यूथ इंडिया संवाददाता
गाजियाबाद। सॉफ्टवेयर इंजीनियर विकास कटियार ने स्वास्थ्य प्रबंधन के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए एक अनोखा अभियान शुरू किया है। विकास कटियार, जो कानपुर नगर की तहसील बिल्हौर के गांव पिहानी में जन्मे हैं, नोएडा स्थित एक प्रमुख सॉफ्टवेयर कंपनी में कार्यरत हैं। वे गाजियाबाद की गौर सिटी सोसाइटी में रहते हैं और अपनी व्यस्त जिंदगी के बावजूद खेलों के महत्व को बनाए रखते हुए लोगों को फिटनेस के प्रति जागरूक कर रहे हैं।
इस अभियान के तहत, श्री कटियार ने खेलों के माध्यम से स्वस्थ जीवन शैली को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न कार्यक्रम और गतिविधियाँ आयोजित की हैं। उन्होंने हाल ही में एक फिटनेस अभियान की शुरुआत की, जिसमें स्थानीय समुदाय को खेलों के महत्व के बारे में जानकारी दी गई और विभिन्न खेल गतिविधियों का आयोजन किया गया।
प्रस्तावित कार्यक्रम: 10 खेल कार्यक्रम, 20 फिटनेस वर्कशॉप
संबद्ध लोग: 500+ स्थानीय निवासी, 100+ स्कूल और कॉलेज के विद्यार्थी
लक्ष्य: फिटनेस के प्रति जागरूकता में 30′ वृद्धि
इस पहल का उद्देश्य न केवल खेलों के माध्यम से शारीरिक फिटनेस को बढ़ावा देना है, बल्कि लोगों को उनके स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना भी है। श्री कटियार का मानना है कि खेलों का महत्व सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
उनके इस अभियान को लेकर स्थानीय समुदाय में उत्साह देखने को मिल रहा है, और उम्मीद जताई जा रही है कि इससे व्यापक स्तर पर स्वास्थ्य जागरूकता में सुधार होगा।
स्वास्थ्य प्रबंधन के प्रति जागरूकता लाने के लिए खेलों का सहारा: सॉफ्टवेयर इंजीनियर विकास कटियार का नया अभियान
‘दिल चाहता है’ का जादू 23 साल बाद भी बरकरार
‘दिल चाहता है’ (Dil Chahta Hai) अपनी 23वीं एनिवर्सरी का जश्न मना रहा है और हम उस फिल्म को याद करते हैं जिसने इंडियन सिनेमा को हमेशा के लिए बदल दिया है। फरहान अख्तर के डायरेक्शन में बनी और एक्सेल एंटरटेनमेंट के बैनर तले प्रोड्यूस हुई, ये क्लासिक फिल्म दोस्ती और मॉडर्न सिटी लाइफ का सार एक अलग तारीख से दिखती है।
इस माइलस्टोन का जश्न मनाने के लिए एक्सेल एंटरटेनमेंट के ऑफिशियल सोशल मीडिया अकाउंट पर एक गर्मजोशी भरा पोस्ट शेयर किया गया है, जिसमें दर्शकों पर फिल्म के कभी ना मिटने वाले प्रभाव का सम्मान किया गया है।
2001 में रिलीज़ हुई ‘दिल चाहता है’ (Dil Chahta Hai) में आमिर खान, सैफ अली खान, अक्षय खन्ना और प्रीति जिंटा जैसी टैलेंटेड कास्ट थी। इस फ़िल्म ने हमें आकाश, समीर और सिद्धार्थ से मिलवाया, जो 2000 के दशक की शुरुआत के ऐसे किरदार थे, जो उस समय के युवाओं की उम्मीदों, सपनों और संघर्षों को फिल्म के जरिए दर्शा रहे थे।
