33.8 C
Lucknow
Tuesday, July 14, 2026
Home Blog Page 27

KGMU के 22वें दीक्षांत समारोह में राजनाथ सिंह का संदेश, डॉक्टर की पहचान सिर्फ डिग्री नहीं, बल्कि मरीज के प्रति…

0

लखनऊ: यूपी की राजधानी लखनऊ (Lucknow) स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल विश्वविद्यालय (KGMU) के 22वें दीक्षांत समारोह में सोमवार को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह (Rajnath Singh) ने चिकित्सा पेशे को मानवता की सेवा का सर्वोच्च माध्यम बताते हुए युवा डॉक्टरों को संवेदनशीलता और मानवीय मूल्यों के साथ कार्य करने की सीख दी। उन्होंने कहा कि डॉक्टर की वास्तविक पहचान उसकी डिग्री से नहीं, बल्कि मरीज के प्रति उसके व्यवहार, करुणा और सेवा भावना से होती है।

राजनाथ सिंह ने कहा कि मरीज अस्पताल में केवल इलाज कराने नहीं, बल्कि भरोसा लेकर आता है। ऐसे में डॉक्टरों का कर्तव्य है कि वे अपने ज्ञान और कौशल के साथ संवेदनशीलता को भी समान महत्व दें। उन्होंने कहा कि कई बार डॉक्टर की मुस्कान, आत्मीयता और भरोसा दिलाने वाले शब्द मरीज के मानसिक संबल का कारण बनते हैं और उपचार को अधिक प्रभावी बनाते हैं।

उन्होंने कहा कि भारत चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है। जीन थेरेपी, सीएआर-टी सेल थेरेपी और आधुनिक चिकित्सा तकनीकों के जरिए देश वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत पहचान बना रहा है। ऐसे समय में नए डॉक्टरों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वे आधुनिक तकनीक के साथ मानवीय मूल्यों को भी अपनाएं।

दीक्षांत समारोह में उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने 54 मेधावी छात्र-छात्राओं को स्वर्ण पदक और 1708 विद्यार्थियों को डिग्रियां प्रदान कीं। उन्होंने कहा कि चिकित्सा केवल रोजगार का माध्यम नहीं, बल्कि समाज सेवा का सबसे पवित्र दायित्व है। उन्होंने युवा डॉक्टरों से मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने में योगदान देने का आह्वान किया।

समारोह में केंद्रीय राज्य मंत्री मयंकेश्वर शरण सिंह, उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक, विश्वविद्यालय के वरिष्ठ अधिकारी, शिक्षक और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। ब्रजेश पाठक ने कहा कि केजीएमयू आज देश के अग्रणी चिकित्सा संस्थानों में शामिल है और यहां से निकलने वाले डॉक्टरों से समाज को बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की बड़ी उम्मीदें हैं।

स्वास्थ्य सेवाओं के लिए नई हेल्पलाइन शुरू, अब एक कॉल पर दर्ज होगी शिकायत

0

– सीएमओ कार्यालय ने जारी किया समर्पित नंबर

फर्रुखाबाद। जनपदवासियों को स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी समस्याओं का त्वरित समाधान उपलब्ध कराने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने जनसुनवाई व्यवस्था को और मजबूत बनाया है। मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. आनंद उपाध्याय के निर्देश पर मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय में सीयूजी नंबर के अतिरिक्त 9473720195 को समर्पित हेल्पलाइन नंबर के रूप में शुरू किया गया है। इस नंबर पर नागरिक कार्यालय समय में अपनी शिकायतें, सुझाव और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी समस्याएं सीधे दर्ज करा सकेंगे।

मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. आनंद उपाध्याय ने बताया कि विभाग का उद्देश्य प्रत्येक नागरिक तक गुणवत्तापूर्ण, पारदर्शी और जवाबदेह स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना है। इसी सोच के तहत शिकायत निस्तारण प्रणाली को अधिक प्रभावी और जनहितैषी बनाया गया है। हेल्पलाइन पर प्राप्त प्रत्येक शिकायत का विधिवत संज्ञान लेकर संबंधित अधिकारी को भेजा जाएगा तथा निर्धारित समय सीमा में उसका गुणवत्तापूर्ण निस्तारण सुनिश्चित किया जाएगा।

