(कुमार कृष्णन -विनायक फीचर्स)
मल्लखंभ भारत की प्राचीनतम और सबसे कठिन शारीरिक कलाओं में से एक है।भारत के सबसे प्राचीन पारंपरिक खेलों में से मल्लखंभ ताकत, लचीलापन, संतुलन और मानसिक दृढ़ता का अनोखा संगम है। इस कला में खिलाड़ी हवा में योग और जिम्नास्टिक के करतब एक उर्ध्वाधर खंभे या लटकी हुई रस्सी पर दिखाते हैं। यह योग के विभिन्न आसनों का ही एक उन्नत और अधिक चुनौतीपूर्ण रूप है। मल्लखंभ में भी खंभे या रस्सी पर टिके रहने के लिए चरम स्तर की एकाग्रता, सांसों पर नियंत्रण और जागरूकता की आवश्यकता होती है, जो कि योग और मानसिक अनुशासन का ही हिस्सा है। जिस प्रकार योग में प्राणायाम और सांस पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। मल्लखंभ में भी मुश्किल करतब करते समय सांस पर नियंत्रण बनाए रखना अनिवार्य होता है, ताकि शरीर का संतुलन बना रहे।
विडंबना यह है कि अपनी शानदार विरासत और विदेशी मंचों पर मिली प्रशंसा के बावजूद, इसे अपने ही देश में लंबे समय तक घोर उपेक्षा का सामना करना पड़ा है। भारत में इसे वह मुकाम नहीं मिला, जबकि विदेशों में इसे भारी सम्मान मिल रहा है। जर्मनी, अमेरिका, जापान, और चेक गणराज्य सहित दुनिया के 26 से अधिक देशों में मल्लखंभ खेला जा रहा है। यहाँ तक कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे पहचान दिलाने के लिए ‘मल्लखंभ वर्ल्ड चैंपियनशिप’ भी आयोजित की जा चुकी है।
भारत में मल्लखंभ एक ज़माने से खेला जाता रहा है लेकिन वक्त के साथ-साथ चीज़ें तेज़ी से बदल रही हैं। मल्लखंभ के बारे में प्राचीन भारतीय ग्रंथ रामायण में वर्णन है। पहला प्रत्यक्ष वर्णन बारहवीं शताब्दी की शुरूआत में मानसोलस नामक पाठ में है। इसे चालुक्य राजा सोमेश्वर तृतीय द्वारा लिखा गया। भारत के बौद्ध चीनी तीर्थ यात्रियों की किताबों में भी इसका उल्लेख है।
12वीं सदी में भारत में मल्लखंभ की शुरुआत हुई थी। 1600 के दशक के अंत से लेकर 1800 दशक के शुरूआत तक गतिविधि निष्क्रिय रही। पेशवा बाजीराव द्वितीय ने इसे लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका निभाई। दादा बालमधर देवधर मल्लखंभ के आद्य गुरु माने जाते हैं। वे बाजीराव पेशवा के दरबार में एक जाने-माने कुश्तीगीर और कसरतपटू थे। दादा बालमधर देवधर,पेशवा बाजीराव द्वितीय ने अपनी पेशवा सेना को प्रशिक्षित करने में कला को पुनर्जीवित किया।
बालमभट्ट दादा देवधर को 19वीं सदी में इसके पुनरुद्धार और इसे एक लोकप्रिय मार्शल आर्ट प्रशिक्षण के रूप में स्थापित करने का श्रेय जाता है। किंवदंती है कि उन्हें यह विद्या भगवान हनुमान से मिली, जब उन्होंने जंगल में बंदरों के फुर्तीले और लचीले करतबों को देखकर अभ्यास किया। बालमभट्ट ने इसी खंभे पर अभ्यास करके हैदराबाद के निजाम के दिग्गज पहलवानों (गुलाम और अली) को हराकर अपनी श्रेष्ठता साबित की थी। मराठा साम्राज्य की एक प्रमुख योद्धा झाँसी की रानी, ने अपने बचपन में नाना साहब और तात्या टोपे के साथ मिलकर बालम्भट्टा से मल्लखंभ की शिक्षा ली।
मुख्य रूप से तीन प्रकार के मल्लखंभ खेले जाते हैं। पहला पोल मल्लखंभ है, जो पारंपरिक रूप है, जिसमें जमीन पर गड़े 2.6 मीटर ऊंचे लकड़ी के खंभे का इस्तेमाल होता है। दूसरा रोप मल्लखंभ,इसमें खिलाड़ी एक लटकी हुई रस्सी के सहारे शारीरिक संतुलन और कलाबाजियां दिखाते हैं और तीसरा हैंगिंग यानी झूलता मल्लखंभ जमीन से थोड़ा ऊपर लटका हुआ खंभा, जो चारों तरफ घूम सकता है।