अपनी नई कहानी, स्मार्ट डायलॉग्स और शंकर-एहसान-लॉय के यादगार म्यूजिक के साथ, यह फिल्म जल्द ही एक कल्चरल हिट बन गई, जिसने पूरे देश के लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया। प्यार, दोस्ती और खुद की खोज का इसका चित्रण आज भी, 23 साल बाद भी रिलेट करने वाला है, जो इसे एक टाइमलेस क्लासिक बनाता है।
इस फ़िल्म के ज़रिए एक्सेल एंटरटेनमेंट ने बॉलीवुड में कहानियों को कहने के तरीके को बदल दिया और भविष्य की फ़िल्मों के लिए एक हाई स्टैंडर्ड सेट किया है। पिछले 20 सालों में एक्सेल ने कई फ़िल्में बनाई हैं, जिन्हें क्रिटिक्स और ऑडियंसेज दोनों ने बेहद पसंद किया है। दिल को छू लेने वाली ‘ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा’ से लेकर जॉनर-डिफाइनिंग ‘गली बॉय’ तक, एक्सेल एंटरटेनमेंट ने लगातार इंडियन सिनेमा की सीमाओं को आगे बढ़ाया है। उनकी दूसरी फ़िल्में, जैसे ‘डॉन 2’ और ‘गोल्ड’ ने भी बॉक्स ऑफ़िस पर काफ़ी धूम मचाई है और ग्लोबल लेवल पर 100 करोड़ से ज़्यादा की कमाई की है।
जैसा कि हम ‘दिल चाहता है’ (Dil Chahta Hai) के 23 साल पूरे होने का जश्न मना रहे हैं, एक ऐसी यात्रा जो यादगार कहानियों, कभी ना भूलने वाले किरदारों और बेहतरीन फिल्म मेकिंग के लिए मजबूत कमिटमेंट से भरी हुई है।
स्वदेश के लिए सबसे कम उम्र में फांसी पर चढ़े खुदीराम बोस
‘एक बार विदाई दे मां, घूरे आसी..हंसी हंसी पोरबो फांसी देखबे भारतवासी! (ओ मां मुझे एक बार विदा दो तनिक घूमकर आता हूं…हंसता-हंसता फांसी के फंदे में चढ़ जाऊंगा और सारे भारतवासी देखेंगे)। महान क्रांतिकारी खुदीराम बोस की ये पंक्तियां जहां एक मार्मिक संवेदना उत्पन्न करती हैं तो दूसरी ब्रितानी सरकार के विरुद्ध स्वदेश के लिए सर्वस्व अर्पित करने की प्रेरणा देती हैं। सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के उपरांत महारथी खुदीराम बोस (Khudiram Bose) ही प्रथम क्रांतिकारी थे जो सबसे कम उम्र (18 वर्ष 8 माह 8 दिन )में फांसी पर चढ़ा दिये गये थे। ये वही बंगाल है जहां से राष्ट्रवाद की भावना प्रबल हुई थी, परंतु वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बंगाल बिखर रहा है, अपने ही अपनो को मिटा रहे हैं, यह देख कर खुदीराम बोस (Khudiram Bose) की आत्मा भी रोती होगी। इसलिए स्वाधीनता के अमृतकाल में महान क्रांतिकारी खुदीराम बोस के बलिदान की गाथा जन- जन तक पहुंचना ही चाहिए।
वे लोग कोई और ही थे। कौन थे? ये दीवाने, कौन थे? वे पागल, जिन्हें केवल एक प्रेम, देश प्रेम था। जिन्हें केवल एक धुन राष्ट्र धुन थी और जिनका केवल एक लक्ष्य था भारत मां की स्वतंत्रता! फिर चाहे स्वयं का शरीर बेड़ियों में जकड़ कर कोड़ों से क्यों ने उधेड़ दिया, जाए लेकिन तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहें न रहें गाते हुए फांसी पर झूल जाने वाले कई नामों को हम जानते भी नहीं। जिन्हें जानते हैं उन्हें भी प्रकारांतर से कभी आतंकवादी, लुटेरा डकैत और फासिस्ट कहा गया। इसी कड़ी में खुदीराम बोस (Khudiram Bose) भी आते हैं। 