– इतिहास फिर हुआ जिंदा
उत्तर प्रदेश की विधानसभा में उठा नारी गरिमा का मुद्दा एक बार फिर यह साबित करता है कि राजनीति में कुछ विषय ऐसे हैं, जो समय के साथ खत्म नहीं होते,बल्कि हर दौर में नए संदर्भों के साथ लौट आते हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने समाजवादी पार्टी पर तीखा हमला बोलते हुए जब 1995 गेस्ट हाउस कांड का जिक्र किया और फर्रुखाबाद के नेता ब्रह्मदत्त द्विवेदी की भूमिका को सामने रखा, तो यह केवल एक राजनीतिक बयान नहीं था—यह उस इतिहास को फिर से खंगालने की कोशिश थी, जिसे भारतीय राजनीति का काला अध्याय माना जाता है।
गेस्ट हाउस कांड का जिक्र होते ही एक ऐसा दौर सामने आ जाता है, जब सत्ता की लड़ाई ने मर्यादाओं को तोड़ दिया था। उस समय मायावती के साथ हुई घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था। मुख्यमंत्री का यह कहना कि ब्रह्मदत्त द्विवेदी ने अपनी जान जोखिम में डालकर उनकी रक्षा की, एक साहसिक प्रसंग जरूर है, लेकिन इसके पीछे छिपा बड़ा सवाल आज भी वही है,क्या हमारी राजनीति कभी इस स्तर तक गिर सकती है कि महिलाओं की गरिमा दांव पर लग जाए?
आज जब समाजवादी पार्टी नारी सम्मान और गरिमा की बात करती है, तो सत्तापक्ष उस इतिहास को सामने रखकर उसकी नैतिकता पर सवाल खड़ा करता है। लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि हम इस बहस को केवल राजनीतिक हथियार तक सीमित न रखें। समाजवादी पार्टी हो या कोई अन्य दल,नारी सुरक्षा का मुद्दा किसी एक पार्टी का नहीं, बल्कि पूरे समाज और शासन व्यवस्था की जिम्मेदारी है।
यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि समय बदलने के बावजूद महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान से जुड़े सवाल पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। अपराध के आंकड़े, सामाजिक घटनाएं और आए दिन सामने आने वाले मामले यह संकेत देते हैं कि समस्या केवल इतिहास तक सीमित नहीं है, बल्कि वर्तमान में भी मौजूद है। ऐसे में केवल अतीत की घटनाओं को याद कर विपक्ष को घेरना पर्याप्त नहीं, बल्कि वर्तमान में ठोस सुधार करना भी उतना ही जरूरी है।
राजनीति में स्मृति और रणनीति का गहरा संबंध होता है। गेस्ट हाउस कांड का जिक्र केवल इतिहास नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी है कि मतदाता अतीत को न भूलें। लेकिन सवाल यह है कि क्या मतदाता केवल अतीत के आधार पर निर्णय करेगा, या वर्तमान की नीतियों और जमीनी हालात को भी देखेगा?
फर्रुखाबाद के ब्रह्मदत्त द्विवेदी का नाम इस बहस में एक प्रतीक के रूप में उभरता है—एक ऐसे व्यक्ति के रूप में, जिसने संकट की घड़ी में हस्तक्षेप किया। लेकिन इस प्रतीक से आगे बढ़कर हमें उस व्यवस्था को देखना होगा, जिसने ऐसी परिस्थिति पैदा होने दी।
नारी गरिमा पर राजनीति का यह टकराव हमें दो रास्ते दिखाता है—एक, अतीत को हथियार बनाकर सियासी लाभ लेना; दूसरा, अतीत से सीख लेकर वर्तमान को सुधारना।
अगर यह मुद्दा केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रहा, तो यह नारी सम्मान के साथ अन्याय होगा। लेकिन अगर इसे एक गंभीर चेतावनी मानकर ठोस नीतियों और कड़े क्रियान्वयन में बदला गया, तो यही बहस समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती है।
निष्कर्ष स्पष्ट है,नारी गरिमा कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी है।और इसकी रक्षा केवल भाषणों से नहीं, बल्कि सख्त फैसलों और ईमानदार नीयत से ही संभव है।
नारी गरिमा पर सियासत या सच का सामना विधानसभा में उठा सवाल


