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Sunday, June 14, 2026

लोहिया अस्पताल की दवा पर डाका? संदेह में वर्षों से एक ही पटल पर जमे अरविंद प्रजापति

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फर्रुखाबाद। गरीबों के इलाज के लिए सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, लेकिन यदि सरकारी अस्पतालों की दवाएं जरूरतमंद मरीजों तक पहुंचने के बजाय कहीं और खपाई जा रही हों तो यह केवल भ्रष्टाचार नहीं बल्कि जनस्वास्थ्य के साथ विश्वासघात है। डॉ. राम मनोहर लोहिया संयुक्त चिकित्सालय के मुख्य दवा भंडार गृह को लेकर उठ रहे सवाल अब एक बड़े घोटाले की आशंका की ओर इशारा कर रहे हैं।

 

अस्पताल सूत्रों के मुताबिक मुख्य दवा भंडार गृह से जुड़े कर्मचारी अरविंद प्रजापति वर्षों से एक ही संवेदनशील पटल पर जमे हुए हैं। स्वास्थ्य विभाग के नियमों में संवेदनशील पटल पर समय-समय पर बदलाव और निगरानी की व्यवस्था इसलिए रखी जाती है ताकि किसी प्रकार की सांठगांठ, गड़बड़ी या रिकॉर्ड में हेराफेरी की संभावना को रोका जा सके। लेकिन लोहिया अस्पताल में यह व्यवस्था कितनी प्रभावी है, इस पर अब सवाल उठने लगे हैं।

 

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकार अस्पताल को पर्याप्त मात्रा में दवाएं उपलब्ध करा रही है, तब मरीजों को अक्सर यह क्यों कहा जाता है कि “दवा खत्म हो गई है” और उन्हें बाजार से दवा खरीदने की सलाह क्यों दी जाती है? आखिर वह दवा कहां जाती है जो सरकारी रिकॉर्ड में अस्पताल को उपलब्ध कराई जाती है?

 

अस्पताल से जुड़े सूत्रों का दावा है कि दवा भंडारण, स्टॉक प्रबंधन और वितरण व्यवस्था की निष्पक्ष जांच हो जाए तो कई परतें खुल सकती हैं। आरोप हैं कि स्टॉक रजिस्टर, वितरण रजिस्टर और वास्तविक खपत के आंकड़ों में अंतर पैदा कर दवाओं को बाहर खपाने का खेल लंबे समय से चल रहा हो सकता है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन लगातार उठ रहे सवालों ने पूरे सिस्टम को कठघरे में खड़ा कर दिया है।

 

जानकारों का कहना है कि किसी भी सरकारी दवा भंडार में सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज स्टॉक रजिस्टर होता है। यदि स्टॉक में आई दवाओं, मरीजों को वितरित दवाओं और शेष बची दवाओं का मिलान कराया जाए तो वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है। सवाल यह भी है कि क्या पिछले वर्षों में मुख्य दवा भंडार गृह का कोई स्वतंत्र ऑडिट कराया गया? यदि कराया गया तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?

स्थानीय लोगों का आरोप है कि अस्पताल में कई बार मरीजों को जीवनरक्षक और सामान्य उपयोग की दवाएं उपलब्ध नहीं कराई जातीं, जबकि शहर के कुछ मेडिकल स्टोरों पर वही दवाएं आसानी से मिल जाती हैं। ऐसे में संदेह और गहरा जाता है कि कहीं सरकारी दवाओं का नेटवर्क अस्पताल की चारदीवारी से बाहर तक तो नहीं फैला हुआ।

स्वास्थ्य विभाग के भीतर भी चर्चा है कि वर्षों से एक ही पटल पर तैनाती किसी भी कर्मचारी को सिस्टम पर असामान्य पकड़ प्रदान कर देती है। ऐसे में पारदर्शिता और जवाबदेही स्वतः कमजोर पड़ने लगती है। यही कारण है कि अधिकांश विभागों में संवेदनशील पदों पर नियमित स्थानांतरण की व्यवस्था लागू की जाती है।

 

(क्रमशः… अगले एपिसोड में: दवा खरीद, स्टॉक रजिस्टर और अस्पताल की डिस्पेंसरी व्यवस्था से जुड़े नए खुलासे)

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