18 साल 8 माह 8 दिन की बांकी उम्र में फांसी का फंदा चूम लिया। इस उम्र में जब आज के अधिकतर नौजवान यारी-दोस्ती और मौज-मस्ती को ही जीवन का ध्येय और पर्याय समझ रहे होते हैं तब एक समय में इसी उम्र का नौजवान हाथ में गीता लेकर भारत माता की जय बोलते हुए फांसी के फंदे पर झूल गया। इस महारथी का नाम था खुदीराम बोस। पं. बंगाल के मिदनापुर जिले में बाबू त्रैलोक्यनाथ बोस धर्मात्मा कायस्थ थे। उनकी पत्नी लक्ष्मीप्रिया देवी भी एक हाथ से धैर्य-धर्म को थामें रखतीं और दूसरे हाथ में स्वदेश प्रेम की डोर लिए चलतीं। यह शुभ संस्कारों का ही प्रभाव था कि 3 दिसम्बर 1889 के दिन जब बोस दंपति के घर बालक ने जन्म लिया तो उसका नाम रखा खुदीराम अर्थात शुभ लक्षणों वाला यह राम खुद्दारी की परिभाषा सार्थक करने वाला था। तो फिर वह अंग्रेजों की दासता को कैसे स्वीकार कर लेता।
जैसे उजियारे पक्ष का चंद्रमा एक-एक रोज करके बढ़ता रहता है, बालक भी एक-एक वर्ष बढ़ता गया और हर उम्र के साथ उसमें देश को स्वतंत्र करा लेने की जिजीविषा बढ़ती गई। यह जिजीविषा एक दिन इतनी बढ़ी की नवीं कक्षा के छात्र खुदीराम बोस ने पढ़ाई छोड़ दी और स्वदेशी आंदोलन में कूद पड़े। परंतु यह केवल प्रारंभ था, बालक बोस को अभी लंबी दूरी तय करनी थी। स्वदेशी आंदोलन जारी तो था, लेकिन बोस के विचारों में केवल इतना होना ही पर्याप्त नहीं था। यह आवश्यक था कि समग्र जनता में चेतना आए और वह घरों से निकल पड़ें और बरतानिया शासन को जड़ से उखाड़ फेकें। स्वदेशी आंदोलन में अनेक ऐसे ही क्रांतिकारियों का साथ बोस को मिला और मां के सपूतों का कारवां बढ़ चला। सन 1906 में अंग्रेज सिपाही को मुक्कामारने के साथ ही खुदीराम बोस में क्रांतिकारी बदलाव आया।
मिदनापुर में एक औद्योगिक तथा कृषि प्रदर्शनी लगी हुई थी। खुदीराम (Khudiram Bose) ने इस प्रदर्शनी में आए लोगों को सोनार बांग्ला जिसे कि सत्येंद्रनाथ ने लिखा था। यह बेहद ज्वलंत विषय पर लिखा गया पत्रक था। एक पुलिस वाले ने उन्हें यह पत्र बांटते देखा तो पकड़ने दौड़ा, तेजतर्रार खुदीराम बोस ने सिपाही के मुंह पर घूंसा मार दिया और पत्रक को लेकर वहां से आसानी से भाग निकले। प्रकरण पर अभियोग चलाया गया, लेकिन गवाह न मिलने पर बोस निर्दोष छूट गए। सन् 1905 में अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन कर दिया गया। लॉर्ड कर्जन इसे अंजाम देने वाला था, जिसके विरोध में लोग सड़कों पर उतर आए थे। इन क्रांतिकारियों के दमन के लिए मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड को भेजा गया। किंग्सफोर्ड के दमनकारी तरीके बेहद क्रूर थे। उसने कई निर्दोषों को बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया। अंग्रेजी सरकार ने इस दरिंदे को बदले में सम्मान देकर मुजफ्फरपुर में सत्र न्यायाधीश बना दिया।
