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Monday, June 15, 2026

एमआईटी-डब्ल्यूपीयू के शोधकर्ताओं ने बनाई नई तकनीक, फैक्ट्रियों में मशीनों का शोर 20 डेसिबल तक घटेगा

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फैक्ट्रियों और वर्कशॉप्स में काम करने वाले कर्मचारियों की सुरक्षा बढ़ाने के लिए एमआईटी वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी (एमआईटी-डब्ल्यूपीयू) के शोधकर्ताओं ने एक नई तकनीक विकसित की है। यह तकनीक कटिंग मशीनों से होने वाले तेज शोर को 20 डेसिबल तक कम कर सकती है। साथ ही, यह मशीन से निकलने वाली चिंगारियों, धूल और छोटे धातु कणों को बाहर फैलने से भी रोकती है।

देश में मैन्युफैक्चरिंग और फैब्रिकेशन क्षेत्र के विस्तार के साथ कार्यस्थल सुरक्षा और स्वास्थ्य एक और अहम विषय बनता जा रहा है। इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए यह पहल की गई है, ताकि कटिंग मशीनों से होने वाले तेज शोर जैसी आम लेकिन अक्सर नजरअंदाज की जाने वाली समस्या का समाधान किया जा सके।

एमआईटी-डब्ल्यूपीयू के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के फैकल्टी मेंबर डॉ. रोहित रघुनाथ घाडगे, डॉ. महेश वसंतराव कुलकर्णी और पीएचडी स्कॉलर यश उत्साही चावंडे ने इस तकनीक को विकसित किया है। यह एक विशेष सुरक्षा कवच के रूप में तैयार की गई है, जिसे नई और पुरानी, दोनों तरह की कटिंग मशीनों पर आसानी से लगाया जा सकता है।

सामान्य कटिंग मशीनों में सुरक्षा के लिए सिर्फ छोटे गार्ड होते हैं, जबकि इस नई तकनीक में कटिंग वाले हिस्से को एक विशेष सुरक्षा कवर से पूरी तरह घेरा गया है। इसमें पारदर्शी खिड़कियां भी दी गई हैं, ताकि कर्मचारी सुरक्षित रहते हुए मशीन का काम देख सकें। यह अलग-अलग आकार की वस्तुओं की कटिंग के दौरान भी आसानी से इस्तेमाल की जा सकती है।

इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत इसका विशेष डिजाइन है। इसका सुरक्षा कवर ऐसा बनाया गया है कि कटिंग के दौरान पैदा होने वाला शोर काफी हद तक अंदर ही दबा रहता है। साथ ही, यह चिंगारियों, धातु के छोटे कणों और धूल को बाहर फैलने से रोकता है। इससे कर्मचारियों को ज्यादा सुरक्षित और साफ-सुथरा कामकाजी माहौल मिलता है। खास बात यह है कि इसके लिए बड़े साउंडप्रूफ कमरे या महंगे ढांचागत बदलावों की जरूरत नहीं पड़ती।

डॉ. महेश वसंतराव कुलकर्णी ने कहा, “आज उद्योगों में कर्मचारियों की सुरक्षा और स्वास्थ्य पर पहले से ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है। हमारा उद्देश्य ऐसा छोटा और व्यावहारिक समाधान विकसित करना था, जो एक साथ कई समस्याओं—जैसे तेज शोर, उड़ते धातु कण, धूल और ऑपरेटर की सुरक्षा—का समाधान कर सके। इसकी खास बात यह है कि इसके लिए बड़े साउंडप्रूफ कमरे या भारी-भरकम ढांचागत बदलावों की जरूरत नहीं होती।”

डॉ. रोहित रघुनाथ घाडगे ने कहा, “इस तकनीक को विकसित करने की प्रेरणा हमें विश्वविद्यालय परिसर में वर्कशॉप और निर्माण कार्यों के दौरान कटिंग मशीनों को देखकर मिली। इन मशीनों का शोर काफी दूर तक सुनाई देता था। इसी वजह से ऐसी व्यावहारिक तकनीक की जरूरत महसूस हुई, जो कर्मचारियों के लिए बेहतर कार्य वातावरण बनाए और मशीनों के उपयोग या काम की गति पर भी असर न डाले।”

शोधकर्ताओं का अनुमान है कि वास्तविक कार्यस्थलों पर परीक्षण पूरा होने के बाद यह तकनीक मशीनों के शोर को लगभग 10 से 20 डेसिबल तक कम कर सकती है। इतनी कमी भी कर्मचारियों के लिए कार्यस्थल को ज्यादा आरामदायक और सुरक्षित बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी और उन्हें लंबे समय तक तेज आवाज के संपर्क में रहने से होने वाली परेशानियों से बचाने में मदद करेगी।

इस तकनीक की एक बड़ी खासियत यह है कि इसे मौजूदा कटिंग मशीनों पर भी आसानी से लगाया जा सकता है। इसके लिए उद्योगों को बड़े निवेश या ढांचागत बदलाव करने की जरूरत नहीं होगी। इसका छोटा और आसानी से कहीं ले जाया जा सकने वाला डिजाइन इसे स्थायी वर्कशॉप्स के साथ-साथ अस्थायी निर्माण और फैब्रिकेशन स्थलों के लिए भी उपयुक्त बनाता है।

यह तकनीक मेटल फैब्रिकेशन, मैन्युफैक्चरिंग, कंस्ट्रक्शन, ऑटोमोटिव उत्पादन, रेलवे रखरखाव, शिपबिल्डिंग, स्टील प्रोसेसिंग और विभिन्न इंजीनियरिंग वर्कशॉप्स सहित कई क्षेत्रों के लिए उपयोगी हो सकती है।

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