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Friday, March 13, 2026
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भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष सरनाम सिंह गंगवार का निधन, शोक की लहर

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– राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय भूमिका के लिए जाने जाते थे, कार्यकर्ताओं ने दी श्रद्धांजलि
फर्रुखाबाद। जनपद में भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व जिलाध्यक्ष सरनाम सिंह गंगवार का निधन हो गया। उनके निधन की खबर से भाजपा कार्यकर्ताओं और क्षेत्र के लोगों में शोक की लहर दौड़ गई।
सरनाम सिंह गंगवार लंबे समय तक भारतीय जनता पार्टी से जुड़े रहे और संगठन को मजबूत करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने पार्टी के विस्तार और कार्यकर्ताओं को संगठित करने के लिए लगातार प्रयास किए।
वे अपने सरल स्वभाव, स्पष्ट विचार और संगठन के प्रति समर्पण के लिए जाने जाते थे। राजनीतिक जीवन के साथ-साथ वे सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय रहते थे और क्षेत्र के लोगों की समस्याओं के समाधान के लिए हमेशा तत्पर रहते थे।
उनके निधन की सूचना मिलते ही पार्टी के नेताओं, कार्यकर्ताओं और शुभचिंतकों ने गहरा दुख व्यक्त किया। कई जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके योगदान को याद किया।
भाजपा कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरनाम सिंह गंगवार का निधन पार्टी और समाज के लिए अपूरणीय क्षति है।