अत: युगांतर समिति ने बदले की योजना बनाई। बंगाल में क्रांतिकारियों की एक समिति युगांतर इस पूरी दमनकारी नीति से रोष में थी। बोस पहले ही इससे जुड़ चुके थे। एक गुप्त बैठक में तय हुआ कि किंग्सफोर्ड को उसके किए की सजा तो मिलनी ही चाहिये और तब दो नाम क्रमशः प्रफुल्लकुमार चाकी और खुदीराम बोस के तय हुए। खुदीराम को एक बम और पिस्तौल दी गई। प्रफुल्लकुमार को भी एक पिस्तौल दी गई। अब दोनों को अपना लक्ष्य साधने के लिए रवाना किया गया। किंग्सफोर्ड को भी अपने विरुद्ध हो रही इस योजना की जानकारी कहीं से मिल गई थी। दोनों ही क्रांतिकारी बेहद सतर्क थे,सबसे पहले दोनों ने किंग्स फोर्ड के बंगले की निगरानी की।
बघ्घी और घोड़े की पहचान की, खुदीराम तो किंग्स फोर्ड के कार्यालय तक भी हो आए थे। अगले दिन योजना के अनुसार दोनों अपनी-अपनी जगह तैनात हो गए। 30 अप्रैल 1908. को दोनों क्रांतिकारी किंग्सफोर्ड के बंगले के बाहर जमे हुए थे। रात साढ़े आठ बजे क्लब से एक बघ्घी निकली, खुदीराम बोस उसके पीछे भागने लगे। रास्ते में अंधेरा था, उन्होंने निशाना साधकर आगे जा रही बघ्घी पर बम फेंक दिया। यह सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद हिंदुस्तान में किया गया पहले बम विस्फोट के तौर पर देखा जा सकता है।
इतिहासकारों के अनुसार , इसकी आवाज तब तीन मील दूर तक सुनी गई और फिर कुछ दिनों बाद तो लंदन तक में सुनी गई। लेकिन सौभाग्य से उस दिन किंग्सफोर्ड बच गया क्योंकि उसकी बघ्घी क्लब से कुछ देर बाद निकली थी। खुदीराम तथा प्रफुल्लकुमार दोनों ही रातों-रात नंगे पैर 24 मील भागते चले गए और वैनी रेलवे स्टेशन जाकर रुके। अंग्रेज अफसर भी चुप नहीं बैठे थे। वैनी स्टेशन पर उन्हें घेर लिया गया। प्रफुल्लकुमार चाकी ने युगांतर का कोई भेद न खुल जाए इसलिए खुद को गोली मारकर वीरगति का मुख चूमा। इधर खुदीराम बोस गिरफ्तार कर लिए गए । कई बार अंग्रेजों को छकाने वाले खुदीराम को अब अंग्रेज नहीं छोड़ने वाले थे, इसलिए 11 अगस्त 1908 को उन्हें फांसी दे दी गई। खुदीराम बोस की वीरगति का असर भारत के नौजवानों पर ऐसा पड़ा कि बोस क्रांतिकारी वीरता के पर्याय बन गए। उनका नाम लेकर नौजवान स्वाधीनता की कसमें खाने लगे और बंगाल में लड़के खुदीराम नाम लिखी किनारी की धोती पहनने लगे थे। यह धोती स्वदेशी और स्वतंत्रता आंदोलन का पर्याय बन गई।
आज जो हम तिरंगा लहरा रहे हैं और उसकी छांव के नीचे खड़े हैं, इसके भगवा रंग में वीर अमर बलिदानी खुदीराम बोस का लहू शामिल है। सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में सबसे कम 13 वर्ष की उम्र में महान् वीरांगना मैना बाई का बलिदान हुआ था। यद्यपि 1872 में कूका आंदोलन में 68 सेनानी शहीद हुए थे जिसमें 13 वर्ष का बालक जिसका 50 वां नं वह लुधियाना के डिप्टी कमिश्नर कावन की दाढ़ी पकड़ ली थी और तब