(विवेक रंजन श्रीवास्तव-विभूति फीचर्स)
भाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं होती। वह समाज का आईना भी होती है। मनुष्य के भीतर जितने भाव हैं, भाषा में उनके उतने ही रूप मिलते हैं। प्रेम है, तो प्रार्थना है। करुणा है, तो आँसू हैं। क्रोध है, तो कटु वचन भी हैं। इन्हीं कटु वचनों का ही एक रूप है गाली।
पहली दृष्टि में गाली असभ्यता लगती है पर संस्कृति का अध्ययन हमें बताता है कि किसी भी सामाजिक व्यवहार को केवल नैतिक चश्मे से नहीं देखा जा सकता। उसके पीछे इतिहास भी होता है,समाजशास्त्र भी, मनोविज्ञान भी और लोकजीवन भी।
भारतीय संस्कृति में गालियाँ उतनी ही पुरानी हैं, जितनी मानवीय प्रतिक्रियाएँ। अंतर केवल इतना है कि समय के साथ उनका रूप बदलता रहा है।
संस्कृत साहित्य में “आक्षेप”, “निन्दा”, “अपशब्द”, “तिरस्कार” और “कटुवचन” जैसे अनेक शब्द मिलते हैं। पर वहाँ भाषा का संयम दिखाई देता है। महाभारत में दुर्योधन, शकुनि और कर्ण के संवाद हों या रामायण में रावण और अंगद का वाक्-युद्ध, कठोर शब्द हैं, पर भाषा की मर्यादा भी है। विरोध है, पर शब्दों का अनुशासन भी है।
लोकभाषाओं में पहुँचते-पहुँचते भाषा अधिक खुल जाती है। गाँव का चौपाल हो, खेत की मेड़ हो, अखाड़ा हो या हाट-बाज़ार, हर जगह संवाद का अपना रंग है। कहीं गाली अपमान है। कहीं अपनापन। कहीं हास्य। कहीं चुनौती।
उत्तर भारत के अनेक अंचलों में मित्र एक-दूसरे को कठोर संबोधन कहकर भी हँसते रहते हैं। वहाँ शब्द नहीं, स्वर महत्त्वपूर्ण होता है। वही शब्द यदि क्रोध में कहा जाए, तो संबंध टूट सकता है। यही भाषा का सामाजिक विज्ञान है।
भारतीय लोकगीतों में गालियों का एक अलग संसार है। विवाह संस्कार इसका सबसे रोचक उदाहरण है। दूल्हे के स्वागत में स्त्रियाँ हँसते-हँसाते गीत गाती हैं। उनमें व्यंग्य है,छेड़छाड़ है, हल्की गालियाँ भी हैं पर उद्देश्य अपमान नहीं होता,उद्देश्य होता है संकोच तोड़ना, नए रिश्तों में सहजता लाना,हँसी का वातावरण बनाना।
लोकसंस्कृति ने गाली को भी उत्सव का हिस्सा बना दिया। यही भारतीय जीवन-दृष्टि का कौशल है। वह तनाव को भी उत्सव में बदल देती है।
होली का पर्व इसका अप्रतिम उदाहरण है। फागों और रसिया गीतों में तीखी भाषा मिलती है। सामाजिक मर्यादाएँ कुछ समय के लिए ढीली पड़ जाती हैं। लोग मन का बोझ उतारते हैं। हँसते हैं,हँसाते हैं फिर सामान्य जीवन में लौट आते हैं। यह सामाजिक दबाव के नियंत्रित विसर्जन का सांस्कृतिक उपाय था।
भाषाविज्ञान की दृष्टि से गालियाँ समाज की मानसिक संरचना का दस्तावेज़ हैं। वे बताती हैं कि किसी समाज में सम्मान किसका है और अपमान किसका। दुर्भाग्य से भारतीय भाषाओं की बड़ी संख्या में गालियाँ स्त्रियों को लक्ष्य बनाती हैं। इससे पितृसत्तात्मक सोच का संकेत मिलता है। यही कारण है कि आज स्त्री-विमर्श इन गालियों की गंभीर समीक्षा करता है।
