फर्रुखाबाद।
जनता के बीच जाकर समस्याएं सुनने और जमीनी हकीकत समझने वाली राजनीति अब धीरे-धीरे मोबाइल स्क्रीन और कैमरों तक सिमटती जा रही है। फर्रुखाबाद में भी पिछले कुछ समय से “रील पॉलिटिक्स” तेजी से बढ़ी है, जहां कुछ नेताओं ने सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसरों और डिजिटल प्रचार की आड़ लेकर जनता से वास्तविक दूरी बना ली है। कैमरे पर विकास दिखाई देता है, लेकिन जमीन पर हालात अक्सर अलग नजर आते हैं।
शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहां टूटी सड़कें, जलभराव, बिजली संकट, बेरोजगारी और स्वास्थ्य सेवाओं की समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर नेताओं की चमकदार रील्स और वीडियो में सबकुछ “बेहतर” दिखाया जाता है। कुछ स्थानीय इन्फ्लुएंसर और डिजिटल पेज पैसे लेकर नेताओं के पक्ष में माहौल बनाने में जुटे हैं।
सूत्रों के अनुसार छोटे स्तर पर 2 से 5 हजार रुपये तक देकर “पॉजिटिव वीडियो” तैयार कराए जा रहे हैं। इनमें नेताओं को गरीबों के मसीहा, विकास पुरुष और जनता का सबसे बड़ा हितैषी बताकर पेश किया जाता है। कई वीडियो ऐसे स्थानों पर शूट होते हैं जहां सिर्फ कैमरे के सामने सफाई या दिखावटी व्यवस्था कर दी जाती है, जबकि आसपास की वास्तविक स्थिति बदहाल बनी रहती है।
फर्रुखाबाद में युवाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा तेजी से बढ़ रही है कि अब कुछ नेता जनता से सीधे संवाद करने के बजाय सोशल मीडिया प्रचार पर ज्यादा भरोसा करने लगे हैं। पहले जहां नेता मोहल्लों, गांवों और बाजारों में जाकर लोगों की शिकायतें सुनते थे, वहीं अब कई जनप्रतिनिधि कैमरे के जरिए “वर्चुअल लोकप्रियता” हासिल करने में व्यस्त दिखाई देते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया जनता तक पहुंचने का प्रभावी माध्यम जरूर है, लेकिन जब इसका उपयोग सिर्फ छवि चमकाने और वास्तविक समस्याओं को छिपाने के लिए होने लगे, तब यह लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी बन जाता है। फर्रुखाबाद जैसे जिलों में बेरोजगारी, स्वास्थ्य सेवाओं की कमजोरी, अवैध खनन, जर्जर सड़कें और बिजली संकट जैसे मुद्दे आज भी गंभीर बने हुए हैं, लेकिन इन विषयों पर चर्चा कम और प्रचार ज्यादा दिखाई देता है।
युवाओं का कहना है कि अब “रील” और “रियलिटी” के बीच फर्क समझना जरूरी हो गया है। क्योंकि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाला हर विकास जमीन पर मौजूद हो, यह जरूरी नहीं। कई बार जनता की असली समस्याओं को चमकदार वीडियो और भावनात्मक प्रचार के पीछे दबा दिया जाता है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह दौर “डिजिटल इमेज पॉलिटिक्स” का है, जहां नेता जमीनी काम से ज्यादा ऑनलाइन लोकप्रियता को महत्व देने लगे हैं। लेकिन लंबे समय तक जनता को सिर्फ वीडियो और प्रचार से प्रभावित नहीं किया जा सकता। आखिरकार जनता सड़क, बिजली, पानी, रोजगार और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर ही फैसला करती है।
फर्रुखाबाद में बढ़ती “रील पॉलिटिक्स” ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है,क्या जनता की समस्याओं का समाधान अब कैमरे से होगा या जमीन पर काम करके? क्योंकि सोशल मीडिया की चमक कुछ समय तक सच्चाई को छिपा सकती है, मिटा नहीं सकती।