17 वर्ष की उम्र के बाद शरीर में बदलाव, नई ऊर्जा के साथ संयम भी जरूरी

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किशोरावस्था से युवावस्था की दहलीज पर शरीर, सोच और भावनाओं में आता है बड़ा परिवर्तन
यूथ इंडिया
17 वर्ष की उम्र जीवन का वह महत्वपूर्ण दौर होता है जब किशोरावस्था धीरे-धीरे युवावस्था में बदलने लगती है। इस समय शरीर के अंदर हार्मोनल परिवर्तन तेजी से होते हैं, जिससे शारीरिक बनावट, मानसिक सोच और भावनात्मक व्यवहार में बदलाव दिखाई देने लगते हैं। यह बदलाव पूरी तरह प्राकृतिक होते हैं, लेकिन यदि सही समझ और मार्गदर्शन न मिले तो कई बार युवा इन परिवर्तनों को लेकर भ्रमित हो जाते हैं या गलत रास्तों की ओर भटक सकते हैं। इसलिए इस उम्र में शरीर के बदलावों को समझना और संयम बनाए रखना बेहद जरूरी होता है।
17 वर्ष के बाद शरीर में कई प्रकार के हार्मोन सक्रिय हो जाते हैं, जिनमें प्रमुख रूप से टेस्टोस्टेरोन (लडक़ों में) और एस्ट्रोजन (लड़कियों में) शामिल हैं। इन हार्मोन के प्रभाव से शरीर का विकास तेजी से होता है। लडक़ों में इस समय कंधे चौड़े होने लगते हैं, मांसपेशियां मजबूत होती हैं, आवाज भारी होने लगती है और चेहरे तथा शरीर पर बालों की वृद्धि बढ़ जाती है। वहीं लड़कियों में शरीर का आकार विकसित होने लगता है और शारीरिक परिपक्वता बढ़ती है।
यह वह समय होता है जब शरीर अपनी पूर्ण संरचना की ओर बढ़ता है। इसलिए इस उम्र में सही खानपान और स्वस्थ जीवनशैली का बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है।
ऊर्जा और उत्साह में होती है वृद्धि
इस उम्र में युवाओं के शरीर में ऊर्जा का स्तर काफी अधिक होता है। खेलकूद, व्यायाम और शारीरिक गतिविधियों में रुचि बढ़ती है। यही कारण है कि कई युवा इस समय जिम, खेल या फिटनेस गतिविधियों की ओर आकर्षित होते हैं। यदि इस ऊर्जा का सही दिशा में उपयोग किया जाए तो यह युवाओं को शारीरिक रूप से मजबूत और मानसिक रूप से आत्मविश्वासी बना सकता है। लेकिन यदि यह ऊर्जा गलत आदतों या अनुशासनहीन जीवनशैली में खर्च हो जाए तो भविष्य में स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं।
भावनात्मक और मानसिक बदलाव भी होते हैं
17 वर्ष की उम्र के बाद केवल शरीर ही नहीं बल्कि मन और सोच में भी परिवर्तन आता है। इस समय युवाओं में स्वतंत्र सोच विकसित होने लगती है। वे अपने फैसले खुद लेने की कोशिश करते हैं और अपनी पहचान बनाने की इच्छा रखते हैं। इसके साथ ही आकर्षण, भावनात्मक लगाव और सामाजिक संबंधों के प्रति भी जागरूकता बढ़ती है। कई बार युवा इन भावनाओं को सही ढंग से समझ नहीं पाते, जिससे भ्रम या मानसिक तनाव भी हो सकता है।
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि इस उम्र में परिवार और शिक्षकों का मार्गदर्शन बहुत महत्वपूर्ण होता है ताकि युवा अपने भावनात्मक बदलावों को संतुलित तरीके से समझ सकें। आज का युवा सोशल मीडिया के प्रभाव से काफी प्रभावित है। इंस्टाग्राम, यूट्यूब और अन्य प्लेटफॉर्म पर फिटनेस मॉडल, बॉडी बिल्डर और ग्लैमरस जीवनशैली देखकर कई युवा उसी तरह दिखने की कोशिश करने लगते हैं।
लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि कई बार युवा जल्दी परिणाम पाने के लिए स्टेरॉयड, अनियंत्रित सप्लीमेंट या अत्यधिक जिम का सहारा ले लेते हैं, जो शरीर के लिए बेहद नुकसानदायक हो सकता है। इसलिए युवाओं को समझना चाहिए कि आकर्षक शरीर केवल मेहनत, संतुलित आहार और नियमित व्यायाम से ही बनता है।
गलत आदतों से दूर रहना जरूरी
इस उम्र में कई युवा गलत संगत के कारण धूम्रपान, शराब या अन्य नशे की आदतों में भी फंस जाते हैं। शुरुआत में यह केवल प्रयोग के रूप में होता है लेकिन धीरे-धीरे यह आदत बन सकती है। डॉक्टरों का कहना है कि कम उम्र में नशे की शुरुआत करने से शरीर और दिमाग दोनों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए युवाओं को इन आदतों से पूरी तरह दूर रहना चाहिए।
17 वर्ष के बाद शरीर को पर्याप्त पोषण की जरूरत होती है। यदि इस समय सही भोजन नहीं मिलता तो शरीर का विकास प्रभावित हो सकता है।
युवाओं को अपने भोजन में निम्न चीजों को शामिल करना चाहिए जैसे प्रोटीन युक्त भोजन (दाल, दूध, अंडा, सोयाबीन),हरी सब्जियां और फल,पर्याप्त पानी,अनाज और फाइबर युक्त भोजन इसके साथ ही जंक फूड, अत्यधिक कोल्ड ड्रिंक और तैलीय भोजन से दूरी बनाना भी जरूरी है।
खेलकूद और व्यायाम की भूमिका
विशेषज्ञों का कहना है कि इस उम्र में खेलकूद और व्यायाम शरीर के विकास के लिए बेहद जरूरी होते हैं। नियमित व्यायाम से मांसपेशियां मजबूत होती हैं, शरीर का संतुलन बना रहता है और मानसिक तनाव भी कम होता है। क्रिकेट, फुटबॉल, दौड़, योग और जिम जैसी गतिविधियां युवाओं को शारीरिक रूप से सक्रिय बनाए रखती हैं।
आत्मनियंत्रण और लक्ष्य जरूरी
17 वर्ष की उम्र जीवन का वह दौर है जहां व्यक्ति अपने भविष्य की दिशा तय करना शुरू करता है। यदि इस समय युवा अपने लक्ष्य तय कर लें और अनुशासन के साथ आगे बढ़ें तो वे जीवन में बड़ी सफलता हासिल कर सकते हैं। आत्मनियंत्रण, सकारात्मक सोच और मेहनत इस उम्र के सबसे बड़े साथी होते हैं। 17 वर्ष के बाद शरीर में होने वाले बदलाव पूरी तरह प्राकृतिक प्रक्रिया हैं। यह जीवन का वह चरण है जहां शरीर, मन और व्यक्तित्व का निर्माण होता है।
यदि युवा इस समय सही मार्गदर्शन, संतुलित जीवनशैली और सकारात्मक सोच अपनाएं तो यही उम्र उनके उज्ज्वल भविष्य की मजबूत नींव बन सकती है। इसलिए युवाओं को चाहिए कि वे शरीर के बदलावों से घबराने या बहकने के बजाय उन्हें समझें, स्वीकार करें और स्वस्थ जीवन की दिशा में आगे बढ़ें।

