
– अनूप मिश्रा
देश की सर्वोच्च प्रशासनिक सेवा में चयन के लिए आयोजित संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा एक बार फिर सवालों के घेरे में है। हालिया परिणामों और उससे जुड़े तथ्यों का विश्लेषण यह संकेत देता है कि चयन प्रक्रिया में कई स्तरों पर ऐसी खामियां मौजूद हैं, जो प्रतिभाशाली अभ्यर्थियों के साथ न्याय नहीं कर पा रहीं।
प्रारंभिक जांच में यह सामने आया कि वर्ष 2024 की परीक्षा में कुछ अभ्यर्थियों ने ऐसे विकल्पों और माध्यमों का चयन किया, जिनसे उन्हें असामान्य लाभ मिला। खासतौर पर इंडियन फॉरेस्ट सर्विस और भारतीय पुलिस सेवा से जुड़े मामलों में यह बात सामने आई कि कुछ उम्मीदवारों ने अपने मूल विषयों के बजाय दूसरे विकल्प चुनकर अंक अर्जित किए, जिससे निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा पर प्रश्नचिह्न लगा।
पिछले वर्षों के परिणामों का तुलनात्मक अध्ययन बताता है कि परीक्षा के मूल्यांकन और साक्षात्कार प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी रही है। कई मामलों में अभ्यर्थियों को अपेक्षाकृत कम अंक देकर पीछे कर दिया गया, जबकि कुछ को औसत प्रदर्शन के बावजूद उच्च स्थान मिल गया। यह असंतुलन चयन प्रणाली की विश्वसनीयता को सीधे प्रभावित करता है।
भाषा का मुद्दा भी लगातार विवाद का कारण बन रहा है। आंकड़े बताते हैं कि अंग्रेजी माध्यम के अभ्यर्थियों को मूल्यांकन में बढ़त मिलती है, जबकि भारतीय भाषाओं में परीक्षा देने वाले अभ्यर्थियों को अपेक्षाकृत कम अंक प्राप्त होते हैं। मुख्य लिखित परीक्षा 1750 अंकों की होती है, जिसमें इंटरव्यू के 275 अंक जोड़कर अंतिम मेरिट बनाई जाती है। ऐसे में इंटरव्यू में दिए गए अंक निर्णायक भूमिका निभाते हैं, और यहीं सबसे अधिक असमानता के आरोप सामने आते हैं।
इस बार के परिणामों में यह भी देखने को मिला कि कई अभ्यर्थियों ने लिखित परीक्षा में 50 प्रतिशत से अधिक अंक हासिल किए, लेकिन इंटरव्यू में अपेक्षाकृत कम अंक मिलने के कारण वे अंतिम सूची से बाहर हो गए। वहीं कुछ अभ्यर्थियों को इंटरव्यू में 95 प्रतिशत तक अंक दिए जाने के उदाहरण भी सामने आए, जिसने चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इंटरव्यू बोर्ड की संरचना में विविधता का अभाव भी इस असंतुलन की एक बड़ी वजह है। यदि चयन प्रक्रिया में सभी वर्गों, क्षेत्रों और सामाजिक पृष्ठभूमियों के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाए, तो भेदभाव की आशंका को काफी हद तक समाप्त किया जा सकता है। इंटरव्यू लेने वाली टीम में व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना समय की मांग बन चुका है, ताकि हर अभ्यर्थी को उसकी मेहनत के आधार पर निष्पक्ष मूल्यांकन मिल सके।
एक और महत्वपूर्ण मुद्दा पाठ्यक्रम से जुड़ा है। हाल के वर्षों में कुछ वैकल्पिक विषयों और अध्ययन क्षेत्रों को शामिल करने को लेकर भी विवाद हुआ है। इस संदर्भ में यह स्पष्ट रूप से सामने आ रहा है कि किसी एक धार्मिक या वैचारिक अध्ययन, जैसे इस्लामिक शिक्षा स्टडी को विशेष रूप से बढ़ावा देना, परीक्षा की तटस्थता के सिद्धांत के विपरीत है। सिविल सेवा परीक्षा का स्वरूप पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष और संतुलित होना चाहिए, जिसमें किसी भी विशेष विचारधारा या धार्मिक अध्ययन को प्राथमिकता न दी जाए।
इतिहास बताता है कि प्रशासनिक सेवाओं के लिए चयन प्रक्रिया में निरंतर सुधार की आवश्यकता होती है। वर्ष 1979 की कोठारी समिति की सिफारिशों के आधार पर जो ढांचा तैयार किया गया था, वह आज बदलते सामाजिक और शैक्षणिक परिदृश्य के अनुरूप पूरी तरह प्रासंगिक नहीं रह गया है। ऐसे में समय-समय पर इसकी समीक्षा और सुधार अनिवार्य है।
विशेष रूप से ग्रामीण और वंचित वर्गों के अभ्यर्थियों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना आज की सबसे बड़ी जरूरत है। दिल्ली जैसे शहरी केंद्रों में कोचिंग और संसाधनों की उपलब्धता के कारण वहां के अभ्यर्थियों को बढ़त मिलती है, जबकि छोटे शहरों और गांवों के प्रतिभाशाली छात्र पीछे रह जाते हैं। यह असंतुलन देश की प्रशासनिक संरचना में भी असमानता को जन्म देता है।
साफ है कि यदि सिविल सेवा जैसी महत्वपूर्ण परीक्षा में पारदर्शिता, समान अवसर और निष्पक्षता को मजबूत नहीं किया गया, तो यह व्यवस्था अपने मूल उद्देश्य से भटक सकती है। जरूरत इस बात की है कि चयन प्रक्रिया को पूरी तरह संतुलित, पारदर्शी और समावेशी बनाया जाए, ताकि देश को वास्तविक अर्थों में योग्य और निष्पक्ष प्रशासनिक अधिकारी मिल सकें।
लेखक -मेंबर ऑफ़ पार्लियामेंट के सहायक और सलाहकार भी हैँ।


