शरद कटियार
सत्ता के सबसे मजबूत परिवार भी भीतर से कितने टूटे हुए हो सकते हैं, यह शायद प्रतीक यादव की मौत के बाद सामने आए घटनाक्रम ने दिखा दिया। बाहर से एकजुट दिखाई देने वाला सैफई परिवार आज सवालों, सन्नाटों और संवेदनाओं के ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां हर चेहरा कुछ छिपाता हुआ नजर आ रहा है।
यह सिर्फ एक व्यक्ति की मौत की कहानी नहीं रह गई। यह उस राजनीतिक विरासत की कहानी बनती जा रही है, जिसे कभी मुलायम सिंह यादव ने अपने संघर्ष, समाजवाद और पारिवारिक एकजुटता से खड़ा किया था। लेकिन अब वही विरासत रिश्तों की खामोश लड़ाई में उलझती दिख रही है।
प्रतीक यादव राजनीति से दूरी बनाकर रखने वाले, अपेक्षाकृत शांत स्वभाव के व्यक्ति माने जाते थे। वह सत्ता की चमक से अधिक निजी जीवन और कारोबार में सक्रिय रहे। लेकिन परिवार की राजनीति और बदलते समीकरणों ने उन्हें धीरे-धीरे एक ऐसे घेरे में ला खड़ा किया, जहां न पूरी तरह वह सियासत से बाहर रह सके और न परिवार के भीतर सहज रह पाए।
जब तक नेताजी और साधना गुप्ता जीवित रहीं, तब तक परिवार की डोर किसी न किसी रूप में बंधी रही। मतभेद थे, लेकिन मर्यादाएं भी थीं। त्योहारों, पारिवारिक आयोजनों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में एक साथ खड़े चेहरे यह भरोसा देते थे कि यादव परिवार की जड़ें अभी मजबूत हैं। मगर नेताजी के जाने के बाद मानो वह संतुलन भी टूट गया।
अखिलेश यादव और प्रतीक यादव के रिश्तों को लेकर अक्सर अटकलें लगाई जाती रहीं, लेकिन कई मौकों पर प्रतीक ने सार्वजनिक रूप से अखिलेश को अपना बड़ा भाई कहा। उन्होंने यह भी कहा कि नेताजी की विरासत और परिवार की एकता सबसे ऊपर है। यही कारण है कि उनकी मौत के बाद अखिलेश यादव का सुबह से पोस्टमार्टम हाउस और अंतिम यात्रा में मौजूद रहना सिर्फ राजनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि भावनात्मक जिम्मेदारी के रूप में देखा गया।
लेकिन इसी बीच जो दृश्य सामने आए, उन्होंने कई नए सवाल खड़े कर दिए। शोक संदेशों से लेकर अंतिम संस्कार की व्यवस्थाओं तक, हर जगह एक अजीब दूरी महसूस की गई। जिस परिवार की पहचान सामूहिक उपस्थिति और शक्ति प्रदर्शन रही हो, वहां कई महत्वपूर्ण फैसलों में परिवार के वरिष्ठ लोगों की भूमिका सीमित दिखाई देना स्वाभाविक रूप से चर्चा का विषय बना।
सबसे ज्यादा बहस मुखाग्नि को लेकर हुई। भारतीय परंपरा में अंतिम संस्कार सिर्फ एक धार्मिक प्रक्रिया नहीं बल्कि पारिवारिक संरचना और भावनात्मक अधिकार का प्रतीक भी माना जाता है। ऐसे में जब पूरा यादव परिवार मौजूद था और फिर भी मुखाग्नि ससुर द्वारा दी गई, तो लोगों ने इसे सामान्य घटना की तरह नहीं देखा। सवाल उठे कि क्या यह सिर्फ एक निजी निर्णय था या फिर रिश्तों के भीतर गहरी खामोश दरार का सार्वजनिक संकेत?
अपर्णा यादव भी इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में आ गईं। एक तरफ पति की असामयिक मौत का दुख, दूसरी ओर उनकी राजनीतिक पहचान और तीसरी ओर समाजवादी परिवार से लगातार बढ़ती दूरी — इन तीनों ने उन्हें बहस के घेरे में ला दिया। उनके शोक संदेशों, सार्वजनिक उपस्थिति और राजनीतिक कार्यक्रमों को लेकर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं।
हालांकि किसी भी परिवार के निजी संबंधों का अंतिम सच बाहर से देख पाना आसान नहीं होता। राजनीतिक परिवारों में निजी जीवन अक्सर सार्वजनिक व्याख्याओं का शिकार बन जाता है। मगर यहां मामला सिर्फ निजी नहीं रह गया, क्योंकि हर घटना राजनीतिक प्रतीक में बदलती चली गई।
पोस्टमार्टम, पुराने चोटों के निशान, अस्पताल ले जाने का फैसला, डिजिटल डिवाइस की जांच, सोशल मीडिया पोस्ट, पारिवारिक दूरी , इन तमाम पहलुओं ने इस मौत को रहस्य और संवेदना के बीच खड़ा कर दिया है। अभी तक किसी जांच एजेंसी ने किसी साजिश की पुष्टि नहीं की है, और बिना प्रमाण किसी निष्कर्ष पर पहुंचना भी खतरनाक होगा। लेकिन यह भी सच है कि सवाल जितने दबाने की कोशिश होती है, वे उतनी तेजी से फैलते हैं।
इस पूरी कहानी का सबसे दुखद पक्ष शायद दो मासूम बेटियां हैं, जिन्होंने बहुत कम उम्र में अपने पिता को खो दिया। राजनीति, विरासत, रिश्तों और आरोपों की इस आंधी के बीच उनका भविष्य ही सबसे बड़ा सवाल है। क्या यादव परिवार इस दुख के बाद फिर एकजुट हो पाएगा? क्या अखिलेश यादव सचमुच बड़े भाई और चाचा की भूमिका को उसी तरह निभा पाएंगे, जैसी उम्मीदें जताई जा रही हैं? और क्या अपर्णा यादव अपने राजनीतिक और पारिवारिक जीवन के बीच कोई नया संतुलन बना पाएंगी?
फिलहाल सैफई की राजनीति और यादव परिवार की विरासत एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां मौत सिर्फ शोक नहीं पैदा कर रही, बल्कि वर्षों से दबे रिश्तों, महत्वाकांक्षाओं और अंदरूनी संघर्षों को भी उजागर करती जा रही है। शायद आने वाले समय में यह मामला सिर्फ एक पारिवारिक त्रासदी नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में रिश्तों और सत्ता के बदलते चरित्र का बड़ा अध्ययन बनकर सामने आए।