भारत के इस प्राचीन खेल मल्लखंभ ने पहली बार बर्लिन 1936 के ओलंपिक के दौरान पूरी दुनिया का ध्यान आकृष्ट किया। उस समय मल्लखंभ कबड्डी सहित कई स्वदेशी भारतीय खेलों में एक था, जिसे ओलंपिक शुरू होने से पहले बर्लिन में प्रदर्शित किया गया था। इन खेलों में स्थानीय लोगों के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय समुदायों ने हिस्सा लिया था। तब से यह खेल पूरी दुनिया में फैल गया। साल 2019 में मुंबई में पहली बार मल्लखंब विश्व चैम्पियनशिप आयोजित की गई, जिसमें 17 राष्ट्र खेल में भाग लेने के लिए आए थे। इस आयोजन को याद करते हुए, दीपक ने कहा कि वह विदेश में प्रतिस्पर्धा के स्तर को देखकर खुश हैं। ‘विश्व चैंपियनशिप में न केवल एशियाई देशों से बल्कि यूरोपीय देशों के भी एथलीट थे। कुछ देशों ने हमें इटली और जापान सहित अच्छी प्रतिस्पर्धा दी, जो देखने में बहुत अच्छा था क्योंकि यह इंगित करता है कि खेल दुनिया भर में फैल रहा है।’ मुझे बहुत गर्व की अनुभूति हुई जब प्रधानमंत्री मोदी जी ने मन की बात पर मल्लखंब के बारे में बात की और मल्लखंभ उपकरण के संबंध में अमरीका और जापान को भारत सरकार की सहायता की चर्चा की। उन्होंने कहा, पीएम मोदी, मल्लखंभ फेडरेशन ऑफ इंडिया और केन्द्रीय खेल और युवा मामलों के मंत्रालय ने खेल को सार्वभौमिक मान्यता दिलाने में मदद की है।
भारत के कई इलाकों में मल्लखंभ खेल काफी लोकप्रिय है। पुणे, मुंबई, और अमरावती (यहाँ का हनुमान व्यायाम प्रसारक मंडल) मल्लखंभ के ऐतिहासिक और प्रमुख केंद्र हैं। मध्य प्रदेश मल्लखंभ का सबसे बड़ा गढ़ है। मध्य प्रदेश सरकार ने 2013 में इसे अपना ‘राज्य खेल’ भी घोषित किया था। उज्जैन को इस खेल का मुख्य केंद्र या तीर्थ माना जाता है, जहाँ इसकी राष्ट्रीय स्तर की अकादमियां स्थित हैं। इसके अलावा इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर और भोपाल में भी यह बेहद लोकप्रिय है।
बिहार के भागलपुर स्थित श्री मारवाड़ी व्यायामशाला भागलपुर ने भारत की प्राचीन स्वदेशी खेल कला मल्लखंभ को सहेजने और उसे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में ऐतिहासिक और अग्रणी भूमिका निभाई है। मल्लखंभ के क्षेत्र राष्ट्रीय फलक पर बिहार को स्थापित करने में भागलपुर के मारसवाड़ी व्यायामशाला के प्रशिक्षक हृदय नारायण ठाकुर, विश्वनाथ प्रसाद यादव और योगिराज हरिदेव प्रसाद ठाकुर का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इन गुरूओं के अथक परिश्रम का ही नतीजा था कि पहले भागलपुर विश्वविद्यालय और बाद में नाम परिवर्तन के बाद तिलकामांझी भागलपुर विश्विद्यालय का देशभर में दबदबा रह चुका है। दो दशक पूर्व में ऑल इंडिया विवि स्तर पर आयोजित प्रतियोगिता में भागलपुर विश्वविद्यालय के खिलाड़ी पवन कुमार पोद्दार, जगदीश प्रसाद शर्मा, बनवारी लाल वर्मा, रघुनंदन भिवानीवाला, मदनमोहन शर्मा, विजय कुमार बाजोरिया और ज्ञान प्रकाश सिन्हा ने पदक जीत कर विवि की देश भर में पहचान बनायी थी। इसके बाद शंकर कुमार कर्ण, रमण कर्ण ने कानपुर में 2002 में आयोजित राष्ट्रीय प्रतियोगिता में बिहार का प्रतिनिधित्व किया। इस खेल के लिए खिलाड़ी आगे नहीं आए नतीजतन मलखंब खेल पूरी तरह विवि में बंद हो गया। हाल के वर्षों में राज्य सरकार, बिहार राज्य खेल प्राधिकरण और बिहार राज्य खेल प्रतिभा खोज (मशाल प्रतियोगिता) के जरिए जमीनी स्तर की प्रतिभाओं को सामने ला रही है, जिससे बिहार का राष्ट्रीय फलक पर प्रतिनिधित्व बढ़ा है। वहीं झारखंड में मल्लखंभ को लोकप्रिय