तक नहीं छोड़ी जब तक उसके हाथ नहीं काट दिए गए फिर उसका बलिदान हुआ, यह उस समय तक का सबसे कम उम्र में बलिदान था परंतु दुर्भाग्य है कि बड़े नामों के आगे इस बालक का नाम ज्ञात नहीं है जो शोध का विषय है तथापि अब 12 वर्षीय महारथी बाजी राऊत का नाम सबसे कम उम्र में बलिदान देने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में दर्ज है (सन् 1938)। उपरोक्तानुसार अज्ञात महारथी बालक को तोप के मुंह बांधकर उड़ाया गया था और महारथी बाजी राऊत गोलियों से भून दिया गया था। अतः फांसी की सजा के दृष्टिकोण से, महारथी खुदीराम बोस सबसे कम उम्र के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे जिन्हें फांसी दी गई थी।
वीरांगना फूलन देवी की जयंती पर आयोजित सभा
यूथ इंडिया संवाददाता
फर्रुखाबाद। वीरांगना फूलन देवी की जयंती के अवसर पर निषाद पार्टी जिला अध्यक्ष अनिल कश्यप ने बढ़पुर स्थित कार्यालय पर एक भव्य सभा का आयोजन किया। इस मौके पर कश्यप समाज के वरिष्ठ समाजसेवियों और अन्य साथियों ने फूलन देवी जी के चित्र पर पुष्प अर्पित कर दीप प्रज्वलित किया और केक काटा।
सभा की अध्यक्षता वरिष्ठ समाजसेवी ओम बाबू बाथम ने की, जबकि कार्यक्रम का संचालन अजीत बाथम ने किया। वरिष्ठ समाजसेवी राजकपूर बाथम ने फूलन देवी जी के जीवन पर प्रकाश डालते हुए बताया कि उनका जन्म 10 अगस्त 1963 को उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के एक गरीब मल्लाह परिवार में हुआ था। विवाह के बाद उनके पति द्वारा किए गए अत्याचारों से परेशान होकर उन्होंने ससुराल में रहने का संकल्प लिया और चंबल का रास्ता चुना। पुजारी सुरेंद्र कश्यप ने बताया कि फूलन देवी ने समाज और पुलिस द्वारा किए गए अत्याचारों का बदला लेने के लिए चंबल में बाबू गुर्जर के गैंग में शामिल हो गईं। जिला अध्यक्ष अनिल कश्यप ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि फूलन देवी जी ने 7 महीनों में ही अपने साथ हुए अन्याय का बदला लिया, जिससे उनकी प्रसिद्धि देश और विदेश में फैल गई। कुलदीप कश्यप एडवोकेट ने बताया कि 13 फरवरी 1983 को फूलन देवी ने मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के सामने आत्मसमर्पण किया और 11 वर्षों तक जेल में बिताए। समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने उन्हें राजनीतिक संरक्षण दिया और 1996 में मिर्जापुर से सांसद चुना गया। 2001 में, मात्र 38 वर्ष की आयु में फूलन देवी की हत्या दिल्ली में सरकारी आवास के बाहर कर दी गई। मुनेश कश्यप ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि जीवन संघर्षपूर्ण होता है और शिक्षित बनकर ही समाज में ताकत हासिल की जा सकती है। विमल बाथम ने महर्षि कश्यप जी के बताए गए रास्ते पर चलने और भाईचारे की भावना बनाए रखने का संदेश दिया।
