्कि चरित्रवान नेतृत्व के निर्माण की है। युवाओं को केवल नौकरी मांगने वाला नहीं, बल्कि नीति बनाने वाला, जनप्रतिनिधि बनने वाला, ईमानदार पत्रकार, निष्पक्ष न्यायविद और संवेदनशील प्रशासक बनने का संकल्प लेना होगा।
क्रांति केवल सड़कों पर नारे लगाने से नहीं आती। असली क्रांति तब आती है जब समाज अपनी सोच बदलता है। जब युवा राजनीति को गंदगी नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का माध्यम समझेगा। जब ईमानदार लोग चुनाव लड़ेंगे और समाज उन्हें समर्थन देगा। जब पत्रकार सत्ता नहीं, सच के साथ खड़े होंगे। जब शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक तैयार करना होगा।
पेपर लीक रोकना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है ऐसी व्यवस्था बनाना जहां ईमानदारी अपवाद नहीं, बल्कि सामान्य नियम हो।
जिस दिन भारत का युवा सुशासन, पारदर्शिता, जवाबदेही और राष्ट्रहित को लेकर व्यापक जनजागरण करेगा, उसी दिन से भारत में वास्तविक परिवर्तन की शुरुआत होगी। वही दिन लोकतंत्र की सबसे बड़ी जीत होगी और वही भारत के स्वर्णिम भविष्य की आधारशिला बनेगा।