बनाने और राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में राज्य के खिलाडिय़ों, कोचों और झारखंड राज्य मल्लखंभ एसोसिएशन का बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा है। झारखंड में इस प्राचीन कला को जीवित रखने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने में ‘झारखंड राज्य मल्लखंभ एसोसिएशन’ के महासचिव डॉ. अजय झा की अहम भूमिका है। वे बिना किसी फीस के बच्चों को इसका प्रशिक्षण दे रहे हैं। राज्य में मल्लखंभ को बढ़ावा देने के लिए ‘झारखंड राज्य स्तरीय मल्लखंभ प्रतियोगिता’ का नियमित आयोजन किया जाता है, जहाँ सब-जूनियर से लेकर सीनियर वर्ग तक के खिलाड़ी अपना दम-खम दिखाते हैं। हजारीबाग में भारतीय पारंपरिक खेल मल्लखंभ को बढ़ावा देने और छात्रों को इससे जोडऩे के लिए विशेष कार्यशालाओं और प्रदर्शनों का आयोजन किया जा चुका है। विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग में ‘फिट इंडिया’ कार्यक्रम के तहत मल्लखंभ पर एक विशेष कार्यशाला आयोजित की गई थी। इस दौरान मल्लखंभ के क्षेत्र में पद्मश्री सम्मान से सम्मानित उदय देशपांडे के नेतृत्व में छात्रों और बीएसएफ के जवानों को इस प्राचीन खेल का प्रशिक्षण और प्रदर्शन दिखाया गया था। 2024 में पद्म श्री से सम्मानित देशपांडे कहते हैं, ‘मल्लखंब में शरीर ही आपका साधन होता है।’ मल्लखंब में खिलाड़ी को अपने पूरे शरीर को गुरुत्वाकर्षण के खिलाफ ऊपर खींचना पड़ता है। यह न केवल शारीरिक रूप से कठिन है, बल्कि दर्दनाक भी होता है। पद्म श्री से सम्मानित मल्लखंब गुरु बताते है कि इसमें शरीर की ऐसी मांसपेशियों का इस्तेमाल होता है, जिनका हम आमतौर पर उपयोग ही नहीं करते, जैसे पैर की उंगलियां, जांघे और कोर। इसमें डर और दर्द दोनों पर काबू पाना पड़ता है। इसे सही तरीके से सीखने में सालों लग जाते हैं। इसे सीखने का एक ही तरीका है, इसे दिल से पसंद करना।
दिलचस्प बात यह है कि जहां भारत में यह खेल पहचान के लिए जूझ रहा है, वहीं विदेशों में इसकी लोकप्रियता बढ़ रही है। देशपांडे अमेरिका, जर्मनी, वियतनाम, सिंगापुर और मलेशिया जैसे देशों में वर्कशॉप ले चुके है। हाल ही में उन्होंने अमेरिका में 35 वर्कशॉप आयोजित किए। शिवाजी पार्क में हर दिन छोटे-छोटे बच्चे इस खेल को सीखते नजर आते हैं।
2022 में गुजरात में आयोजित 36वें नेशनल गेम्स राष्ट्रीय खेलों में मल्लखंब को आधिकारिक तौर पर शामिल किया गया। वडोदरा के 10 वर्षीय शौर्यजीत ने नेशनल गेम्स में सबसे कम उम्र के मल्लखंब खिलाड़ी के रूप में भाग लिया और अपने बेहतरीन करतबों से राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरीं। वडोदरा की मल्लखंब अकादमियों (जैसे जय कुबेर मल्लखंब स्पोर्ट्स एकेडमी) के कोच और खिलाडिय़ों ने नीदरलैंड और जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों में भी इस प्राचीन कला का प्रदर्शन कर इसे वैश्विक मंच दिया है। मल्लखंभ भारत की गौरवशाली विरासत का हिस्सा है, लेकिन इसे वैश्विक स्तर पर आधिकारिक मान्यता और राष्ट्रीय पहचान दिलाने के लिए अभी भी संघर्ष करना पड़ रहा है। 2028 में लॉस एंजिल्स ओलंपिक में एक प्रदर्शन खेल के रूप में लोग देख सकें। भारतीय जड़ों वाला यह खेल अब दुनिया भर में लोकप्रियता हासिल कर रहा है, मल्लखंभ के कलाकार भी दावा करते हैं कि इसमें उत्कृष्टता अन्य खेलों में प्रगति और सफलता का मार्ग प्रशस्त करती है। (विनायक फीचर्स)
मल्लखंभ: भारत का प्राचीन एवं कठिनतम खेल


