शरद कटियार
उत्तर प्रदेश की राजनीति में अब गांव सिर्फ वोट बैंक नहीं रहे, बल्कि सत्ता का असली प्रयोगशाला बन चुके हैं। सरकार की योजनाओं का खजाना खुलता है, तो उसकी चाबी सीधे प्रधानों के हाथ पहुंच जाती है। यही वजह है कि गांवों में प्रधान अब जनसेवक कम और “स्थानीय सत्ता के महाराजा” ज्यादा दिखाई देने लगे हैं।
सड़क से लेकर शौचालय तक, आवास से लेकर पंचायत भवन तक और तालाब से लेकर खेल मैदान तक,हर योजना का रास्ता प्रधान की चौखट से होकर गुजरता है। गांव की जनता लाइन में खड़ी रहती है, लेकिन फैसला अक्सर वही होता है जो पंचायत की सत्ता चाहती है।
सरकार गांवों के विकास का दावा करती है, मगर जमीनी हकीकत यह है कि कई जगह विकास से ज्यादा “वितरण की राजनीति” चल रही है। पात्रता का पैमाना जरूरत नहीं, बल्कि नजदीकी और राजनीतिक निष्ठा बनता जा रहा है। यही कारण है कि पंचायत चुनावों में अब वैचारिक लड़ाई नहीं, बल्कि संसाधनों पर कब्जे की जंग दिखाई देती है।
गांवों में प्रधानों की बढ़ती ताकत ने प्रशासन को भी कई जगह बैकफुट पर ला दिया है। अफसर आते-जाते रहते हैं, लेकिन गांव की स्थायी सत्ता प्रधान और उसका नेटवर्क ही बना रहता है। यही वजह है कि अब हर सरकारी घोषणा को गांव में “महाराज का तोहफा” और प्रधान की कृपा के रूप में प्रचारित किया जाता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या योजनाओं का लाभ वास्तव में अंतिम व्यक्ति तक पहुंच रहा है, या फिर लोकतंत्र की सबसे निचली इकाई भी अब सत्ता और प्रभाव की राजनीति में फंसती जा रही है?
गांव की चौपाल फिलहाल यही कह रही है,सरकार लखनऊ से चलती होगी, लेकिन गांव की सल्तनत अभी प्रधानों के हाथ में है।