जननी सुरक्षा योजना में फर्रुखाबाद का शानदार प्रदर्शन, मुख्यमंत्री डैशबोर्ड पर प्रदेश में दूसरा स्थान

0

फर्रुखाबाद। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत संचालित जननी सुरक्षा योजना में फर्रुखाबाद ने उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल करते हुए मुख्यमंत्री डैशबोर्ड पर प्रदेश में दूसरा स्थान प्राप्त किया है। गर्भवती महिलाओं को समयबद्ध वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने, संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने और डिजिटल भुगतान व्यवस्था को प्रभावी बनाने के कारण जनपद ने यह सफलता हासिल की है।

मुख्यमंत्री डैशबोर्ड के अनुसार 1 अप्रैल से 30 जून 2026 के बीच जनपद के सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में 4,462 संस्थागत प्रसव हुए। इनमें से 3,682 लाभार्थियों को जननी सुरक्षा योजना के तहत भुगतान किया गया। इस प्रकार 82.52 प्रतिशत भुगतान सुनिश्चित करते हुए फर्रुखाबाद ने प्रदेश में दूसरा स्थान प्राप्त किया। उल्लेखनीय है कि पिछले माह जनपद का भुगतान प्रतिशत 19.36 प्रतिशत था और रैंक 63वीं थी। महज एक माह में 63वें स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचना स्वास्थ्य विभाग की बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

स्वास्थ्य विभाग के अनुसार इस सफलता के पीछे नियमित मॉनिटरिंग, लंबित प्रकरणों का त्वरित निस्तारण, डिजिटल भुगतान प्रणाली, बैंक खातों का सत्यापन और ब्लॉक स्तर पर सतत समीक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका रही। मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. आनंद उपाध्याय के निर्देशन तथा एसीएमओ (आरसीएच) एवं नोडल अधिकारी डॉ. सर्वेश यादव के मार्गदर्शन में सभी स्वास्थ्य इकाइयों को समयबद्ध भुगतान सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए।

ब्लॉकवार प्रदर्शन भी संतोषजनक रहा। कमालगंज में 831 संस्थागत प्रसव के सापेक्ष 680 महिलाओं को भुगतान किया गया। मोहम्मदाबाद में 484 में से 390, नवाबगंज में 327 में से 268 तथा शमसाबाद में भी 81 प्रतिशत से अधिक भुगतान दर्ज किया गया। कायमगंज, जहां सर्वाधिक 1,155 संस्थागत प्रसव हुए, वहां भी अधिकांश पात्र महिलाओं को योजना का लाभ दिया जा चुका है।

जननी सुरक्षा योजना के तहत पात्र गर्भवती महिलाओं को डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के माध्यम से वित्तीय सहायता सीधे उनके बैंक खातों में भेजी जाती है। इससे भुगतान प्रक्रिया पारदर्शी हुई है और बिचौलियों की भूमिका समाप्त हुई है। योजना का उद्देश्य संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देकर मातृ एवं नवजात शिशु मृत्यु दर में कमी लाना है।

सीएमओ डॉ. आनंद उपाध्याय ने कहा कि विभाग का लक्ष्य केवल रैंक हासिल करना नहीं, बल्कि प्रत्येक पात्र गर्भवती महिला तक समय पर योजना का लाभ पहुंचाना है। आने वाले समय में लंबित मामलों का शत-प्रतिशत निस्तारण, उच्च जोखिम वाली गर्भवती महिलाओं की पहचान, प्रसव पूर्व जांच, सुरक्षित संस्थागत प्रसव और प्रसवोत्तर देखभाल पर विशेष फोकस किया जाएगा।

एसीएमओ डॉ. सर्वेश यादव ने बताया कि आशा कार्यकर्ताओं, एएनएम, स्टाफ नर्सों और चिकित्सा अधिकारियों की टीम ने गांव-गांव पहुंचकर गर्भवती महिलाओं का पंजीकरण, स्वास्थ्य जांच, संस्थागत प्रसव और दस्तावेजों के सत्यापन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसके परिणामस्वरूप जनपद को यह उपलब्धि मिली।

