(डॉ. सुधाकर आशावादी-विभूति फीचर्स)
संचार क्रांति युग में विश्व मानव की अवधारणा साकार हो रही है तथा अपनी प्रतिभा के बल पर प्रत्येक व्यक्ति के सम्मुख प्रगति करने की असीम संभावनाएं हैं। लेकिन भारत की जातीय संकीर्णता में उलझा व्यक्ति उन असीम संभावनाओं को यथार्थ के धरातल पर उतारने हेतु उतावला प्रतीत नहीं होता। ऐसा लगता है कि जैसे उसका अपनी मानसिक और शारीरिक क्षमताओं पर से भरोसा कम होता जा रहा हो । ऐसे में हर उस व्यक्ति के मानस पटल पर एक प्रश्न उभरता है, कि जिसे स्वयं पर विश्वास है तथा जो श्रीमद्भगवत गीता की शिक्षाओं के आधार पर कर्म प्रधानता को सर्वोपरि मानता है। वह प्रतिभा सम्पन्न होते हुए भी अपनी योग्यता व क्षमता के अनुसार उचित सम्मान क्यों नहीं पा रहा है ?
कौन नहीं जानता कि भारत में जैसे जैसे विकास की बयार बहने लगी है तथा आम आदमी के लिए सुलभ यातायात तथा आधुनिक माध्यमों का जनोपयोगी प्रयोग हो रहा है। अनुसंधान के क्षेत्र में भारत विकसित देशों के समकक्ष खड़ा होने लगा है, वैसे वैसे कुछ क्षेत्रीय व जातीय संगठन अपने आप को पिछड़ा, अति पिछड़ा, दलित, महादलित के दायरे में सिमटे रहने की बात करने लगे हैं। कभी महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण की बात की जाती है, कभी हरियाणा व उत्तर प्रदेश में जाट आरक्षण का मुद्दा उठाने की बात की जाती है। अन्यत्र भी कुछ समूह तथा कुछ जातियां स्वयं को आरक्षण के दायरे में लाने का दवाब बनाना शुरू कर देती हैं।
आर्थिक सुधारों के नाम पर यदि आर्थिक रूप से दुर्बल आय वर्ग के लिए यदि सांकेतिक आरक्षण का विधान हो, तो तर्क समझ आता है, किन्तु क्षेत्रीय या जातियों के आधार पर आरक्षण की बात हो, तो इसलिए समझ आने योग्य नही है, कि गरीबी सम्पूर्ण समाज में हैं, किसी जाति विशेष में गरीबी या अमीरी कम या अधिक हो सकती है, लेकिन कोई क्षेत्र या कोई जाति सम्पूर्ण रूप से दलित, पिछड़ी या गरीब है, ऐसा व्यावहारिक रूप से सम्भव नही है। जहाँ तक जातियों में भेद का प्रश्न है, तो मानव मानव में भेद का आधार परिभाषित किया जाना अनिवार्य है। पशु, पक्षियों व जीव जंतुओं में जो भी भेद है, वह उनके गुणधर्म के आधार पर है, उनके रूप, रंग, आकार, जीवन शैली के आधार पर उनका विभेदीकरण किया गया है। गुणधर्म के आधार पर सांप, बिच्छू व पशु पक्षियों की प्रजाति में विभक्त किया गया है, किन्तु मानवीय दृष्टिकोण से मानव मानव के मध्य जातीय विभेदीकरण का आधार क्या है, क्या किसी व्यक्ति के चेहरे पर उसकी जाति लिखी होती है, यदि नहीं तो फिर मानव को जातियों में बांटकर जातिगत वैमनस्य को बढ़ावा क्यों दिया जा रहा है ? क्या मानव की बुद्धिलब्धि जातीय आधार पर ही सुनिश्चित होती है, यदि नहीं, तो जातीय पूर्वाग्रह में हम अपने आप को पिछड़े व दलित की सीमाओं तक क्यों सीमित करना चाहते हैं, समाज के कुछ लोगों को जातीय आधार पर अगड़ा आरोपित करके द्वेष क्यों करते हैं। क्या तथाकथित अगड़ा समझे जाने वाले लोगों में कोई भी व्यक्ति या परिवार आर्थिक या सामाजिक शोषण का शिकार नही होता ?
यूँ तो विश्व भर में मानवाधिकार आयोग सामान्य मानव पर आने वाली किसी भी विपत्ति पर पीड़ित के साथ खड़ा होता है, किन्तु इस विभेदकारी समस्या की ओर वह ध्यान क्यों नहीं देता ? इस सत्य को नकारा नहीं जा सकता कि भारत जैसे विकासोन्मुख राष्ट्र को आरक्षण विकलांग बना रहा है। प्रतिभाएं आरक्षण के कारण अपनी जड़ों से बिछड़कर विदेशों में पलायन हेतु विवश हैं। जिस गति से देश का विकास होना चाहिए, उस गति से देश का विकास नहीं हो पा रहा है, कारण स्पष्ट है कि योग्यता के अनुरूप प्रतिभाओं को कार्य नहीं मिल रहा है।
विचारणीय बिंदु यह भी है कि विश्व के प्रत्येक देश में अमीरी गरीबी है, किन्तु क्या किसी देश में आरक्षण के नाम पर मानव मानव में भेद किया गया है? यदि नही, तो भारत में ही आरक्षण के लिए आंदोलन करके आम आदमी के बीच जातीय वैमनस्यता को बढ़ावा क्यों दिया जा रहा है ? क्यों किसी व्यक्ति को मनगढ़ंत आरोप लगाकर अपनी जाति से इतर जातियों पर अपराधिक मुकदमे दर्ज कराने की छूट मिली हुई है ? जिस जाति का प्रमाण पत्र बनवाकर जातिगत लाभ लिया जाता है, उस जाति का नाम उच्चारित करना अपराध की श्रेणी में कैसे आ जाता है। समय आ गया कि जब राष्ट्रीय उत्पादों व सेवाओं की गुणवत्ता से कोई समझौता न किया जाए । आरक्षण की पूर्ण समीक्षा हो तथा सभी वर्गों के दुर्बल आय वर्ग के लिए केवल सुविधाओं में आरक्षण हो, न कि रोजगार में। जब तक मानव मानव के बीच आरक्षण का भेद एवं वैमनस्यता बढ़ाने वाली नीतियां रहेंगी, तब तक राष्ट्र के सुनियोजित विकास पर प्रश्नचिन्ह लगा रहेगा। (विभूति फीचर्स)