जाति, पेशा, शारीरिक अक्षमता और आर्थिक स्थिति पर आधारित गालियाँ भी भारतीय समाज के पुराने भेदभावों का प्रमाण हैं। आधुनिक लोकतांत्रिक समाज ऐसी भाषा को स्वीकार नहीं कर सकता। भाषा बदलती है, तो समाज भी बदलता है।
मनोविज्ञान कहता है कि तीव्र क्रोध या पीड़ा के क्षणों में मनुष्य के मुख से सहज रूप से कठोर शब्द निकल सकते हैं। इससे तनाव कुछ कम होता है। पर यदि यही व्यवहार आदत बन जाए, तो वह व्यक्तित्व का दोष बन जाता है। शब्द धीरे-धीरे संस्कार बन जाते हैं।
साहित्य ने गालियों को न तो पूरी तरह नकारा है और न उनका उत्सव मनाया है। साहित्य ने उन्हें जीवन के यथार्थ के रूप में देखा है।
कबीर की वाणी में तीखापन है। वे पाखंड पर चोट करते हैं। उनकी भाषा तलवार की तरह चलती है पर वह व्यक्तिगत अपमान नहीं, सामाजिक जागरण का माध्यम बनती है।
प्रेमचंद ने गाँवों का यथार्थ लिखा। फणीश्वरनाथ रेणु ने आंचलिक जीवन का पूरा रंग उकेरा। श्रीलाल शुक्ल ने व्यवस्था पर व्यंग्य किया। भीष्म साहनी, अमृतलाल नागर और अनेक कथाकारों ने पात्रों की भाषा को उसी रूप में रखा, जैसी वह जीवन में थी। उन्होंने गालियों का प्रयोग चरित्र निर्माण के लिए किया, मनोरंजन के लिए नहीं।
आज का डिजिटल युग भाषा को नई दिशा दे रहा है। सोशल मीडिया ने संवाद को तेज़ बनाया है। दुर्भाग्य से असहमति का स्थान अनेक बार गालियों ने ले लिया है। तर्क कम होते जा रहे हैं। कटुता बढ़ती जा रही है। यह भाषा का विकास नहीं, उसका अवमूल्यन है। अब सहनशीलता समाप्त प्राय हो गई है।
भारतीय संस्कृति हमें वाणी की शक्ति का स्मरण कराती है। उपनिषद कहते हैं कि वाणी तप भी है। भारतीय दर्शन में मधुर वचन को दान के समान माना गया है। “सत्यं ब्रूयात्, प्रियं ब्रूयात्” का आदर्श आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
इसका अर्थ यह नहीं कि समाज से गालियाँ कभी समाप्त हो जाएँगी। वे मानवीय स्वभाव के साथ किसी न किसी रूप में रहेंगी। प्रश्न उनका अस्तित्व नहीं है। प्रश्न उनका उद्देश्य है। यदि शब्द केवल अपमान के लिए हैं, तो वे संस्कृति को क्षति पहुँचाते हैं। यदि वे लोकपरंपरा में हास्य, अभिनय या सामाजिक ऊर्जा के नियंत्रित विसर्जन का माध्यम हैं, तो उनका मूल्यांकन अलग होगा।
भाषा की परिपक्वता इस बात में नहीं कि हम कितनी कठोर गालियाँ जानते हैं। उसकी परिपक्वता इस बात में है कि हम कठिन से कठिन परिस्थिति में भी कितने संयमित शब्द चुन पाते हैं।
अंततः गाली भी भाषा का एक सामाजिक दस्तावेज़ है। वह हमें केवल दूसरों के बारे में नहीं बताती। वह हमारे भीतर छिपे संस्कारों का भी परिचय देती है। इसलिए गालियों का अध्ययन केवल शब्दों का अध्ययन नहीं, भारतीय समाज की मानसिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक यात्रा को समझने का एक रोचक माध्यम है। (विभूति फीचर्स)