कंपिल लूटकांड: छह दिन बाद भी पुलिस के हाथ खाली, पीड़ित परिवार में नाराजगी

0

फर्रुखाबाद। कंपिल थाना क्षेत्र में तमंचे के बल पर दंपति से नगदी, जेवर और मोबाइल लूट की घटना को छह दिन बीत चुके हैं, लेकिन पुलिस अभी तक घटना का खुलासा नहीं कर सकी है। इससे पीड़ित परिवार और क्षेत्रीय लोगों में नाराजगी बढ़ती जा रही है।
पीड़ित परिवार का आरोप है कि घटना के तुरंत बाद पुलिस को तहरीर दे दी गई थी, लेकिन मुकदमा चार दिन बाद दर्ज किया गया। उनका कहना है कि यदि समय पर कार्रवाई होती तो आरोपियों तक पहुंचना आसान हो सकता था।
पुलिस ने घटना के बाद सीसीटीवी फुटेज के आधार पर जांच शुरू करने की बात कही थी, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि अटैना घाट चौकी पर लगे सीसीटीवी कैमरे बिजली जाने पर बंद हो जाते हैं, क्योंकि वहां का इनवर्टर और बैटरी लंबे समय से खराब हैं। ऐसे में जांच प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
सूत्रों के अनुसार, पुलिस ने दो संदिग्ध किशोरों से पूछताछ भी की थी। हालांकि, इस संबंध में पुलिस की ओर से कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी गई है।
घटना के समय थाना प्रभारी नितिन चौधरी ने जल्द खुलासे का दावा किया था, लेकिन अब तक कोई सफलता नहीं मिल सकी है। यूथ इंडिया ने उनका पक्ष जानने का प्रयास किया, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका।
क्षेत्रीय लोगों ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से मामले की जांच में तेजी लाने और जल्द से जल्द घटना का खुलासा कर आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग की है।

वहशी दरिंदों को मिले त्वरित दण्ड

0

(डॉ. सुधाकर आशावादी-विभूति फीचर्स)

राजस्थान के श्रीगंगानगर में तेरह वर्षीय बालिका के साथ पांच दिन तक तक की गई दरिंदगी की घटना ने राजस्थान की कानून व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। देश भर में वहशी दरिंदों के इस प्रकार के किस्से प्रकाश में आते रहते हैं। यह गंभीर चिंता का विषय है। भले ही राजस्थान पुलिस द्वारा कुछ आरोपियों को गिरफ्तार करके दरिंदगी स्थलों को ध्वस्त कर दिया गया हो, लेकिन दरिंदगी करने वाले तत्वों में कानून का भय न होना यह दर्शाता है, कि समाज नैतिकता और महिला सम्मान जैसे मूल्यों के प्रति उदासीन होता जा रहा है।
ऐसा प्रतीत होता है कि यह घटना दिल्ली में 16 दिसंबर 2012 को 23 वर्षीय निर्भया के साथ किये गए सामूहिक बलात्कार एवं हत्या से भी अधिक जघन्य है। फिर भी इस सत्य को नकारा नहीं जा सकता, कि समाज में यौन स्वच्छंदता का खुलापन, सोशल मीडिया पर अश्लील कंटेंट से जुड़े वीडियो,देर सबेर बालिकाओं व युवतियों का घर से बाहर अकेले निकलना भी इस प्रकार की घटनाओं को अंजाम देने में सहायक सिद्ध होता है। कई बार ऐसी घटनाएँ प्रकाश में आई हैं, जब रिक्शा या टेम्पों चालक द्वारा सुनसान स्थल पर पर जघन्य अपराधों को अंजाम दिया जाता है। विचारणीय बिंदु यह भी है, कि नित्य न जाने इस प्रकार की कितनी घटनाएँ घटित होती हैं, जिनका पता ही नहीं चलता। कौन नहीं जानता कि 9 अगस्त 2024 को कोलकाता के आर जी कर मेडिकल कालेज व अस्पताल में रात्रि ड्यूटी पर तैनात 31 वर्षीय ट्रेनी डॉक्टर के साथ बलात्कार और हत्या की वीभत्स घटना घटित हुई थी।
नारी के विरुद्ध अपराधों के चलते कठोर कानून भी हैं, किन्तु उन कानूनों से भी अपराधियों में खौफ न होना चिंताजनक है। विडंबना है कि सभी सरकारें नारी सुरक्षा का ढिंढोरा तो पीटती हैं, मगर सफेदपोश अपराधियों के विरुद्ध कार्यवाही करने से परहेज भी करती हैं। कुछेक मसलों में राजनीतिक दल अपराधी और पीड़िता की जातीय स्थिति के आधार पर विरोध व समर्थन जैसे कृत्य से पीछे नहीं हटते। आवश्यकता यही है कि दरिंदगीपूर्ण घटनाओं पर आरोपी दरिंदों के विरुद्ध सजा का फैसला अल्पसमय में किया जाना चाहिए, ताकि दरिन्दे बेख़ौफ़ होकर दरिंदगी करने का दुस्साहस न कर सक्रें। (विभूति फीचर्स)

