राम केवल एक धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना, विश्वास और करोड़ों लोगों की भावनाओं का केंद्र हैं। अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण देश के इतिहास की सबसे बड़ी जनभागीदारी वाली परियोजनाओं में से एक माना जाता है। करोड़ों श्रद्धालुओं ने अपनी श्रद्धा, विश्वास और समर्पण के साथ मंदिर निर्माण के लिए दान दिया। किसी ने सोना चढ़ाया, किसी ने अपनी बचत का हिस्सा दिया, तो किसी ने वर्षों की मेहनत की कमाई भगवान श्रीराम के चरणों में अर्पित कर दी।
ऐसे में यदि राम मंदिर चढ़ावा, दान या भूमि खरीद से जुड़े मामलों में सवाल उठ रहे हैं, तो उन्हें केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि अब स्वयं विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठन की बैठकों में जांच का दायरा बढ़ाने की मांग उठने लगी है। यह संकेत है कि मामला केवल विपक्षी दलों के आरोपों तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि रामभक्तों के मन में भी पारदर्शिता को लेकर प्रश्न खड़े हो रहे हैं।
विहिप के केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल द्वारा यह मांग किया जाना कि राम मंदिर के नाम पर धन और सोना एकत्र करने वाले अन्य ट्रस्टों, रामालय ट्रस्ट और राम जन्म मंदिर पुनर्निर्माण ट्रस्ट के खातों की भी जांच हो, एक गंभीर विषय है। यदि विभिन्न माध्यमों से चंदा एकत्र हुआ था तो जनता को यह जानने का अधिकार है कि वह धन कहां खर्च हुआ, किस उद्देश्य से उपयोग किया गया और उसका लेखा-जोखा क्या है।
राम मंदिर कोई निजी संस्था या कारोबारी परियोजना नहीं है। यह करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़ा राष्ट्रीय विषय है। इसलिए यहां पारदर्शिता की कसौटी भी सबसे ऊंची होनी चाहिए। जिस धन को लोगों ने प्रभु श्रीराम की सेवा समझकर अर्पित किया, उस धन के उपयोग पर किसी भी प्रकार का संदेह पैदा होना स्वयं मंदिर आंदोलन की नैतिक शक्ति को कमजोर कर सकता है।
आज आवश्यकता किसी को बचाने या किसी को फंसाने की नहीं है। आवश्यकता है निष्पक्ष और व्यापक जांच की। यदि सभी लेन-देन नियमों के अनुसार हुए हैं तो जांच से सत्य और अधिक मजबूती के साथ सामने आएगा। लेकिन यदि कहीं कोई अनियमितता हुई है, तो दोषी चाहे कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो, उसे कानून के दायरे में लाना होगा।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि राम के नाम पर आया धन आखिर गया कहां? इसका उत्तर भावनाओं से नहीं, दस्तावेजों से मिलेगा। श्रद्धालु आरोप नहीं, पारदर्शिता चाहते हैं। वे विवाद नहीं, विश्वास चाहते हैं। वे राजनीति नहीं, जवाबदेही चाहते हैं।
राम मंदिर केवल पत्थरों का भव्य ढांचा नहीं है। यह विश्वास का मंदिर है। और विश्वास तभी मजबूत रहता है जब उसके साथ पारदर्शिता, ईमानदारी और जवाबदेही भी खड़ी हो। इसलिए समय की मांग है कि जांच का दायरा बढ़े, हर खाते की पड़ताल हो, हर लेन-देन सार्वजनिक हो और राम के नाम पर आए एक-एक रुपये का हिसाब देश के सामने रखा जाए।