युवाओं में जल्दी स्खलन की समस्या, वैज्ञानिक कारण और प्रभावी समाधान

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यूथ इंडिया
किशोरावस्था के बाद युवाओं के शरीर में कई प्रकार के जैविक और हार्मोनल परिवर्तन होते हैं। इसी समय कुछ युवाओं को यौन स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं का सामना भी करना पड़ता है, जिनमें जल्दी स्खलन एक सामान्य समस्या मानी जाती है। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार यह स्थिति तब मानी जाती है जब व्यक्ति संभोग के दौरान अपेक्षित समय से पहले ही वीर्य स्खलित हो जाता है और उस पर नियंत्रण नहीं रख पाता।
विश्व स्तर पर किए गए कई वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार लगभग 20 से 30 प्रतिशत पुरुष अपने जीवन में कभी न कभी इस समस्या का अनुभव करते हैं। हालांकि यह कोई गंभीर बीमारी नहीं मानी जाती, लेकिन यदि लंबे समय तक बनी रहे तो यह मानसिक तनाव, आत्मविश्वास की कमी और संबंधों में असंतोष का कारण बन सकती है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह समस्या केवल शारीरिक कारणों से ही नहीं बल्कि मानसिक, न्यूरोलॉजिकल और हार्मोनल कारणों के संयुक्त प्रभाव से भी उत्पन्न हो सकती है।
मानव शरीर में यौन उत्तेजना और स्खलन की प्रक्रिया मस्तिष्क, नसों और हार्मोन के जटिल समन्वय से नियंत्रित होती है। मस्तिष्क के कई भाग, विशेष रूप से हाइपोथैलेमस और लिम्बिक सिस्टम, यौन उत्तेजना और भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करते हैं।
इसके अलावा सेरोटोनिन नामक न्यूरोट्रांसमीटर स्खलन की प्रक्रिया को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया है कि जिन व्यक्तियों में सेरोटोनिन का स्तर कम होता है, उनमें जल्दी स्खलन की संभावना अधिक हो सकती है। मस्तिष्क से आने वाले संकेत रीढ़ की हड्डी के माध्यम से जननांगों तक पहुंचते हैं और यही प्रक्रिया स्खलन के समय को नियंत्रित करती है। यदि इस तंत्र में असंतुलन हो जाए तो स्खलन पर नियंत्रण कम हो सकता है।
कई मेडिकल रिसर्च संस्थानों और यूरोलॉजी विशेषज्ञों के अध्ययन में जल्दी स्खलन के कई कारण बताए गए हैं। पहला कारण मनोवैज्ञानिक तनाव माना जाता है। तनाव, चिंता और प्रदर्शन को लेकर भय यौन प्रतिक्रिया प्रणाली को प्रभावित करते हैं। जब व्यक्ति मानसिक रूप से दबाव में होता है तो शरीर की प्रतिक्रिया तेजी से होती है और नियंत्रण कम हो जाता है।
दूसरा कारण न्यूरोकेमिकल असंतुलन है। जैसा कि पहले बताया गया, सेरोटोनिन जैसे न्यूरोट्रांसमीटर का असंतुलन स्खलन के समय को प्रभावित कर सकता है। तीसरा कारण नसों की अधिक संवेदनशीलता है। कुछ व्यक्तियों में जननांगों की नसें अत्यधिक संवेदनशील होती हैं, जिससे हल्की उत्तेजना में भी जल्दी प्रतिक्रिया हो सकती है। चौथा कारण हार्मोनल असंतुलन भी हो सकता है। थायरॉयड हार्मोन के असंतुलन और टेस्टोस्टेरोन स्तर में परिवर्तन का प्रभाव भी यौन स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।
पांचवां कारण गलत जीवनशैली है। धूम्रपान, शराब, नशीले पदार्थ, अत्यधिक जंक फूड और शारीरिक गतिविधि की कमी शरीर के रक्त संचार और तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करती है, जिससे यौन क्षमता भी प्रभावित हो सकती है।
