– क्या ‘नारी शक्ति’ सिर्फ नारा रह जाएगी या सच में मिलेगा अधिकार?
– संसद में नारी शक्ति वंदन संशोधन विधेयक का गिरना सिर्फ एक संसदीय घटना नहीं, बल्कि देश की आधी आबादी के अधिकारों पर खड़े हुए बड़े राजनीतिक सवाल का संकेत है। 33 प्रतिशत महिला आरक्षण का मुद्दा वर्षों से राजनीति के केंद्र में रहा है, लेकिन हर बार यह या तो सहमति की कमी या सियासी रणनीति का शिकार बनता रहा है। इस बार भी वही तस्वीर दोहराई गई—लेकिन इस बार प्रतिक्रिया पहले से ज्यादा तीखी और व्यापक है।
उत्तर प्रदेश की सियासत में इस मुद्दे ने नया मोड़ ले लिया है। सत्ता पक्ष ने इसे सीधे-सीधे “महिला अधिकार बनाम विपक्ष” की लड़ाई के रूप में पेश कर दिया है। सरकार से जुड़े नेताओं का आरोप है कि विपक्षी दल महिलाओं को सशक्त करने की बात तो करते हैं, लेकिन जब उन्हें वास्तविक राजनीतिक भागीदारी देने की बात आती है, तो पीछे हट जाते हैं। यह आरोप सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि उस पुरानी बहस को फिर से जिंदा करता है—क्या भारतीय राजनीति अब भी परिवारवाद और सीमित प्रतिनिधित्व के दायरे में कैद है?
विपक्ष के रवैये पर उठे सवालों में एक तीखा राजनीतिक व्यंग्य भी शामिल है—क्या संसद और विधानसभाओं में जगह सिर्फ कुछ चुनिंदा परिवारों की महिलाओं के लिए सुरक्षित है? यह सवाल भले ही राजनीतिक हो, लेकिन इसके पीछे एक गहरी सामाजिक चिंता छिपी है। देश में महिलाएं शिक्षा, प्रशासन, विज्ञान और सेना जैसे क्षेत्रों में लगातार अपनी भागीदारी बढ़ा रही हैं, लेकिन राजनीति में उनकी हिस्सेदारी अभी भी सीमित है। लोकसभा में महिलाओं का प्रतिशत आज भी लगभग 15 फीसदी के आसपास है, जो बताता है कि वास्तविक प्रतिनिधित्व अभी दूर है।
सत्ता पक्ष इस पूरे मुद्दे को अपने पक्ष में एक मजबूत नैरेटिव के रूप में गढ़ रहा है। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री स्तर पर महिलाओं के लिए चलाई गई योजनाओं—जैसे उज्ज्वला, शौचालय निर्माण, कन्या सुमंगला, मिशन शक्ति—को उदाहरण बनाकर यह संदेश दिया जा रहा है कि सरकार सिर्फ घोषणा नहीं, बल्कि जमीन पर काम कर रही है। वहीं तीन तलाक जैसे फैसलों को भी महिला सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम बताया जा रहा है।
लेकिन यहां एक जरूरी सवाल यह भी है कि क्या सिर्फ योजनाएं और फैसले ही पर्याप्त हैं? असली बदलाव तब आएगा जब महिलाएं खुद नीति निर्धारण की प्रक्रिया का हिस्सा बनेंगी। संसद और विधानसभाओं में उनकी संख्या बढ़ेगी, तभी उनके मुद्दे प्राथमिकता बन पाएंगे। यही वजह है कि 33 प्रतिशत आरक्षण का मुद्दा इतना महत्वपूर्ण माना जाता है।
विपक्ष की दलीलें भी पूरी तरह नजरअंदाज नहीं की जा सकतीं। कुछ दलों का तर्क रहा है कि आरक्षण में सामाजिक और जातीय संतुलन का भी ध्यान रखा जाना चाहिए, ताकि हर वर्ग की महिलाओं को समान अवसर मिल सके। लेकिन यह तर्क अक्सर विधेयक को टालने का कारण भी बन जाता है। सवाल यही है कि क्या सुधार की प्रक्रिया को और लंबा खींचना समाधान है, या फिर पहले एक ठोस कदम उठाकर आगे की राह तय करनी चाहिए?
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बात साफ कर दी है कि महिला आरक्षण अब सिर्फ एक विधेयक नहीं, बल्कि 2026 और आगे की राजनीति का बड़ा मुद्दा बनने जा रहा है। सत्ता पक्ष इसे “महिला सम्मान” के रूप में पेश करेगा, जबकि विपक्ष को अपने रुख को स्पष्ट करना होगा, वरना “महिला विरोधी” की छवि से बच पाना मुश्किल होगा।
आखिरकार, यह लड़ाई किसी एक दल की नहीं, बल्कि देश की आधी आबादी के अधिकारों की है। अगर राजनीतिक दल इस मुद्दे को भी सिर्फ चुनावी फायदे-नुकसान के तराजू में तौलते रहे, तो नारी शक्ति का सशक्तिकरण सिर्फ भाषणों और नारों तक सीमित रह जाएगा। असली परीक्षा अब यह है कि क्या भारत की राजनीति महिलाओं को बराबरी का स्थान देने के लिए तैयार है या फिर यह सवाल आने वाले वर्षों तक यूं ही अधूरा रहेगा।