श्री चैतन्य महाप्रभु और जगन्नाथजी की रथयात्रा

0

(अंजनी सक्सेना-विनायक फीचर्स)

पिछले पांच सौ वर्षों से जिस एक नाम की गूंज बंगाल की गलियों से लेकर वृंदावन की कुंज गलियों तक और पुरी के समुद्र तट से लेकर विश्व भर में सुनाई दे रही है, वह है “हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे, हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे”। इस महामंत्र और हरिबोल संकीर्तन को घर-घर तक पहुंचाने वाले संत थे श्री गौरांग महाप्रभु, जिन्हें जगत श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में पूजता है।
वैष्णव परंपरा में अवतारी पुरुष और समाज को नई
दिशा देने वाले संत को महाप्रभु कहा जाता है। जैसे श्रीमद् वल्लभाचार्य जी महाराज वल्लभ महाप्रभु कहलाए, उसी तरह बंगाल के नदिया में जन्मे विश्वम्भर अपने दूध जैसे गौर वर्ण के कारण गोरा और गौरांग नाम से पुकारे गए। संन्यास लेने के बाद उनका नाम श्रीकृष्ण चैतन्य पड़ा, पर लोक में वे चैतन्य महाप्रभु बनकर अमर हो गए।
शरीर पर न जनेऊ का बोझ, न पंडिताई का अहंकार। सिर पर शिखा, गले में तुलसी की माला, हाथ में करताल और मुख पर कृष्ण नाम। ढोलक-मंजीरे की थाप पर वे नाचते, गाते और रोते थे। उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर ब्राह्मण भी चलता था और चांडाल भी। महाप्रभु ने पहली बार समाज को यह पाठ पढ़ाया कि ईश्वर के दरबार में कोई छोटा-बड़ा नहीं होता। उनका एक ही सूत्र था: जेई भजे सेई बड़ो, अभक्त हीन छार। कृष्ण भजने नाहि जाति-कुल विचार॥ अर्थात जो भगवान को भजता है वही श्रेष्ठ है, शेष सब व्यर्थ है।
इसी भाव को लेकर वे बंगाल से निकले। झारखंड के जंगलों को पार करते हुए वे श्रीजगन्नाथपुरी पहुंचे। वहां से फिर बंगाल लौटे और नाम संकीर्तन करते-करते वृंदावन की धूल छान आए। वृंदावन में उन्होंने लुप्त हो चुके कृष्ण के लीला स्थलों को फिर से जीवित किया। बंगाल का विष्णुपुर और बांकुड़ा उनके प्रभाव से द्वितीय वृंदावन बन गया। नदिया गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा।
पुरी में उन्होंने अगले बारह वर्ष बिताए। यहीं रहकर उन्होंने भगवान जगन्नाथ के महात्म्य को जन-जन तक पहुंचाया। उनके मुख से निकला वाक्य आज भी पुरी में गूंजता है: जगन्नाथ का भात, जगत पसारे हाथ। जगन्नाथ का भात, जगत उठाए हाथ। नंगी भूमि पर बैठकर खात, पूछत न जात-पात। यानी जगन्नाथ का प्रसाद पाने के लिए पूरी दुनिया हाथ फैलाती है और उसे पाने के लिए कोई जाति नहीं पूछी जाती।
पर महाप्रभु की इससे भी मर्मस्पर्शी लीला जुड़ी है पुरी की रथयात्रा से। आषाढ़ के दिन जब जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा रथ पर सवार होकर गुंडिचा मंदिर जाते हैं, तो महाप्रभु प्रेम में पागल हो जाते थे। वे रथ के आगे नाचते, संकीर्तन करते और आंसुओं से रथ की धूल भिगो देते। गौड़ीय परंपरा मानती है कि महाप्रभु स्वयं कृष्ण के अवतार थे, इसलिए जब वे नाचते तो रथ भी रुक जाता।