आधुनिक जीवनशैली का प्रभाव
डिजिटल युग में युवाओं की जीवनशैली तेजी से बदल रही है। देर रात तक मोबाइल या इंटरनेट का उपयोग, अनियमित नींद, शारीरिक गतिविधि की कमी और अत्यधिक मानसिक तनाव शरीर के हार्मोनल संतुलन को प्रभावित करते हैं। कुछ शोधों में यह भी पाया गया है कि अत्यधिक अश्लील सामग्री देखने से मस्तिष्क की यौन प्रतिक्रिया प्रणाली पर प्रभाव पड़ सकता है। इससे वास्तविक परिस्थितियों में शरीर की प्रतिक्रिया अलग तरीके से हो सकती है। इसके अलावा अत्यधिक चिंता और आत्मविश्वास की कमी भी इस समस्या को बढ़ा सकती है।
शारीरिक और मानसिक प्रभाव
यदि जल्दी स्खलन की समस्या लंबे समय तक बनी रहती है तो यह व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डाल सकती है। कई युवाओं में आत्मविश्वास की कमी, चिंता और तनाव बढऩे लगता है। कुछ मामलों में यह समस्या रिश्तों में असंतोष और संवाद की कमी का कारण भी बन सकती है। इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या को छिपाने के बजाय वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझना और समाधान तलाशना अधिक उचित होता है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार जीवनशैली में सुधार इस समस्या को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
नियमित व्यायाम शरीर के रक्त संचार को बेहतर बनाता है और हार्मोन संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। योग और ध्यान मानसिक तनाव को कम करने में प्रभावी माने जाते हैं। कुछ चिकित्सकीय अध्ययनों में पेल्विक फ्लोर या केगल एक्सरसाइज को भी लाभदायक बताया गया है। ये व्यायाम पेल्विक मांसपेशियों को मजबूत करते हैं और नियंत्रण क्षमता को बेहतर बनाते हैं। संतुलित आहार भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्रोटीन, विटामिन और खनिजों से भरपूर भोजन शरीर की ऊर्जा और हार्मोन संतुलन को बनाए रखने में मदद करता है। इसके साथ ही पर्याप्त नींद और नियमित दिनचर्या भी शरीर के न्यूरोलॉजिकल और हार्मोनल तंत्र को स्वस्थ बनाए रखने के लिए आवश्यक मानी जाती है।
यदि यह समस्या लंबे समय तक बनी रहती है और व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य या संबंधों पर प्रभाव डालने लगती है, तो चिकित्सकीय सलाह लेना आवश्यक हो सकता है।
आधुनिक चिकित्सा में कई प्रकार की मनोवैज्ञानिक थेरेपी, व्यवहारिक तकनीक और दवाएं उपलब्ध हैं, जिनसे इस समस्या को नियंत्रित किया जा सकता है। हालांकि किसी भी प्रकार की दवा का उपयोग केवल योग्य चिकित्सक की सलाह से ही करना चाहिए।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो जल्दी स्खलन कोई असाधारण या दुर्लभ समस्या नहीं है। यह कई जैविक, मानसिक और जीवनशैली संबंधी कारणों के संयुक्त प्रभाव से उत्पन्न हो सकती है।
सही जानकारी, स्वस्थ जीवनशैली और मानसिक संतुलन बनाए रखने से अधिकांश मामलों में इस समस्या को नियंत्रित किया जा सकता है। इसलिए युवाओं को चाहिए कि वे इस विषय को लेकर भ्रम या शर्म के बजाय जागरूकता और वैज्ञानिक सोच अपनाएं।

सीधे गैस पर सेकी रोटी सेहत के लिए कितनी सुरक्षित?

