पांचाल घाट स्वर्गधाम का बदहाल दृश्य, आस्था पर लगातार चोट
फर्रुखाबाद।
एक ओर केंद्र और राज्य सरकारें गंगा की स्वच्छता को लेकर बड़े-बड़े दावे करती हैं, योजनाओं की लंबी फेहरिस्त गिनाई जाती है और करोड़ों रुपये खर्च किए जाने की बात कही जाती है, वहीं जमीनी हकीकत इन सभी दावों की सच्चाई बयां कर रही है। जनपद के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल पांचाल घाट स्वर्गधाम पर जो दृश्य देखने को मिल रहा है, वह न केवल सरकारी दावों पर सवाल खड़ा करता है बल्कि आस्था, पर्यावरण और व्यवस्था—तीनों पर एक साथ चोट करता नजर आता है।
पांचाल घाट स्वर्गधाम, जहां दूर-दराज से श्रद्धालु अपने परिजनों के अंतिम संस्कार और धार्मिक अनुष्ठान के लिए पहुंचते हैं, आज गंदगी और लापरवाही का प्रतीक बन चुका है। यहां खुलेआम गंदे नालों का पानी सीधे गंगा की धारा में गिर रहा है। घाट तक पहुंचने वाले रास्ते पर बहती बदबूदार नालियां न केवल दृश्य को विकृत करती हैं, बल्कि वहां मौजूद लोगों के स्वास्थ्य के लिए भी खतरा पैदा कर रही हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार, क्षेत्र में घनी आबादी होने के कारण घरों से निकलने वाला गंदा पानी बिना किसी शोधन के सीधे नालियों के माध्यम से गंगा में प्रवाहित किया जा रहा है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस गंभीर समस्या से जिम्मेदार विभाग पूरी तरह वाकिफ होने के बावजूद कोई ठोस और स्थायी समाधान नहीं निकाल पा रहे हैं।
स्थिति तब और तनावपूर्ण हो गई जब कुछ श्रद्धालुओं ने इस गंदगी का विरोध किया। बताया जाता है कि विरोध के दौरान कुछ स्थानीय लोग उनसे उलझ गए, जिससे माहौल में तनाव उत्पन्न हो गया। इस घटना ने प्रशासन की निष्क्रियता और संवेदनहीनता को और उजागर कर दिया है।
हर वर्ष लगने वाला प्रसिद्ध रामनगरिया मेला, जो धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, उसके दौरान भी इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं किया जाता। माघ महीने में केवल दिखावे के लिए कुछ समय के लिए नालों का प्रवाह रोक दिया जाता है, जिससे यह आभास कराया जाता है कि व्यवस्थाएं दुरुस्त हैं। लेकिन जैसे ही मेला समाप्त होता है, हालात फिर से बद से बदतर हो जाते हैं।
श्रद्धालुओं का कहना है कि जिस स्थान को मोक्षधाम माना जाता है, वहां इस प्रकार की गंदगी अत्यंत शर्मनाक है। उनका मानना है कि यह केवल पर्यावरण प्रदूषण का मामला नहीं है, बल्कि धार्मिक भावनाओं का भी गंभीर अपमान है। गंगा, जिसे मां का दर्जा दिया जाता है, उसी में गंदगी उड़ेली जा रही है—यह स्थिति किसी भी संवेदनशील समाज के लिए चिंताजनक है।
विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार बढ़ता यह प्रदूषण गंगा के जल की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहा है, जिससे जलजीवों के साथ-साथ मानव स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है। यदि समय रहते इस पर सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में इसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं।
अब सवाल यह उठता है कि आखिर कब तक गंगा इसी तरह गंदे नालों का बोझ ढोती रहेगी? क्या केवल कागजों में चलने वाली योजनाएं ही गंगा को स्वच्छ बना पाएंगी, या फिर जमीनी स्तर पर ठोस और ईमानदार प्रयास भी किए जाएंगे?


