प्रभात यादव
मोबाइल फोन आज बच्चों की पढ़ाई, मनोरंजन और जानकारी का प्रमुख माध्यम बन चुका है। लेकिन जिस डिजिटल दुनिया को हम ज्ञान और अवसरों का मंच मानते हैं, उसी दुनिया में कुछ ऐसे विज्ञापन भी दिखाई दे रहे हैं जो बच्चों की मानसिक सुरक्षा और नैतिक विकास के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं।
इंस्टाग्राम जैसे लोकप्रिय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कई बार ऐसे विज्ञापन दिखाई देते हैं जिनमें यौन संकेतक भाषा, आपत्तिजनक तस्वीरें या भ्रामक दावे होते हैं। यदि ये विज्ञापन कम उम्र के बच्चों या किशोरों तक पहुंचते हैं, तो उनका मानसिक और भावनात्मक प्रभाव पड़ सकता है। बच्चे अक्सर यह समझ नहीं पाते कि कौन-सी सामग्री विश्वसनीय है और कौन-सी केवल क्लिक या डाउनलोड करवाने के लिए दिखाई जा रही है।
विशेष चिंता तब बढ़ जाती है जब ऐसे विज्ञापनों में “एडल्ट वीडियो”, “रेप वीडियो” या अन्य आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल कर लोगों का ध्यान आकर्षित किया जाता है। ऐसे विज्ञापन न केवल सामाजिक मर्यादाओं के विरुद्ध हैं, बल्कि बच्चों को अनुचित और संभावित रूप से हानिकारक सामग्री की ओर भी आकर्षित कर सकते हैं।
हालांकि सोशल मीडिया कंपनियां दावा करती हैं कि उनके पास आयु-आधारित सुरक्षा, कंटेंट मॉडरेशन और विज्ञापन समीक्षा की व्यवस्था है, लेकिन समय-समय पर ऐसे मामलों का सामने आना यह संकेत देता है कि इन प्रणालियों को और अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता है।
इस समस्या का समाधान केवल सरकार या सोशल मीडिया कंपनियों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। अभिभावकों को बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर संतुलित निगरानी रखनी चाहिए, पेरेंटल कण्ट्रोलस का उपयोग करना चाहिए और बच्चों को डिजिटल साक्षरता सिखानी चाहिए ताकि वे अनुचित सामग्री की पहचान कर सकें और उससे बच सकें।
सरकार और नियामक संस्थाओं की भी जिम्मेदारी है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर प्रसारित होने वाले विज्ञापनों की निगरानी मजबूत करें। यदि कोई विज्ञापन कानून, बाल संरक्षण मानकों या विज्ञापन आचार संहिता का उल्लंघन करता है, तो उसके खिलाफ त्वरित कार्रवाई होनी चाहिए।
डिजिटल युग में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन बच्चों की सुरक्षा उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, सरकार, अभिभावक और समाज—सभी की साझा जिम्मेदारी है कि इंटरनेट बच्चों के लिए सुरक्षित, स्वस्थ और सकारात्मक वातावरण बना रहे।