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विशेषज्ञों ने दी सावधानी बरतने की सलाह
ज्यादा जली रोटी खाने से पेट की समस्या और हानिकारक तत्व बनने का खतरा
यूथ इंडिया
भारतीय रसोई में रोटी बनाते समय अक्सर लोग उसे तवे से उतारकर सीधे गैस की आंच पर फुलाते हैं। यह तरीका आम और सुविधाजनक माना जाता है, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि अगर रोटी ज्यादा देर तक गैस की तेज लौ पर रखी जाए और वह जल जाए तो इससे सेहत पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार जब रोटी या कोई भी खाद्य पदार्थ तेज आग में ज्यादा जल जाता है तो उसमें कार्बन और कुछ हानिकारक रासायनिक तत्व बनने लगते हैं। इनमें एक्रिलामाइड जैसे यौगिक भी शामिल हो सकते हैं, जिन्हें लंबे समय तक अधिक मात्रा में शरीर में जाने पर स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं माना जाता।
पेट से जुड़ी समस्याओं का खतरा
डॉक्टरों का कहना है कि जली हुई रोटी खाने से कई लोगों को पेट से जुड़ी परेशानियां हो सकती हैं। लगातार ऐसी रोटी खाने से गैस, एसिडिटी, पेट में जलन और अपच जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। खासकर जिन लोगों का पाचन तंत्र पहले से कमजोर है, उन्हें जली हुई रोटी खाने से बचना चाहिए।
पोषण भी हो सकता है कम
रोटी को जरूरत से ज्यादा तेज आंच पर रखने से उसमें मौजूद कुछ पोषक तत्व भी नष्ट हो सकते हैं। गेहूं में मौजूद फाइबर, विटामिन और खनिज तत्व ज्यादा जलने की स्थिति में कम हो सकते हैं, जिससे भोजन का पोषण स्तर घट जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि रोटी को पहले तवे पर ठीक तरह से सेकना चाहिए। अगर रोटी को फुलाने के लिए गैस की आंच पर रखना हो तो उसे कुछ सेकंड के लिए ही रखें और इस बात का ध्यान रखें कि वह ज्यादा काली या जली हुई न हो।
रोटी को पहले मध्यम आंच पर तवे पर अच्छी तरह सेकें
जरूरत हो तो हल्का फुलाने के लिए कुछ सेकंड गैस पर रखें, ज्यादा जली या काली रोटी खाने से बचें। विशेषज्ञों का कहना है कि संतुलित और सही तरीके से बनाया गया भोजन ही शरीर को पूरा पोषण देता है। इसलिए रसोई में छोटी-छोटी सावधानियां अपनाकर स्वास्थ्य से जुड़ी कई समस्याओं से बचा जा सकता है। यूथ इंडिया हेल्थ अलर्ट: जली हुई चीजें खाने से बचें और भोजन बनाने के सही तरीके अपनाएं, ताकि स्वाद के साथ सेहत भी सुरक्षित रहे।

