– प्राकृतिक खेती पर जोर क्या जमीन पर बदलेगी किसानों की हालत?
लखनऊ। राजधानी में आयोजित क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन सिर्फ एक सरकारी कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि इससे सियासी और प्रशासनिक दोनों स्तर पर बड़े संकेत निकलकर सामने आए हैं। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान की मौजूदगी ने इसे राष्ट्रीय महत्व का मंच बना दिया, जहां 9 राज्यों के कृषि मंत्री भी शामिल हुए।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने संबोधन में दावा किया कि उत्तर प्रदेश की कृषि विकास दर 18% तक पहुंच गई है, जो राज्य के लिए बड़ी उपलब्धि बताई जा रही है। उन्होंने 2017 से पहले की स्थिति को “जर्जर” बताते हुए कहा कि अब हर जिले में आधुनिक सुविधाओं से लैस कृषि विज्ञान केंद्र सक्रिय हैं और किसान सीधे वैज्ञानिकों से जुड़कर नई तकनीक अपना रहे हैं।
हालांकि, यह आंकड़ा जितना प्रभावशाली दिखता है, उतने ही बड़े सवाल भी खड़े करता है। विशेषज्ञों के मुताबिक 18% की कृषि विकास दर एक असाधारण संख्या है, जिसे जमीनी स्तर पर किसानों की आय, लागत और बाजार पहुंच के आंकड़ों से परखा जाना जरूरी है। क्योंकि कई इलाकों में आज भी किसान लागत, मौसम और बाजार के दबाव से जूझ रहे हैं।
सम्मेलन में “लागत कम, उत्पादन ज्यादा” का मंत्र दिया गया। सरकार का दावा है कि नई तकनीक, बेहतर बीज और योजनाओं के जरिए किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में काम हो रहा है। लेकिन जमीनी हकीकत यह भी है कि खाद-बीज की कीमत, डीजल लागत और फसल के दाम के बीच संतुलन आज भी बड़ा मुद्दा बना हुआ है।
सबसे ज्यादा जोर प्राकृतिक खेती (नेचुरल फार्मिंग) पर दिया गया। सरकार इसे भविष्य की खेती बताकर बढ़ावा दे रही है, ताकि मिट्टी की उर्वरता बनी रहे और रासायनिक लागत कम हो। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या बड़े पैमाने पर किसान बिना पर्याप्त बाजार और समर्थन के इस मॉडल को अपनाने के लिए तैयार हैं?
कृषि विज्ञान केंद्रों की भूमिका को भी अहम बताया गया, जहां किसानों को बीज, तकनीक और प्रशिक्षण की सुविधा दी जा रही है। सरकार का दावा है कि “बीज से बाजार तक” पूरी श्रृंखला को मजबूत किया जा रहा है, लेकिन मंडी व्यवस्था, न्यूनतम समर्थन मूल्य और फसल खरीद जैसे मुद्दे अब भी बहस के केंद्र में हैं।
कृषि सम्मेलन से बड़ा सियासी संदेश 18% विकास दर का दावा