पुरी के वृद्ध आज भी एक कथा सुनाते हैं। एक बार महाप्रभु भावातिरेक में मूर्छित होकर गिर पड़े। उनका सारा शरीर पसीने से लथपथ था और मुख से बस “कृष्ण-कृष्ण” निकल रहा था। सेवकों ने उठाना चाहा पर वे नहीं उठे। उसी क्षण जगन्नाथ का विशाल रथ भी बीच बाजार में थम गया। हजारों लोगों ने जोर लगाया, पर रथ एक इंच भी नहीं हिला। जैसे ही महाप्रभु को होश आया और उन्होंने फिर कीर्तन छेड़ा, रथ अपने आप चल पड़ा। उस दिन सबने मान लिया कि भगवान भक्त के प्रेम के अधीन हैं।
इस यात्रा को और भव्य बनाने के लिए महाप्रभु ने संकीर्तन मंडली को सात भागों में बांट दिया। हर दल में मृदंग, झांझ और नर्तक थे। जब एक दल थकता तो दूसरा संभाल लेता। पूरा ग्रैंड रोड हरे कृष्ण के नाद से गूंजता और महाप्रभु एक दल से दूसरे दल में दौड़कर सबको भाव से भर देते।
महाप्रभु का यह आंदोलन केवल मंदिरों तक सीमित नहीं रहा। उस समय बंगाल में नवाब हुसैन शाह का राज था। नवद्वीप के काजी ने एक दिन फरमान जारी कर दिया कि अब कोई हरिनाम संकीर्तन नहीं करेगा। यह सुनकर महाप्रभु के अनुयायी डर गए, पर महाप्रभु स्वयं आगे आए। हजारों नर-नारियों के साथ वे रात में मशालें लेकर संकीर्तन करते हुए काजी के द्वार पहुंच गए। इतनी भीड़ और इतना प्रेम देखकर काजी कांप गया। उसने महाप्रभु के चरण पकड़ लिए और न सिर्फ क्षमा मांगी, बल्कि नवद्वीप में गोहत्या पर भी प्रतिबंध लगा दिया। कहा जाता है कि उसी काजी की कब्र आज भी नवद्वीप में ‘फकीर की दरगाह’ के नाम से पूजी जाती है। महाप्रभु से प्रभावित होकर सैकड़ों मुसलमान भी वैष्णव बन गए। उन्होंने मांस-मदिरा छोड़ दी। वृंदावन में एक पठान और एक मौलवी उनसे मिले और शिष्य बन गए। महाप्रभु ने मौलवी का नाम रामदास रख दिया।
उनकी कृपा से असम, ओडिशा, झारखंड और मणिपुर की वनवासी जातियों तक कृष्ण भक्ति पहुंची। उन्होंने जगह-जगह गौड़ीय मठ स्थापित किए। आज इस्कॉन पूरी दुनिया में जो संकीर्तन कर रहा है, उसकी जड़ में भी चैतन्य महाप्रभु ही हैं।
जीवन के अंतिम दिनों में एक दिन महाप्रभु सभी शिष्यों के साथ जगन्नाथ मंदिर के गर्भगृह में संकीर्तन करते हुए चले गए। घंटों तक अंदर से आवाज आती रही, फिर धीरे-धीरे शांत हो गई। जब पुजारियों ने द्वार खोला तो अंदर महाप्रभु का शरीर नहीं था। भक्त मानते हैं कि वे सशरीर भगवान जगन्नाथ के विग्रह में ही विलीन हो गए।
आज 500 साल बाद भी जब पुरी में रथ खींचा जाता है, तो लाखों लोग उसी भाव से रस्सी पकड़ते हैं जिस भाव से महाप्रभु ने पकड़ी थी। चैतन्य महाप्रभु ने हमें सिखाया कि भक्ति कोई कर्मकांड नहीं, प्रेम है। और जब प्रेम अपने चरम पर पहुंचता है, तो पत्थर का भगवान भी पिघल जाता है और रथ भी रुक जाता है। (विनायक फीचर्स)