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Thursday, September 3, 2026

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, बार काउंसिल लॉ छात्रों पर नहीं चला सकती अनुशासन का डंडा : मुख्य न्यायाधीश

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कानून के छात्रों के अधिकारों से जुड़े अहम मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया को कानून के छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अधिकार नहीं है। छात्रों के आचरण पर कार्रवाई का अधिकार उनके विश्वविद्यालय या संबंधित शैक्षणिक संस्थान के पास है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने हैदराबाद स्थित नालसर विधि विश्वविद्यालय के 2026 बैच के छात्रों से जुड़े विवाद पर सुनवाई करते हुए बार काउंसिल के आदेश को गैरकानूनी बताया। छात्रों ने दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को बुलाए जाने का विरोध किया था। इसके बाद बार काउंसिल ने छात्रों के अधिवक्ता के रूप में पंजीकरण पर रोक लगाने और मामले की जांच के निर्देश दिए थे।

अदालत ने साफ किया- अधिवक्ता अधिनियम में अधिकार नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अधिवक्ता अधिनियम, 1961 में ऐसा कोई स्पष्ट या निहित प्रावधान नहीं है, जिसके आधार पर बार काउंसिल कानून के छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सके। अदालत ने बार काउंसिल के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा की ओर से 13 अगस्त को जारी आदेश को भी गैरकानूनी करार दिया।

मामले में नालसर के पूर्व छात्रों मिहिरा सूद और अभिषेक तिवारी ने याचिका दाखिल कर बार काउंसिल की कार्रवाई को चुनौती दी थी। पिछली सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने भी बार काउंसिल के दखल पर सवाल उठाते हुए कहा था कि छात्रों को अपनी बात रखने और विरोध करने का अधिकार है।

दीक्षांत समारोह में मुख्य न्यायाधीश के विरोध से शुरू हुआ विवाद

विवाद की शुरुआत नालसर विश्वविद्यालय से हुई, जहां करीब 450 छात्रों ने प्रशासन को पत्र देकर मुख्य न्यायाधीश को दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि बनाए जाने का विरोध किया था। छात्रों ने न्यायपालिका से जुड़े हालिया बयानों और घटनाक्रम पर आपत्ति जताई थी। बाद में मामला बार काउंसिल तक पहुंचा और छात्रों के पंजीकरण पर रोक लगाने का आदेश जारी हुआ।

इसके बाद देश के अन्य विधि संस्थानों में भी विरोध की आवाज उठी। मुंबई के टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान का दीक्षांत समारोह स्थगित हुआ, जबकि सोनीपत के ओपी जिंदल वैश्विक विश्वविद्यालय में मुख्य न्यायाधीश समारोह में शामिल नहीं हुए। बेंगलुरु के राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के 700 से अधिक मौजूदा और पूर्व छात्रों ने भी मुख्य न्यायाधीश तथा बार काउंसिल के अध्यक्ष को दीक्षांत समारोह में बुलाए जाने पर आपत्ति जताई थी।

मुख्य न्यायाधीश के बयानों को लेकर भी रहा विवाद

इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के कुछ बयानों को लेकर विवाद भी रहा है। 15 मई को एक मामले की सुनवाई के दौरान युवाओं और बेरोजगारों पर की गई उनकी टिप्पणी के बाद व्यापक प्रतिक्रिया हुई थी। इसके बाद ही कॉकरोच जनता पार्टी नाम से संगठन और उसके आंदोलन चर्चा में आए।

जुलाई में प्रदर्शनकारियों से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश की कुछ टिप्पणियों पर भी सवाल उठे। हालांकि बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई से जुड़ी किसी याचिका की सुनवाई से इनकार नहीं किया था।

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