पानी है जीवन की सबसे बड़ी दवा

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पर्याप्त पानी पीना शरीर को रखता है स्वस्थ और ऊर्जावान
यूथ इंडिया
मानव जीवन में पानी का महत्व अत्यंत महत्वपूर्ण है। वैज्ञानिकों के अनुसार मानव शरीर का लगभग 60 से 70 प्रतिशत हिस्सा पानी से बना होता है, इसलिए शरीर को स्वस्थ रखने के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी पीना बेहद जरूरी है। पानी केवल प्यास बुझाने का साधन ही नहीं, बल्कि शरीर को अंदर से स्वस्थ और संतुलित रखने का एक प्राकृतिक माध्यम भी है।
आज की व्यस्त जीवनशैली में बहुत से लोग दिनभर काम में व्यस्त रहते हैं और पर्याप्त पानी पीना भूल जाते हैं। लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह आदत धीरे-धीरे शरीर पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है। शरीर के लिए क्यों जरूरी है पानी
पानी शरीर के कई महत्वपूर्ण कार्यों को संतुलित बनाए रखने में मदद करता है। यह शरीर के तापमान को नियंत्रित करता है, रक्त संचार को बेहतर बनाता है और शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालने में सहायता करता है। जब हम पर्याप्त पानी पीते हैं तो पाचन तंत्र बेहतर तरीके से काम करता है और शरीर में ऊर्जा बनी रहती है। इसके अलावा पानी त्वचा को भी स्वस्थ और चमकदार बनाए रखने में मदद करता है।
अगर शरीर को पर्याप्त पानी नहीं मिलता तो कई स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार पानी की कमी से थकान और कमजोरी सिरदर्द, कब्ज और पाचन समस्या त्वचा का सूखापन जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इसलिए दिनभर थोड़ी-थोड़ी मात्रा में पानी पीना जरूरी माना जाता है।
कितना पानी पीना चाहिए
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार एक स्वस्थ व्यक्ति को रोजाना लगभग 8 से 10 गिलास पानी जरूर पीना चाहिए। गर्मियों के मौसम में या अधिक शारीरिक श्रम करने पर पानी की मात्रा और बढ़ानी चाहिए। इसके अलावा नारियल पानी, नींबू पानी और ताजे फलों का रस भी शरीर को हाइड्रेट रखने में मदद करते हैं। कई विशेषज्ञ सुबह उठते ही एक या दो गिलास पानी पीने की सलाह देते हैं। इससे शरीर की सफाई होती है और पाचन तंत्र सक्रिय हो जाता है।

फल और हरी सब्जियां बढ़ाती हैं रोग प्रतिरोधक क्षमता

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प्राकृतिक भोजन से मिलता है असली पोषण, शरीर को बनाता है मजबूत
यूथ इंडिया
स्वस्थ जीवन के लिए संतुलित और पौष्टिक आहार बेहद जरूरी माना जाता है। डॉक्टरों और पोषण विशेषज्ञों के अनुसार फल और हरी सब्जियां शरीर के लिए सबसे प्राकृतिक और सुरक्षित पोषण का स्रोत हैं। इनमें विटामिन, खनिज, फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं, जो शरीर को स्वस्थ रखने के साथ-साथ रोगों से लडऩे की क्षमता भी बढ़ाते हैं।
आज की बदलती जीवनशैली में लोग अक्सर जंक फूड और पैकेज्ड खाद्य पदार्थों की ओर ज्यादा आकर्षित हो रहे हैं। लेकिन इन खाद्य पदार्थों में पोषण की कमी होती है, जबकि फल और सब्जियां शरीर को प्राकृतिक ऊर्जा और जरूरी पोषक तत्व प्रदान करती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि नियमित रूप से फल और हरी सब्जियां खाने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) मजबूत होती है। यह शरीर को संक्रमण और कई बीमारियों से बचाने में मदद करती है।
फल और सब्जियों में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट शरीर में बनने वाले हानिकारक तत्वों को कम करने में सहायक होते हैं। इससे हृदय रोग, मधुमेह, मोटापा और कई अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा भी कम हो सकता है।
शरीर को मिलते हैं जरूरी पोषक तत्व,हरी सब्जियों में आयरन, कैल्शियम, फाइबर और विटामिन भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। वहीं फल शरीर को विटामिन सी, पोटैशियम और प्राकृतिक शर्करा प्रदान करते हैं, जो शरीर को ऊर्जा देते हैं और त्वचा को भी स्वस्थ रखते हैं।विशेषज्ञों के अनुसार भोजन में अलग-अलग रंग के फल और सब्जियां शामिल करने से शरीर को विभिन्न प्रकार के पोषक तत्व मिलते हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि हर व्यक्ति को रोजाना कम से कम 4 से 5 प्रकार के फल और सब्जियां अपने भोजन में जरूर शामिल करनी चाहिए। इससे शरीर को संतुलित पोषण मिलता है और कई बीमारियों से बचाव होता है।
फल और सब्जियों का सेवन सलाद, जूस या सामान्य भोजन के रूप में किया जा सकता है।
बच्चों और युवाओं के लिए जरूरी
विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों और युवाओं के भोजन में फल और सब्जियां जरूर शामिल होनी चाहिए। इससे उनका शारीरिक और मानसिक विकास बेहतर होता है और शरीर को आवश्यक पोषण मिलता है।