इस अवसर पर मुनेश बाथम, संदीप बाथम, सर्वेश बाथम, राय सिंह कश्यप, ओम बाबू बाथम, मौजी राम बाबा, जितेंद्र कनौजिया, ज्ञानेंद्र कश्यप, टिंकू कश्यप, अनुज कश्यप, रविंद्र कश्यप, विनोद कश्यप, सोमनाथ कश्यप, विजय कश्यप, कैलाश शंकर, महिपाल कश्यप, सुरेश कश्यप, अरविंद बाथम, अरविंद कश्यप, दुर्गेश कश्यप आदि लोग उपस्थित रहे।
अज्ञात वाहन की टक्कर से पैदल जा रहे युवक की मौत
अमृतपुर, फर्रुखाबाद । थाना राजेपुर क्षेत्र में स्थित गांव गांधी के सामने 25 वर्षीय युवक पैदल जा रहा था। तभी पीछे से आए अज्ञात वाहन ने टक्कर मार दी जिससे युवक गंभीर रूप से घायल हो गया। मौके पर ग्रामीणों की भीड़ लग गई ग्रामीणों के द्वारा पुलिस को सूचना दी गई। सूचना पाकर थाना अध्यक्ष योगेंद्र सिंह सोलंकी मौके पर पहुंचे। घायल युवक को 108 एंबुलेंस के द्वारा डॉ राम मनोहर लोहिया अस्पताल भिजवाया गया ड्यूटी पर तैनात डॉक्टर नवनीत कुमार ने युवक को मृत घोषित कर दिया गया।
थाना अध्यक्ष राजपुर योगेंद्र सोलंकी ने बताया कि युवक की शिनाख्त अभी नहीं हो पाई है अज्ञात वाहन मौके से भागने में सफल रहा। लेकिन उप निरीक्षक शिशुपाल के द्वारा मृतक के शव का पंचनामा भर पोस्टमार्टम के लिए भेजा जा रहा है तहरीर मिलने के बाद विधि कार्रवाई की जाएगी
जलभराव के चलते कच्चा मार्ग गड्ढों में तब्दील, स्थानीय लोगों ने की मार्ग निर्माण की मांग
यूथ इंडिया संवाददाता
शमशाबाद, फर्रुखाबाद। नगर के काजी टोला मोहल्ले से शेरवानी टोला तक जाने वाले कच्चे मार्ग की दयनीय स्थिति को लेकर स्थानीय निवासियों ने नगर पंचायत कार्यालय शमशाबाद के अधिशाषी अधिकारी को शिकायती पत्र सौंपा। जलभराव के कारण यह मार्ग गड्ढों में तब्दील हो चुका है, जिससे आए दिन दुर्घटनाएं हो रही हैं।
मोहल्ला काजी टोला के निवासियों, जिनमें जहीर खां, सुभाष चंद्र, अनिल कुमार, नरेश चंद्र, जितेंद्र सिंह, राहुल, भजनलाल, विजय सिंह, महेंद्र सिंह, आकाश और ताहिर खां शामिल हैं, ने अधिशाषी अधिकारी से इस मार्ग के निर्माण की मांग की। शिकायती पत्र में उन्होंने बताया कि कच्चा मार्ग जलभराव के कारण बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो चुका है, जिससे वाहन चालकों और स्कूली छात्राओं को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
स्थानीय निवासियों के अनुसार, इस कच्चे मार्ग से गुजरते समय कई बाइक सवार दुर्घटनाओं का शिकार हो चुके हैं। आए दिन हो रही इन दुर्घटनाओं से लोगों की जान खतरे में है। इससे पहले भी स्थानीय लोगों ने इस मार्ग के निर्माण की मांग की थी, लेकिन अब तक कोई ध्यान नहीं दिया गया है।
मोहल्ले के लोगों का कहना है कि यदि इस खस्ताहाल मार्ग का निर्माण कराया जाता है, तो स्थानीय निवासियों और स्कूली बच्चों को बड़ी राहत मिल सकती है। जनहित को ध्यान में रखते हुए एक बार फिर से नगर पंचायत कार्यालय शमशाबाद के अधिशाषी अधिकारी से इस मार्ग के शीघ्र निर्माण की अपील की गई है।






